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74 हज़ार करोड़ रुपए की नासा की नई दूरबीन ब्रम्हाण्ड के क्या राज़ खोलेगी?

फ़र्ज़ कीजिए आज से 20 लाख साल पूर्व, सवाना के मैदानों में घूमते किसी आदिम मनुष्य ने पहली बार आग को देखा होगा. कोई एक होगा जिसने जुर्रत की होगी और आग पे क़ाबू पाकर उसका इस्तेमाल करना सीखा होगा. इसी आग की शक्ति से मनुष्य को रात में विचरने की क्षमता मिली होगी. और आग के इर्द गिर्द लेटे हुए ऐसे ही किसी पहले मनुष्य ने रात में आसमान की ओर देखा होगा. और सोचा होगा, ‘ये टिमटिमाते बिंदू आख़िर हैं क्या?

20 लाख साल की यात्रा में हमारी जुर्रत हमें उस मोड़ तक ले आई है, जहां हम ना केवल उन बिंदुओं को पहचान चुके हैं. बल्कि उन तक और उनके पार पहुंचने की यात्रा की शुरुआत भी कर चुके हैं.

यात्रा जिसकी शुरुआत हुई है अमेज़न के जंगलों से. लेकिन इस यात्रा का गंतव्य स्पेस में नहीं बल्कि टाइम में है, बहुत पीछे. कितने पीछे? ब्रह्मांड की शुरुआत तक.

हम बात कर रहे हैं, जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की. जिसे शनिवार 25 दिसंबर को फ़्रेंच गुयाना स्थित यूरोपियन स्पेसपोर्ट से लॉन्च किया गया. 5 बजकर 55 मिनट पर जैसे ही रॉकेट बूस्टर से अलग हुआ, 14 देशों के हज़ारों इंजीनियर्स और वैज्ञानिकों की सांस में सांस आई.

कारण कि हमारे लिए जो सिर्फ़ एक वैज्ञानिक कौतूहल है. उसमें लगी है हज़ारों वैज्ञानिकों की 4 करोड़ घंटे की मेहनत. और 7 हज़ार 500 करोड़ की लागत. तब जाकर मानवता के सैकड़ों सालों के इस सपने को उड़ान मिली है.

नासा के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की आगे की योजना क्या है? अपनी यात्रा की शुरुआत कर चुका जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप किन-किन पड़ावों से होकर गुजरेगा? और दुनिया भर के खगोलविदों की इससे क्या-क्या आशाएं जुड़ी हैं?

शुरुआत से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं. 14 फरवारी 1990 यानी वेलेनटाइंस डे की बात है. धरती से लगभग 6 हज़ार किलोमीटर दूर एक प्रेम कहानी लिखी जा रही थी. इंसानी निशानियों को लेकर वॉएजर-1 सुदूर ब्रह्मांड की यात्रा पर जा रहा था. कार्ल सेगन ने तब नासा से एक निवेदन किया. इसके बाद वॉएजर-1 के कैमरे को आख़िरी बार धरती की तरफ़ मोड़ा गया. और उसने धरती की एक आख़िरी तस्वीर खींची. तस्वीर धरती तक पहुंची और इसके बाद वॉएजर-1 अपनी अनंत यात्रा पर चला गया. कभी लौटकर ना आने के लिए.

Pale Blue Dot
द पेल ब्लू डॉट

वॉएजर-1 द्वारा खींची गई इस तस्वीर का नाम है. द पेल ब्लू डॉट. जिसमें सूरज की रोशनी में धरती एक हल्के नीले बिंदु की तरह दिखाई दे रही है. इस तस्वीर पर कार्ल सेगन ने लिखा,

इस बिंदु को बार बार देखो. यही हमारा घर है. हर वो शख़्स जिसके बारे में तुमने सुना,जाना,और जिससे तुमने प्यार किया,हर वो शख़्स जो कभी अस्तित्व में रहा. इस छोटे से नीले बिंदु में ही उसने अपनी पूरी जिंदगी जी है. हमारे सारे सुख-दुःख,हमारी महत्वाकांक्षाएं,हमारे धर्म,हमारी हर जीत-हार,हर साधु और हर शैतान का कुल जोड़ यही एक बिंदु है. सूरज की रोशनी में लटकता हुआ धूल का ये कण.”

नासा ने जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के लॉन्च का जब ट्रेलर रिलीज़ किया, तो उसमें कार्ल सेगन की आवाज़ को नरेशन के लिए उपयोग किया. एक बिंदु पर कार्ल कहते हैं, हम बहुत आगे निकल चुके हैं, लेकिन खोज़ जारी है. क्या करें कि कौतूहल हमारी प्रकृति है. और इसलिए हम खोज़ जारी रखने के लिए मजबूर हैं.

इस मजबूरी का ही फल था कि 1990 में नासा ने जेम्स वेब के पूर्ववर्ती हबल टेलीस्कोप को लॉन्च किया. तब किसी ने सोचा नहीं था कि वो हमें क्या दिखाएगा. इसका नाम मशहूर अमेरिकी एस्ट्रोनॉमर एडविन हब्बल के नाम पर रखा गया था. ब्रह्मांड स्टेटिक यानी रुका हुआ नहीं है. बल्कि ये तेज गति से विस्तार कर रहा है. ये पता लगाने वाले एडविन हबल पहले व्यक्ति थे.

31 सालों में हबल ने हमें कुछ ऐसी अद्भुत तस्वीरों से नवाज़ा है. जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. हबल द्वारा एकत्र किए डेटा से वैज्ञानिक अंतरिक्ष में सुदूर आकाशगंगाओं, ग्रहों, तारों, आदि के बारे में बेहतर समझ बना पाए हैं. इसकी बदौलत ही हमें ब्रह्मांड की ठीक-ठीक उमर का पता लग पाया. और ये भी पता चला कि ब्रह्मांड में जो कुछ दिख रहा है उससे कहीं अधिक मात्रा में एक ऐसी एनर्जी है. जिसे डार्क एनर्जी का नाम दिया गया. यानी जिसे अभी तक जाना नहीं जा सका है. लेकिन गणना बताती है कि ऐसी एक एनर्जी मौजूद है

हबल ने हमें बहुत सी जानकारियां दी. लेकिन फिर भी ये अपनी क्षमता में सीमित है. कारण कि सुदूर ब्रह्मांड से आने वाली प्रकाश की वो वेवलेन्थ जिन्हें ये पकड़ नहीं सकता था. सुदूर ब्रह्मांड में गैस और धूल के ऐसे विशाल बादल हैं, जिन्हें प्रकाश की विजिबल वेवलेंथ पार नहीं कर सकती. इसके बरअक्स इन्फ्रारेड किरणें धूल और गैस के बादलों को पार कर सकती हैं. इसलिए नासा ने एक ऐसे टेलीस्कोप की तैयारी शुरू की, जो इन्फ्रारेड किरणों को पकड़ सके.

इसी ख़याल से शुरुआत हुई जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की. इसका निर्माण नासा ने यूरोपीयन स्पेस एजेंसी (ESA) और कनाडा स्पेस एजेंसी (CSA) के साथ मिलकर किया है.

इस मिशन की शुरुआत 1996 में हो चुकी थी. और तब इसकी लॉन्च डेट 2005 रखी गई थी. लेकिन बजट और टेक्निकल दिक्कतों के चलते इसकी लॉन्च डेट आगे खिसकती गई. सबसे बड़ी दिक़्क़त थी इसकी टेस्टिंग की. जिसमें लगभग सात साल लग गए. टेस्टिंग इसलिए ज़रूरी थी कि एक बार लॉन्च के बाद इसमें कोई ख़ामी आ गई तो उसे सही करना लगभग असम्भव होगा. 1990 में जब हबल को लॉन्च किया गया तो उसमें भी खराबी आई थी. तब एस्ट्रोनॉट्स को भेजकर इसे सही कर लिया गया. लेकिन इस बार ये सम्भव नहीं है. क्यों? ये आगे समझेंगे.

अभी के लिए इतना जान लीजिए कि अपनी टेक्निकल पेचीदगियों के चलते शुरुआत में इसका जो बजट 500 मिलियन डॉलर रखा गया था. वो बढ़ते-बढ़ते करीब 9.7 बिलियन डॉलर यानी 74 हज़ार करोड़ रुपए हो चुका है.

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को टाइम मशीन की संज्ञा भी दी जा रही है. ऐसा इसलिए कि ये समय में पीछे देखने की क्षमता भी रखता है. कैसे?

वो ऐसे समझिए कि जो वस्तु अंतरिक्ष में जितनी दूर होगी. उसके प्रकाश को हम तक पहुंचने में उतना वक्त लगेगा. यानी आज जो प्रकाश हम देख पा रहे हैं वो सालों पहले उत्पन्न हुआ होगा. उदाहरण के लिए सूर्य का प्रकाश हम तक 7 मिनट में पहुंचता है. इसलिए सूरज की जो तस्वीर हमें दिखाई देती है. वो अतीत में 7 मिनट पहले की है. स्पेस के लेवल पर ये दूरी जितनी बड़ी होती जाएगी, समय का अंतराल भी उतना अधिक होता जाएगा. इसलिए हम जितनी दूर का प्रकाश पकड़ने में सक्षम होंगे. उतना ही पीछे अतीत में भी देख पाएंगे.

अब बात इसके टेक्निकल पक्ष की. जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप में 6.5 मीटर चौड़ाई का मिरर लगा है. ताकि ये इंफ़्रारेड किरणों को कैद कर सके. तुलना के लिए देखें तो हबल के मिरर की चौड़ाई 2.5 मीटर है. साथ ही इसमें 22 मीटर की एक सनशील्ड भी लगाई गई है. तक़रीबन एक टेनिस कोर्ट के साइज़ की.

सनशील्ड लगाने के पीछे दो कारण है. पहला इसे सूरज के प्रकाश से बचाने के लिए. और दूसरा इसके तापमान को कम रखने के लिए. तापमान को कम रखना इसलिए ज़रूरी है कि टेलीस्कोप को -220 डिग्री सेल्सियस पर काम करना है. इतने कम तापमान पर इसलिए क्योंकि इंफ़्रारेड क्रिरणों का ताल्लुक़ ऊष्मा से होता है. और जितना कम तापमान होगा, इसकी सेंस्टिविटी उतनी ही अधिक होगी.

इन सब के अलावा जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप में तस्वीर को प्रॉसेस करने के लिए विभिन्न उपकरण भी लगे हैं. मने, फ़िल्टर, सेंसर मॉनिटर, स्पेक्ट्रोग्राफ आदि. इसके मिरर की एक खास बात और भी है. मिरर को 18 भागों में जोड़कर इस तरह डिज़ाइन किया गया कि उन्हें फ़ोल्ड कर लॉन्च किया जा सके. स्पेस में पहुंचकर ये 18 हिस्से लगभग एक तितली के पंख की तरह खुलेंगे और एक डिश का आकार बनेगा.

जैसा कि लाज़मी है, लॉन्च सफल होने से वैज्ञानिक खुश हैं. लेकिन सच ये भी है कि लॉन्च सिर्फ़ पहला चरण था. सितारों से आगे जहां और भी हैं. लेकिन अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी है.

लॉन्च के कुछ ही घंटों बाद जेम्स वेब टेलीस्कोप का पहला इम्तिहान आया. ये कमोबेश आसान था. पहला टास्क था टेलीस्कोप के सोलर पैनल को काम में लाना. चूंकि पहले ये बैटरी पावर पर काम कर रहा था, इसलिए सूरज की रोशनी का उपयोग कर बैटरी पावर को बचाया जाएगा. जो आगे इसके ऑर्बिट में बने रहने के काम आएगी.

अगला चरण था कोर्स करेक्शन. ये दोनों चरण शनिवार देर रात तक पूरे कर लिए गए. संडे को टेलीस्कोप का एंटीना भी रिलीज़ कर दिया गया. ताकि टेलीस्कोप डेटा को धरती तक भेज सके.

लॉन्च से तीसरे और सातवें दिनों के बीच टेलीस्कोप की सनशील्ड को खोला जाएगा ताकि इसे सूरज की रोशनी से बचाया जा सके.

सबसे बड़ा इम्तिहान है 10वें दिन. जब जेम्स वेब टेलीस्कोप का सेकेंडरी मिरर अपनी पोजिशन लेगा. ये चरण सबसे क्रूशियल इसलिए है क्योंकि सेकेंडरी मिरर के बिना ये स्पेस से लाइट को कैप्चर ही नहीं कर पाएगा. और ऐसा होना की स्थिति में मिशन पूरी तरह फेल हो जाएगा. अगले 30 दिन जइस मिशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसीलिए वैज्ञानिक मज़ाक़ में ही सही, अगले 30 दिनों को ’30 डेज़ ऑफ़ टेरर’ का नाम दे रहे हैं.

आख़िरी चरण आएगा 29वें दिन. तब जेम्स वेब टेलीस्कोप अपने थ्रस्टर्स फ़ायर करके ऑर्बिट में पहुंचने की कोशिश करेगा. पहले हमने आपको बताया था कि जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की टेस्टिंग में 7 साल का समय लगा है. इसका कारण है इसका ऑर्बिट.

हबल टेलीस्कोप तो बाकी उपग्रहों की तरह धरती की कक्षा में घूम रहा है. लेकिन जेम्स वेब ऐसा नहीं करेगा. जेम्स वेब धरती की ही तरह सूरज की परिक्रमा करेगा. कैसे?

उसके लिए एक टर्म जान लीजिए, एल-2 यानी दूसरा लग्रांज बिंदु?

अब ये क्या होता है?

एल-2 वह बिंदु है जहां सूरज और धरती, दोनों इस पर गुरुत्वाकर्षण बल लगाएंगे. लेकिन एल-2 पर जेम्स वेब के ऑर्बिटल मोशन और गुरुत्वाकर्षण बलों का ऐसा बेलेंस बनेगा कि वो

उस बिंदु पर स्थिर बना रह सकेगा. हालांकि स्थिर का मतलब यहां धरती के सापेक्ष स्थिरता से है. सूरज का चक्कर ये तब भी लगाएगा. ऑर्बिट में स्थित हो जाने के अगले 6 महीने तक इसका कैलिब्रेशन किया जाएगा. और 2022 जुलाई महीने से उम्मीद है कि ये काम करना शुरू कर देगा.

अब जानते हैं कि नासा के मिशन का उद्देश्य क्या है.

सबसे मुख्य उद्देश्य तो है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति के वक्त पैदा हुई शुरुआती रौशनी को कैप्चर करना. ताकि शुरुआती आकाश गंगाएं कैसे बनी, इसका अध्ययन किया जा सके.

इसके अलावा दूसरा उद्देश्य है जीवन की उत्पत्ति के रहस्य को सुलझाना. इसके लिए जेम्स वेब सुदूर आकाशगंगाओं में ग्रहों पर मौजूद जीवन के निशान खोजने की कोशिश करेगा.

वैज्ञानिकों की जेम्स वेब टेलीस्कोप से बहुत उम्मीदें जुड़ी हैं. संभव है कि इससे हमें कुछ सबसे बड़े प्रश्नों का उत्तर मिल जाए. मसलन शुरूआती ब्रह्मांड कैसा दिखता था? तारों, ग्रहों, आकाशगंगाओं की उत्पत्ति कैसे हुई.

हबल की मदद से हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति के 40 करोड़ साल बाद की तस्वीर देख पाए हैं. लेकिन जेम्स वेब से हम इससे 30 करोड़ साल और पीछे जा सकेंगे. अगर ब्रह्मांड की उत्पत्ति से आज तक के समय को एक केलेंडर में बांट दिया जाए. और आज के समय को 31 दिसम्बर रात 11.55 माना जाए. तो जेम्स वेब हमें जो तस्वीर दिखाएगा, इससे 359 दिन पहले यानी 6 जनवरी की होगी.

कोशिश चाहे चंद हज़ार लोगों की हो, लेकिन जेम्स वेब के हासिल में हम सब साझेदार है. इसलिए वैज्ञानिकों की कोशिश को सराहते हुए, आइए कोशिश करें कि हम खुद में विज्ञान सम्मत समझ पैदा करें. और शुरुआत करें, तीन सवालों से. वही सवाल, जिससे समस्त विज्ञान की शुरुआत हुई है. कैसे क्यों और क्या ?


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