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क्या है 'बैठने का अधिकार' जिसके लिए तमिलनाडु सरकार बिल लेकर आई है?

सोमवार 6 सितंबर. तमिलनाडु सरकार ने विधानसभा में औपचारिक रूप से एक विधेयक पेश किया. इस विधेयक में दुकानों और अन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले कर्मचारियों को ‘बैठने का अधिकार’ देने की बात कही गई है. तमिलनाडु के श्रम एवं रोजगार मंत्री सीवी गणेशन ने ‘राइट टू सिट’ बिल पेश किया. राज्य कर्मचारी संघ और अन्य संगठनों की ओर से इस पहल का स्वागत किया गया है.

केरल से मिली प्रेरणा

तमिलनाडु दुकान और प्रतिष्ठान (संशोधन) अधिनियम 2021, केरल के एक विधेयक से प्रेरित है. वहां साल 2018 में पहली बार ऐसा ही बिल पेश किया गया था. जनवरी 2019 में ये कानून बन गया. केरल में साल 2016 से ही महिलाएं और अन्य कर्मचारी ‘राइट टू सिट’ की मांग कर रहे थे. अब तमिलनाडु में भी ऐसा ही बिल लाया गया है.

ये विधेयक तमिलनाडु शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 1947 में संशोधन की सिफारिश करता है. पुराने बिल में एक सब सेक्शन जोड़ते हुए बिल कहता है,

“हर दुकान और व्यवसायिक प्रतिष्ठान पर सभी कर्मचारियों के बैठने के लिए उचित इंतजाम किए जाएंगे. ताकि ड्यूटी के दौरान पूरे समय उन्हें खड़ा नहीं रहना पड़े. और काम के वक्त उन्हें बैठने के मौके मिल सकें.”

अधिनियम की प्रस्तावित धारा 22-ए में कहा गया है कि हर प्रतिष्ठान के परिसर में सभी कर्मचारियों के लिए बैठने की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए. ताकि वे बैठने के किसी भी अवसर का लाभ उठा सकें जो उनके काम के दौरान हो सकता है. विधेयक में कहा गया है कि राज्य में दुकानों और प्रतिष्ठानों में कार्यरत व्यक्तियों को “अपनी ड्यूटी के दौरान खड़े रहने के लिए मजबूर किया जाता है” जिसके चलते उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं.

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कस्टमर्स को साड़ियां दिखाते कर्मचारी. फोटो- PTI

तमिलनाडु में कर्मचारियों को बैठने की सुविधा प्रदान करने का विषय 4 सितंबर 2019 को आयोजित राज्य श्रम सलाहकार बोर्ड की बैठक में रखा गया था. तब बोर्ड के सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से इसे अप्रूव किया गया था.

केरल में क्या हुआ था?

कुछ साल पहले केरल में कर्मचारियों द्वारा ‘बैठने के अधिकार’ की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए गए थे, जिसके बाद वहां की सरकार ने उनके लिए बैठने की व्यवस्था प्रदान करने के लिए 2018 में केरल दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियम में संशोधन किया था.

आप जब किसी साड़ी या गहनों की दुकानों पर जाते हैं तो वहां अक्सर काम करने वाली महिलाओं को खड़ा ही पाते हैं. सोचिए ज़रा, अगर ये महिलाएं 8 घंटे की शिफ्ट करती हैं तो क्या ये 8 घंटे लगातार खड़ी रहती हैं? जवाब है हां. केवल महिलाएं ही नहीं अलग-अलग दुकानों पर काम करने वाले पुरुष कर्मचारियों की भी यही स्थिति थी. दोनों के लिए ये हालात केवल कपड़े, साड़ी या गहनों की दुकानों तक सीमित नहीं थे. कई और तरह की दुकानें हैं जहां कर्मचारियों को खड़े रहना पड़ता था.

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उत्तर भारत में भी आपने अक्सर दुकानदार को खड़े देखा होगा. फोटो- PTI

ये लोग पानी कम पीते थे ताकि टॉयलेट ना जाना पड़े, भूखे रहते थे ताकि शौच के लिए नहीं जाना पड़े. पैरों पर खड़े-खड़े तमाम तरह की बीमारियां हो जाती थीं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को यूरीन इन्फेक्शन हो जाता था, लेकिन वो नौकरी की खातिर विरोध नहीं कर पाती थीं. कई दुकानों पर तो टॉयलेट आदि भी नहीं होता है, ऐसे में महिलाओं को आस-पड़ोस के किसी रेस्टोरेंट या अन्य ऐसी जगह जाना पड़ता था जहां शौचालय हो. इस दौरान उन्हें उत्पीड़न आदि का भी सामना करना पड़ता था.

लेकिन धीरे-धीरे केरल की महिला कर्मचारियों ने आवाज उठाई. विरोध करने वाली कई महिलाओं की नौकरियां गईं. लेकिन विरोध का जज्बा बना रहा. पुरुष कर्मचारी भी इस मांग में शामिल हो गए. देखते-देखते ‘बैठने का अधिकार’ की मांग पूरे केरल की कामकाजी महिलाओं की मांग बन गई. खरीददारी करने वाली महिलाओं का भी इस मांग को पूरा सपोर्ट मिला और आखिरकार कानून बना. ऐसा कानून जिससे पुरुषों को भी फायदा हुआ. अब केरल में ‘बैठने का अधिकार’ एक कानून है, जिसके तहत जिस वक्त कोई ग्राहक नहीं है, उस वक्त खड़े रहने वाले कर्मचारी कुर्सी पर बैठ सकते हैं.

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बहुत कम जगहों पर ही दुकान पर बैठ पाने की उचित व्यवस्था उपलब्ध होती है. फोटो- PTI

अब जल्दी ही तमिलनाडु में भी ये कानून बन जाएगा. वहां का कर्मचारी वर्ग इसका लाभ उठा पाएगा. ऐसा हो ना भी चाहिए. आखिर दुकानों में दिन भर खड़े रहकर साड़ी, गहने, अंडरगारमेंट, मोबाइल, टीवी, सोफा और क्या-क्या बेचने वाले तमाम लोगों को भी बैठने का अधिकार है.


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