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ज़मीन और पानी के बाद अब अंतरिक्ष से हमले की तैयारी में जुटा चीन!

एक कहानी सुनिए. रमेश और सुरेश दोनों पड़ोसी थे. एक दिन किसी बात पर दोनों की लड़ाई हो गई. दोनों को अंदेशा था कि किसी भी दिन उनके घर पर हमला हो सकता है. एक दिन रमेश ने अपने आंगन में पत्थरों का एक ढेर इकट्ठा कर लिया. सुरेश ने ये पत्थरों का ढेर देखा तो उसने अपने आंगन में भी पत्थर इकट्ठा कर लिए. सोसायटी वालों ने दोनों से इसका कारण पूछा तो दोनों ने जवाब दिया कि मेरे पास पत्थरों का ढेर इसलिए है क्योंकि दूसरे के पास भी है. सोसायटी वालों ने सोचा चलो ठीक है, जब तक दोनों के पास पत्थरों का ढेर है, कोई दूसरे पर ये सोचकर हमला नहीं करेगा कि दूसरा भी ऐसा ही कर सकता है.

कुछ महीने ऐसा ही चलता रहा. नुक़सान के डर से दोनों ने एक-दूसरे पर हमला नहीं किया. फिर एक दिन रमेश बाज़ार से जाली ख़रीद कर लाया और अपने घर पर बाड़ डाल दी. सुरेश को लगा कि अब ये मुझ पर ज़रूर हमला करेगा क्योंकि इसने अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम कर लिया है. ये सोचकर सुरेश ने अपने घर में और बड़े पत्थर इकट्ठा करने शुरू कर दिए. जो जाल को तोड़कर रमेश के घर को नुक़सान पहुँचा सकते थे.

अब ये सवाल पूछना बेमानी है कि आगे रमेश क्या करेगा. और ये खेल क्या कभी रुकेगा. जालों की मोटाई और पत्थरों का साइज़ बढ़ता जाएगा. जब तक दोनों आपस में सुलह नहीं कर लेते. ये तो रमेश और सुरेश थे. इनको समझाया जा सकता है. लेकिन तब क्या हो जब दुनिया के दो सबसे ताकतवर देश ऐसा करने लगें. तब हथियारों की इस रेस का क्या अंजाम होगा? पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स एक रिपोर्ट छापी. इसमें दावा किया गया कि इसी साल अगस्त में चीन ने एक मिसाइल परीक्षण किया था. मिसाइलों का परीक्षण वैसे तो आम बात है लेकिन इस परीक्षण ने तमाम देशों की सरकारों के कान खड़े कर दिए. डर हमले से ज़्यादा इस बात का है कि इस परीक्षण के बाद हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो सकती है. कैसे? जानते हैं.

स्पूतनिक मूमेंट

अमेरिका सहित सभी पश्चिमी देशों की राजनैतिक बहसों में एक शब्द बार-बार दोहराया जाता है, ‘स्पूतनिक मोमेंट’. क्या होता है ये ‘स्पूतनिक मोमेंट’. इस फ़्रेज़ का इस्तेमाल शुरू हुआ 1957 से. कोल्ड वॉर के दिन थे. अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हर मोर्चे पर आगे बढ़ने की होड़ मची थी. इस लड़ाई का ब्रह्मास्त्र था, न्यूक्लियर हथियार. सारे प्रोपोगेंडा के बावजूद सोवियत संघ को अपनी असलियत का पता था. अमेरिका के पास उनसे 5 गुना अधिक न्यूक्लियर हथियार थे. इतना ही नहीं सोवियत के मुहाने, तुर्की में अमेरिका ने न्यूक्लियर हथियारों का एक ज़ख़ीरा खड़ा किया हुआ था. तब सोवियत से दूसरे रास्ते से अमेरिका को मात देने की सोची. 1956 में ही अमेरिका स्पेस लॉंच की तैयारी कर चुका था. लेकिन वो तैयारी फेल रही. अमेरिका फिर भी बेफ़िक्र था. कोल्ड वॉर की आंच में उसके हाथ जलने के चांसेज कम थे. लॉकहीड मार्टिन के स्पाई प्लेन सोवियत संघ के ऊपर नज़र बनाए हुए थे.

लेकिन अमेरिका की जासूसी धरी की की धरी रह गई जब अगले साल यानी 4 अक्टूबर 1957 को सोवियत संघ ने दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह लॉंच कर दिया. उपग्रह का नाम था स्पूतनिक वन. अमेरिका सहित उसके साथी पश्चिमी देशों में हलचल मच गई. स्पेस लांच की लड़ाई दोनों देशों के बीच अहम की थी लेकिन असली मुद्दा कुछ और ही था. न्यूक्लियर हथियार तो दोनों देशों के पास थे. लेकिन इतनी दूर हमला करने के लिए एक माध्यम भी चाहिए था. वो दिन तो थे नहीं कि फ़ाइटर जेट से कोई हथियार गिराया जाए. मिसाइलों के दिन आ चुके थे.

US को चिंता हुई कि अगर रूस का रॉकेट परपेंडिकुलर जा सकता है. तो टैंजेंट् की तरह भी जा सकता है. स्पूतनिक को लॉंच करने के लिए जिस टेक्नॉलजी का उपयोग किया गया था. उसका नाम था ICMB, इंटरकोंटिनेंटल बलिस्टिक मिसाइल. यानी ऐसी मिसाइल जो 5000 किलोमीटर की दूरी तक हमला कर सकती थी. रातों रात नॉर्थ अमेरिका और यूरोप सोवियत की पहुंच में आ गए थे. स्पूतनिक के लॉन्च से सोवियत संघ को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ी जीत हासिल हुई. सोवियत संघ ने इशारों-इशारों में कहा कि टेक्नॉलजी के मामले में सोवियत अमेरिका से कहीं आगे निकाल चुका है.

NASA का गठन

स्पूतनिक लॉंच के बाद अमेरिकी सरकार हरकत में आई. NASA का गठन किया गया. और दोनों देशों में अंतरिक्ष में वर्चस्व को लेकर एक नई होड़ शुरू हो गई. जिसके ट्रिगर पोईंट को नाम दिया गया, ’स्पूतनिक मोमेंट’. ये फ़्रेज़ एक बार दोबारा चर्चा में है. फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन ने एक हाइपरसॉनिक मिसाइल का परीक्षण किया है.

हाइपरसॉनिक मतलब ऐसी मिसाइल जो ध्वनि की गति से तेज वार कर सकती है. मीडिया रिपोर्ट्स में सारा ज़ोर हाइपरसोनिक शब्द पर गया है. लेकिन इस मिसाइल की ख़ास बात इसकी स्पीड में नहीं बल्कि इसकी पहुंच में है. चीन से जिस सिस्टम का परीक्षण किया है. उसका नाम है, FOBS यानी फ़्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम. ऐसा नहीं है कि FOBS शब्द पहली बार उपयोग में लाया गया हो. 1950 के बाद जब कोल्ड वॉर की शुरुआत हुई तो अमेरिका और सोवियत संघ में न्यूक्लियर हथियार जमा करने की होड़ लग गई. दोनों देशों का तर्क था कि न्यूक्लियर लड़ाई को रोकने का एक ही तरीक़ा है, ‘म्यूचयलि अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन’. यानी जब तक दोनों देश एक दूसरे को तबाह करने की क़ाबिलियत रखते हैं. तब तक कोई भी दूसरे पर हमला करने का जोखिम नहीं उठाएगा.

तर्क सही भी था. दोनों देश एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते थे. ऐसे में शांति का रास्ता हथियारों से होकर गुजरता था. लेकिन इस तर्क में एक झोल पैदा हुआ 1960 में. जब सोवियत संघ ने एक न्यूक्लियर डिफ़ेंस सिस्टम पर काम करना शुरू कर दिया. इससे इक्वेशन में एक नया वेरीएबल पैदा हुआ. अगर एक देश न्यूक्लियर हथियार से अपनी रक्षा कर लेगा, तो ‘म्यूचअली अशुर्ड डिस्ट्रक्शन’ की कंडीशन फेल हो जाएगी.

60 के दशक में अमेरिका की रक्षा नीति

1960 में मॉस्को ने न्यूक्लियर डिफ़ेंस सिस्टम पर काम करना शुरू किया तब अमेरिका के राष्ट्रपति थे, लिंडन जॉनसन. उन पर इस बात का प्रेशर पड़ा कि अमेरिका भी अपना डिफ़ेंस सिस्टम तैयार करे. जॉनसन और उनके सहयोगियों को चिंता था कि ऐसा करने पर हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो सकती है. इसलिए उन्होंने एक तरकीब खोजी.

अमेरिका ने एक कमोबेश छोटे डिफ़ेंस सिस्टम पर काम करना शुरू किया. उम्मीद थी कि पब्लिक में ये संदेश जाएगा कि अमेरिका सुरक्षित है. और मॉस्को को भी कोई ख़तरा महसूस नहीं होगा. सितम्बर 1967 में तब के डिफ़ेंस सेक्रेटरी रॉबर्ट मेक्नमारा ने घोषणा की कि अमेरिका ने एक एंटी-बलिस्टिक मिसाइल सिस्टम (ABM) तैयार कर लिया है. खबर मॉस्को पहुंची तो रूस ने जवाबी तैयारी शुरू कर दी. अबकी बार वो डिफ़ेंस सिस्टम के बजाय एक ऐसे हथियार को डेवेलप करने वाले थे, जो अमेरिका के डिफ़ेंस को भेद सके.

ये नया हथियार या कहें कि नई तकनीक थी ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट. यानी अंतरिक्ष से हमला. ऑर्बिट का अर्थ ऊंचाई से नहीं बल्कि अवस्था से है. एक ICMB को भी बहुत ऊंचाई तक दागा जाता है. जहां से वो अपने निशाने पर हमला करती है. लेकिन ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट के काम करने के तरीक़े में अंतर है

ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम कैसे काम करता है?

इसमें रॉकेट की मदद से एक न्यूक्लियर वॉरहेड को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाता है. वॉरहेड ऑर्बिट में बिना इंजन के चक्कर काट सकता है. इसके बाद जब वो निशाने के ऊपर पहुंच जाता है तो वॉरहेड को वापस धरती की ओर लाया जाता है. ऐसा करने के लिए वॉरहेड के साथ एक छोटी रॉकेट मोटर लगाई जाती है. सोवियत संघ ने ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम बना तो लिया. लेकिन एक मुश्किल अभी बाकी थी. UN की आउटर स्पेस ट्रीटी, जिसके अनुसार कोई भी देश आउटर स्पेस में न्यूक्लियर हथियार लेकर नहीं जा सकता था. सोवियत ने टेकनिकेलिटी के ज़रिए इस समस्या का हल ढूंढा. उन्होंने तर्क दिया कि उनके सिस्टम में न्यूक्लियर वॉर हेड ऑर्बिट का पूरा चक्कर नहीं लगाता. इसलिए ट्रीटी का कोई नियम नहीं टूट रहा है. इसी कारण सिस्टम को नाम दिया गया, FOBS यानी फ़्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम. FOBS एक बड़ा हथियार था. बलिस्टिक मिसाइल के मुक़ाबले अब वो ज़्यादा तेज़ी से अमेरिका पर हमला कर सकते थे. इसके अलावा ऑर्बिट से निकलकर वॉरहेड कहां हमला करेगा, ये बताने में भी अमेरिका का डिफ़ेंस सिस्टम नाकाम था.

US के पास न्यूक्लियर हमले की चेतावनी के लिए अर्ली वॉर्निंग रडार भी थे, लेकिन उन सब की स्थिति नॉर्थ पोल की तरफ़ थी, जहां से बलिस्टिक मिसाइल अमेरिका तक पहुंच सकती थी. इसके बरअक्स FOBS के थ्रू ऑर्बिट का चक्कर लगाकर साउथ पोल से हमला किया जा सकता था.

हालांकि FOBS में कुछ ख़ामियां भी थीं. जैसे ऑर्बिट से दुबारा धरती की तरफ़ एंटर करते हुए एक्यूरेसी बनाए रखना बहुत मुश्किल था. जैसे स्पेस एक्सप्लोरेशन के शुरुआती दिनों में जब स्पेस कैप्सूल धरती पर उतरते थे, तो उनकी ठीक-ठीक पोजिशन पता लगाने में ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती थी. इसके अलावा FOBS के थ्रू एक समय में एक ही न्यूक्लियर हथियार हमला कर सकता था. इन सब कमियों के बावजूद 1960 से 1980 तक सोवियत संघ ने FOBS प्रोग्राम को ज़िंदा रखा. उस दौरान उसके पास एक समय में 18 FOBS मिसाइलों से हमला करने की ताक़त थी. 1970 के दशक में अमेरिका ने जब अपने न्यूक्लियर डिफ़ेंस सिस्टम को बंद किया. तब जाकर FOBS सिस्टम भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

1970 के दशक में चीन भी इस सिस्टम को पाने के फ़िराक में था. लेकिन अमेरिका ने डिफ़ेंस सिस्टम बंद किया तो 1980 में उसने भी इसकी मंशा छोड़ दी.

अब चीन ने क्यों किया परीक्षण?

अब सवाल उठता है कि इतने सालों बाद चीन दुबारा इस तकनीक का परीक्षण क्यों कर रहा है? और अगर ये तकनीक पुरानी है तो इतना हो हल्ला क्यों मचा हुआ है. उत्तर है अमेरीका का मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम. चीन से सीधा सा हिसाब लगाया है. अमेरिका ने न्यूक्लियर ज़ख़ीरे को देखते हुए चीन के सामने दो सवाल उठते हैं.

अगर अमेरिका चीन पर पहले हमला करता है तो चीन के पास वापसी हमले के लिए कितने हथियार बचेंगे? और चीन के कितने न्यूक्लियर हथियार अमेरिका के मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को भेज सकते हैं? अगर इसके जवाब में चीन के पास अच्छी ख़ासी संख्या में न्यूक्लियर हथियार हैं तो सब चंगा सी. लेकिन अगर चीन की ताक़त कम पड़ती है तो वो इसके लिए नए रास्ते खोजना चाहता है.

और चीन के लिए वो नया रास्ता है ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम. फाइनेंशियल टाइम्स की स्टोरी के अनुसार चीन की नई मिसाइल ने ऑर्बिट में प्रवेश किया और 40 हज़ार किलोमीटर का एक चक्कर लगाया. जिसके बाद वो धरती में प्रवेश हुई लेकिन लगभग 26 किलोमीटर से अपने निशाने से चूक गई. साफ़ है कि चीन इस तकनीक के ज़रिए नई ताक़त जुटा लेना चाहता है. ख़ासकर इंडो पसिफ़िक में बढ़ते तनाव, ताइवान की स्थिति, AUKUS डील और QUAD के नए ख़तरे को देखते हुए.

पिछले कुछ सालों में चीन की डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी से इस तकनीक को लेकर रिसर्च पेपर पब्लिश हुए हैं. इसलिए इस बात में कोई हैरत नहीं कि चीन कई समय से इस तकनीक पर नए सिरे से काम कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार चीन का नया सिस्टम FOBS से थोड़ा अलग है. ऑर्बिट से धरती में एंटर करते हुए मिसाइल में एक ग्लाइडर का उपयोग किया गया है. जिससे मिसाइल को उड़ान के दौरान कंट्रोल करने में मदद मिलती है. इससे फ़र्क़ ये पड़ेगा कि अमेरिका अगर मिसाइल को लोकेट कर भी लेता है तो बीच उड़ान में उसका रास्ता बदला जा सकता है.

9/11 का एंगल

इस कहानी में एक पेंच और है. 1973 में हुई US-सोवियत ट्रीटी के अनुसार अमेरिका सिर्फ़ एक या दो डिफ़ेंस सिस्टम रख सकता था. लेकिन 9/11 हमलों के बाद उसने न्यूक्लियर डिफ़ेंस सिस्टम पर नए सिरे से काम करना शुरू कर दिया था. 2002 में उसने अलास्का में एक नई नेशनल मिसाइल डिफ़ेंस साइट का निर्माण किया और न्यू यॉर्क में एक और सिस्टम बनाने का उसका प्लान है.

इनके ज़रिए वो नॉर्थ पोल की तरफ़ से आने वाली बलिस्टिक मिसाइल का मुक़ाबला कर सकता है. लेकिन 2002 के मुक़ाबले आज हालत बदल चुके हैं. चीन अब पुराना वाला चीन नहीं रहा. अमेरिकी रक्षा विभाग को इस बात का अंदेशा था कि चीन अपने न्यूक्लियर बेड़े में और हथियार जोड़ेगा. जो उसने किया भी. लेकिन नए FOBS सिस्टम के ज़रिए वो साउथ पोल की तरफ़ से भी हमला कर सकता है. जहां से बचाव का अमेरिका के पास कोई सिस्टम तैनात नहीं है. साउथ पोल की तरफ़ से हमले के लिए बलिस्टिक मिसाइल का उपयोग भी हो सकता है. लेकिन न्यूक्लियर लड़ाई में चंद सेकेंड जीत-हार का अंतर पैदा कर सकते हैं, ऐसे में FOBS के ज़रिए चीन को हमले में पूरे 10 मिनट का फ़ायदा मिल जाएगा.

अमेरिका चाहे तो अपने डिफ़ेंस सिस्टम में मज़बूती ला सकता है लेकिन सिर्फ़ एक डिफ़ेंस सिस्टम का बजट ही 3.6 करोड़ डॉलर के बराबर है. और उससे भी सिर्फ़ 5 मिसाइलों को रोका जा सकता है.

इसलिए चीन के परीक्षण का मसला ये नहीं है कि चीन के पास कोई नया हथियार आ गया है. बल्कि ये कि इससे न्यूक्लियर हथियारों की रेस में एक नया दौर शुरू हो सकता है. जो कहां जाकर रुकेगा कह नहीं सकते.

चीन भी इस बात को समझता है. इसीलिए उसने मिसाइल परीक्षण की बात को सिरे से नकार दिया है. उसका कहना है कि जुलाई के महीने में एक रियूजेबल स्पेस प्लेन का टेस्ट किया गया था और उसी को मिसाइल समझने में ग़लत फ़हमी हुई है.
अंत में तथ्य ये है कि चीन के पास आज भी इतने न्यूक्लियर हथियार हैं कि अमेरिका चाहकर भी उन्हें नहीं रोक पाएगा. इसके लिए 10 डिफ़ेंस सिस्टम भी कम पड़ जाएंगे. इसलिए ‘म्यूचअली अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन’ की कंडीशन आज भी लागू है. एक भी न्यूक्लियर हमले की स्थिति में किसी देश के बचने की कम ही उम्मीद है. नए न्यूक्लियर हथियारों के परीक्षण से किसी हमले से ज़्यादा इस बात का ख़तरा है कि इससे हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो सकती है. और दुनिया में दुबारा शीत युद्ध के दिन लौट सकते हैं.


LAC पर भारत-चीन की वायरल फोटो का सच यहां जान लीजिए

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