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बैंक डूबेगा तो नहीं? बीमार बैंकों की नब्ज़ आप भी पकड़ सकते हैं

बैंक भरोसे का दूसरा नाम है. आम आदमी के लिए अपने घर से भी सुरक्षित एक ठिकाना, जहां पसीने की कमाई जमा की जा सकती है. लेकिन यह भरोसा तब दरकने लगता है, जब एक के बाद एक कई बैंक सवालों के घेरे में आने लगते हैं. अभी लक्ष्मी विलास बैंक (LVB) से उठा बवंडर थमा भी नहीं था कि आरबीएल (RBL) बैंक पर आरबीआई की निगरानी ने शेयर मार्केट तक को झकझोर दिया. बैंक मैनेजमेंट से लेकर आरबीआई तक डैमेज कंट्रोल में उतरे. कहा गया कि बैंक में सबकुछ ठीक है. आरबीआई देश के सभी बैंकों का चौकीदार है और थानेदार भी. उस पर भरोसा तो बनता ही है. लेकिन यह सवाल किसी के भी जेहन में तैर सकता है कि क्या उसका बैंक ठीक-ठाक है. उसके लुटने-पिटने के हालात तो नहीं? असल में यह जानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. बस कुछ नंबरों का खेल है. जिसे समझकर आप भी अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या सचमुच कोई बैंक डूबने की कगार पर है. यहां हम आपको कुछ ऐसे ही फाइनेंशल इंडिकेटर्स के बारे में बताएंगे, जिनसे साफ संकेत मिलता है कि किसी बैंक की माली हालत कैसी है.

1. Non Performing Assets :कितना पैसा फंसा है?

मोटे तौर पर इसका मतलब है कि बैंक का पैसा कहीं फंसा है. कितना फंसा है, क्यों फंसा है और पानी खतरे के निशान से ऊपर तो नहीं है? ये सब जानने के लिए पहले ‘एसेट’ को समझ लीजिए. जब आप बैंक में पैसा जमा करते हैं, तो वह आपके लिए एसेट होता है, क्योंकि उससे आप ब्याज कमाते हैं. लेकिन वह जमा उस बैंक के लिए ‘लाइबिलिटी’ बन जाता है, क्योंकि उसे ब्याज देना है. लेकिन इसके ठीक उलट जब बैंक किसी को लोन देता है, तो वह लोन बैंक का एसेट कहलाता है, क्योंकि उससे बैंक की कमाई होती है. जब किसी लोन पर लगातार तीन महीने तक किश्तें नहीं आतीं, तो वह लोन बैंक की नजर में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट यानी एनपीए बन जाता है. एक ऐसा एसेट जो सिर्फ नाम का है. कमाई नहीं हो रही उससे.

लेकिन जरूरी नहीं कि रुकी हुई किश्तें कभी आएंगी ही नहीं. हो सकता है कि किसी की जॉब चली गई हो या कारोबार ठप हो गया हो. बाद में भुगतान शुरू भी हो सकता है. ऐसे में एनपीए को तीन कैटेगरी में देखा जाता है. इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए रामलाल, श्यामलाल और रंगलाल ने किसी बैंक से लोन लिया है. रामलाल ने करीब 3 महीने से कोई किश्त नहीं चुकाई है. श्याम लाल डेढ़ साल से चुप्पी मारे बैठा है. रंगलाल ने तीन साल से कोई किश्त नहीं चुकाई है और शहर छोड़कर जा चुका है.

सरकारी भाषा में रामलाल का लोन ‘सब-स्टैंडर्ड एसेट’ कहलाता है, जो फंसा तो है लेकिन आने की उम्मीद कायम है. श्याम लाल का लोन ‘डाउटफुल एसेट’ कहलाता है, यानी लोन डूब भी सकता है. रंगलाल का लोन जिसके रीपेमेंट का अब कोई चांस नहीं है, ‘लॉस ऑफ एसेट’ कहलाता है. रामलाल और श्यामलाल की किश्तें नहीं आने की भरपाई बैंक अपने निजी गुल्लक से पैसे निकालकर करता है. ताकि आगे लोन देने के लिए सिस्टम में पूंजी बनी रहे. अलग से इस पैसे डालने को ही बैंक की भाषा में प्रोविजनिंग कहते हैं.

3% नेट एनपीए है रेड सिग्नल 

मान लीजिए किसी बैंक ने एक करोड़ रुपये का लोन बांट रखा है. 95 लाख रुपये की किश्तें आ रही हैं. बाकी 5 पर्सेंट में से कुछ तीन महीने से नहीं आ रहीं और कुछ दो-तीन साल से. ऐसे में हम कह सकते हैं कि बैंक का ग्रॉस एनपीए 5% है. बैंक का कामकाज और लेन-देन का चक्र चलता रहे इसके लिए बैंक अपने पास से 3 लाख रुपये निकालकर सिस्टम में डाल देता है. इस प्रोविजनिंग के चलते बैंक का जो एनपीए 5 पर्सेंट था, अब वह घटकर 2 पर्सेंट रह गया. बैंकिंग भाषा में इस 5 पर्सेंट को ग्रॉस एनपीए और 2 पर्सेंट को नेट एनपीए कहते हैं. यह नेट एनपीए ही किसी भी बैंक की एसेट क्वालिटी और माली हालत के मामले में ज्यादा मायने रखता है. ग्लोबल स्टैंडर्ड और आरबीआई के मानकों पर कहा जाता है कि बैंक का नेट एनपीए 3 पर्सेंट से ज्यादा नहीं होना चाहिए. हो सकता है कि कोविड जैसे किसी आपात झटके में एनपीए बढ़ जाए. लेकिन अगर बैंक का नेट एनपीए 3 पर्सेंट से ज्यादा है और वह घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है, तो आप समझ लीजिए कि बैंक की माली हालत कभी भी खराब हो सकती है.

किस बैंक का है कितना NPA? 

जिस RBL Bank पर सवाल उठे हैं, उसका नेट एनपीए 2.14 पर्सेंट है. यह तस्वीर और साफ होगी, जब आपको पता चलेगा कि देश के सबसे बड़े और सफल प्राइवेट बैंक HDFC Bank का नेट एनपीए मात्र 0.4 पर्सेंट है. यह पिछले 10 साल में कभी 0.5 के ऊपर ही नहीं गया. सबसे कम एनपीए के मामले में दूसरा नंबर इंडसइंड बैंक का है, जिसका नेट एनपीए 0.84 पर्सेंट है. इसके बाद ICICI Bank (1.1%), Federal Bank (1.2%) और Kotak Mahindra Bank (1.5%) का नंबर आता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि कम एनपीए के लिहाज से इन टॉप-5 बैंकों में कोई सरकारी बैंक नहीं है. जी हां, देश के सबसे बड़े सार्वजनिक बैंक SBI का नेट एनपीए 1.52% है. लेकिन इससे भी ज्यादा हैरानी होगी जानकर कि PNB का ग्रॉस एनपीए 14 पर्सेंट और नेट एनपीए 5.7 पर्सेंट है. अगर आपने नीरव मोदी कांड के बारे में सुना है तो आपको बताने की जरूरत नहीं कि पीएनबी की यह हालत क्यों है. खैर यह सरकारी बैंक है. इसके हर घाटे की भरपाई देर-सबेर सरकार करेगी ही. लेकिन प्राइवेट बैंकों के मामले में 3 पर्सेंट से ज्यादा का नेट एनपीए बेहद जोखिम भरा माना जाता है. तो ऐसा बैंक जिसका नेट एनपीए 3 पर्सेंट से ज्यादा है, उसमें ढेर सारा पैसा जमा करना या उसके शेयर खरीदना कहीं से भी समझदारी नहीं होगी.

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आरबीआई की सांकेतिक तस्वीर

2. Capital Adequacy Ratio : 9% से कम तो बैंक में नहीं दम

बैंक की माली हालत चेक करने के लिए कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो (CAR) सबसे अहम संकेतकों में से एक है. यह बताता है कि बैंक के पास कम से कम इतना पैसा है कि उसके सारे जोखिम वाले लोन डिफॉल्ट कर जाएं तो भी वह जमाकर्ताओं की रकम लौटाने में हाथ खड़े नहीं करेगा. यह रेश्यो दर्शाता है कि कोई बैंक, डिफॉल्ट की आशंका से कितना दूर है. किसी बैंक का सीएआर इस बात से तय होता है कि उसकी कुल पूंजी के मुकाबले जोखिम वाले लोन कितने हैं. इसका एक तयशुदा फॉर्म्युला है. बैंक की कुल पूंजी में रिस्क वाले लोन की रकम से भाग देने पर जो अंक आता है, वही सीएआर है.

रिस्की लोन का मतलब ? 

बैंक आपको भी लोन देता है और सरकार को भी. छोटे कारोबारियों और बड़े कॉरपोरेट को भी. किसानों को और स्टूडेंट्स को भी. इनमें से सभी के लोन चुकाने की संभावना एक जैसी नहीं होती. जोखिम के पैमाने पर आरबीआई ने हर कटैगरी को एक वेटेज दे रखा है. मसलन, सरकारी लोन के डिफॉल्ट होने के चांसेज नहीं हैं, तो उसे 100% वेटेज मिलता है. उसके मुकाबले रियल एस्टेट और माइक्रो इंडस्ट्रीज को लोन रिस्की माना जाता है. इन्हें 50 पर्सेंट तक लोअर वेटेज मिलता है. फॉर्म्युले के मुताबिक बैंक की कुल पूंजी को इन्हीं ‘रिस्की वेटेड एसेट’ से डिवाइड करने पर CAR निकलता है. यह रेश्यो जितना ज्यादा होगा, बैंक के पास उतनी ही रिजर्व पूंजी होगी. मोटे तौर पर समझिए कि बैंक ने जिस रेश्यो में रिस्की लोन दे रखे हैं, उसी अनुपात में अपने पास एक रिजर्व रखना होगा. अगर यह रेश्यो 9% से कम है, तो मान लीजिए कि बैंक की माली हालत ठीक नहीं है.

किस बैंक का CAR कितना ? 

ग्लोबल मानकों (Basel Norms) के मुताबिक किसी बैंक का सीएआर 8% से कम नहीं होना चाहिए. लेकिन भारत में आरबीआई ने बैंकों को 1 पर्सेंट ज्यादा सेफ्टी के लिहाज से 9 पर्सेंट सीएआर मेनटेन करने की हिदायत दे रखी है. फिलहाल देश के सबसे मजबूत कहे जाने वाले प्राइवेट बैंक HDFC Bank का कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो 20 पर्सेंट, ICICI Bank का 19.5%, SBI का 13.74% और पीएनबी का PNB 15.20% है. खबरों में आए RBL Bank का रेश्यो 16.50 पर्सेंट है. यह इंडस्ट्री औसत से ज्यादा है ही, तय मानकों का दोगुना है. यानी बैंक में किसी भी संकट से निपटने के लिए पर्याप्त पूंजी है.

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नकदी की सांकेतिक तस्वीर

3. Liquidity Coverage Ratio: यानी 30 दिन का खर्चापानी 

किसी बैंक की माली हालत का तीसरा बड़ा इंडिकेटर है लिक्विड कवरेज रेश्यो (LCR). आरबीआई मानकों के तहत किसी भी बैंक के पास इतना हाई क्वालिटी लिक्विड एसेट (HQLA) होना चाहिए कि जब चाहे बेचकर या गिरवी रखकर अगले 30 दिन की देनदारियां पूरी की जा सके. इसके लिए आरबीआई ने 100 पर्सेंट एलसीआर मेनटेन करने का लक्ष्य रखा है. यह रेश्यो निकाला जाता है, बैंक के कुल हाई क्वालिटी लिक्विड एसेट में अगले एक महीने की देनदारियों या खर्चों से भाग देकर. हाई क्वालिटी लिक्विड एसेट का मतलब है, कैश, शेयर, म्यूचुअल फंड, बॉन्ड, ईटीएफ जो बाजार भाव पर तुरंत बिक जाएं. अगर किसी बैंक का एलसीआर 100 पर्सेंट है तो इसका मतलब है कि वह अपनी लिक्विड एसेट भुनाकर अगले एक महीने का खर्च (देनदारी) उठा सकता है. 30 दिन को इसलिए आधार बनाया गया है, क्योंकि आम तौर पर किसी भी बैंक में नकदी संकट या डिफाल्ट जैसी समस्या आने पर आरबीआई को वित्तीय दखल देने में कम से कम एक महीना लग जाता है. ऐसे में बैंक के पास पर्याप्त एसेट होने पर संकट टाला जा सकता है. अभी जिस RBL Bank को लेकर अटकलें शुरू हुई हैं, उसका लिक्विडिटी कवरेज 153 पर्सेंट है यानी जरूरत से डेढ़ गुना ज्यादा. यह HDFC Bank के 123 पर्सेंट एलसीआर से भी ज्यादा है.

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नकदी की सांकेतिक तस्वीर

4. Credit-Deposit Ratio: कितना लोन, कितना जमा?

यह भी बैंक की माली हालत का संकेतक है. क्रेडिट डिपॉजिट रेश्यो का मतलब है कि बैंक में जमा कुल रकम के मुकाबले कितना लोन दिया गया है. मसलन अगर किसी बैंक में कुल 100 रुपये जमा हैं और उसने 70 रुपये लोन पर उठा रखे हैं तो उस बैंक का क्रेडिट डिपॉजिट रेश्यो 70 पर्सेंट कहलाएगा. आम तौर पर एक अच्छे बैंक का क्रेडिट डिपॉडिट रेश्यो 80-90 पर्सेंट होता है. अगर यह बहुत कम है, तो मतलब साफ है कि बैंक की लोन ग्रोथ खराब है और उसका घाटे में जाना तय है. 100 से ऊपर जाना भी ठीक नहीं. इसका मतलब है कि जितना उसके पास जमा नहीं, उससे ज्यादा लोन बांट रखे हैं. फिर देनदारियां पूरी करने में दिक्कत आ सकती है. इस साल जून में देश के सभी बैंकों का औसत क्रेडिट डिपॉजिट रेश्यो 71.43 पर्सेंट पर आ गया था, जो नोटबंदी के बाद का सबसे कम रेश्यो था. अब भी बहुत ज्यादा बढ़ा नहीं है. आरबीएल बैंक का रेश्यो 74.1 है, जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है.

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बैंक की सांकेतिक तस्वीर

5. Net Interest Margin: बैंक की असली कमाई 

बैंक कैसे कमाई करता है, यह तो आप समझते ही होंगे. वह आपसे पैसे लेता है और एक तय रेट पर ब्याज देता है. फिर उसी पैसे को थोड़े ऊंचे रेट पर किसी और को लोन दे देता है. लोन से आए ब्याज में से जमा पर लौटाए गए ब्याज को घटाने के बाद जो रकम बचती है, वही बैंक का मुनाफा है. यह नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) और पर्सेंटेज में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) कहलाता है. यह इनकम भी बैंक की माली हालत बताती है. हालांकि बैंकों खासकर निजी बैंकों की इनकम और प्रॉफिट के कई और वैकल्पिक स्रोत भी हो सकते हैं. दूसरी तिमाही में एचडीएफसी बैंक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन 4.1%, जबकि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का करीब 3.1% रहा है. आरबीएल बैंक के लिए यह आंकड़ा करीब 4% रहा. यानी बैंक की ब्याज से कमाई ठीक-ठाक हो रही है. इंटरेस्ट मार्जिन जितना ज्यादा होगा, बैंक उतने ही फायदे में होगा.

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सांकेतिक तस्वीर

6. Current-Saving Ratio: चालू खाते में कितना जमा?

किसी बैंक में रकम मोटे तौर पर तीन खातों में जमा रहती है. करंट, सेविंग और फिक्स्ड अकाउंट. कुल जमा में करंट और सेविंग की हिस्सेदारी सबसे अधिक होती है. Current Account-Savings Account (CASA) रेश्यो का मतलब यह कि बचत खाते के मुकाबले चालू खाते में कितना पैसा जमा है. चूंकि करंट अकाउंट में जमा रकम पर बैंक कोई ब्याज नहीं देता, जबकि सेविंग अकाउंट पर करीब 3.5 पर्सेंट ब्याज तो देना ही पड़ता है. ऐसे में जितना ज्यादा पैसा करंट अकाउंट में होगा, बैंक के लिए फायदेमंद होगा. यानी जिस बैंक का कासा रेश्यो ज्यादा होगा, उसका मुनाफा और बैंक की भाषा में कहें तो नेट इंटरेस्ट मार्जिन बढ़ेगा. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का कासा रेश्यो करीब 46% है. आरबीएल बैंक का कासा रेश्यो करीब 35 पर्सेंट है.


वीडियो-RBI ने RBL बैंक के बोर्ड में निगरानी के लिए अपना आदमी नियुक्त किया

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