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जिन कांवड़ियों को आप उजड्ड मानते हैं, उनका ये चेहरा आपने कभी नहीं देखा होगा!

सावन में जब बादल मदमस्त गज की तरह आसमान में लोट रहे होते हैं और चिपचिपाती देह लिए इंसान माटी की महक को फेफड़ों में समेट रहे होते हैं, तब कांवड़िए घरों से निकलते हैं. प्रिय भोलेनाथ के लिए सैकड़ों किमी दौड़कर हरिद्वार से गंगाजल लाने के लिए. कंधे पर कांवड़, तन पर भगवा और नंगे पैरों में घुंघरू... पर सावन जितना खूबसूरत है, कांवड़ियों की राह उतनी ही मुश्किल. दी लल्लनटॉप ने आपके लिए ये सफर तय किया. पेश है इसका हासिल.

सावन में कांवड़ यात्रा पर निकलने वाले कांवड़िए. एक भेष, एक मकसद, एक मिजाज. मोदी काका होते, तो ‘ट्रिपल वन’ कहते. जितना रोचक कांवड़ियों का सफर होता है, उतना ही रोचक है इनका बर्ताव जानना.

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80 के दशक तक कांवड़ यात्रा बड़ी डीसेंट होती थी. गंगाजल लाकर उसे शिवलिंग पर चढ़ाना ही कांवड़ियों का इकलौता मकसद होता था. तब लोग अब जितनी तादाद में कांवड़ यात्रा पर नहीं जाते थे और न ही ये इतनी आसान थी. पर अब कांवड़ यात्रा का स्वरूप बदल चुका है. अब ये संगठित हो गई है, जिसमें डीजे होता है, हथियार होते हैं और जमकर नशा होता है. परिणाम के तौर पर सड़कों पर होने वाले छोटे-मोटे मामले भी बड़ा हिंसक रूप ले लेते हैं.

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नशे और हथियारों की वजह से होने वाली उजड्डई ने कांवड़ियों की छवि खराब की है. हर साल सावन में ढेर सारे ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें आम जनता कांवड़ियों की मनमानी या उनके हमले की शिकार बनती है. संख्या में बहुत ज्यादा होने और धर्म का तत्व जुड़े होने की वजह से कई मामलों में पुलिस भी कांवड़ियों पर हाथ नहीं डालती. आम लोगों में कांवड़ियों का डर भी है. जो लोग कभी कांवड़ यात्रा पर नहीं गए, वो कांवड़ियों से बात करने में भी डरते हैं. लोगों को लगता है कि वो हमेशा नशे में रहते हैं और बात-बात पर झगड़ा करते हैं.

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लेकिन कांवड़ यात्रा में कांवड़ियों के साथ रहने पर पता चलता है कि ये समस्याएं कांवड़िया होने की वजह से नहीं, बल्कि इंसान होने की वजह से होती हैं. जब लाखों लोगों को अपने जैसे रंग में साथ पाते हैं, तो इनके अंदर की हिंसा और भड़क जाती है. फिर हमें हॉकी और बेसबॉल बैट से होने वाली मारपीट दिखती है. ऐसे लोग अगर कांवड़ में न भी हों, तब भी इतने ही हिंसक साबित हो सकते हैं. होते भी हैं. रोड रेज, मॉब लिंचिंग जैसे मामले देख सकते हैं.

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कांवड़ यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं की उम्र धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है. पहले व्यस्क और अधेड़ उम्र के लोग ज्यादा होते थे. पर अब 24-25 साल और इससे कम उम्र के लोगों की संख्या बढ़ गई है. टीनएज के अति-उत्साही बच्चे तो आते ही हैं, कई कांवड़िए अपने साथ 10-12 साल के बच्चों को भी ले आते हैं. वैसे भी सभी कांवड़िए ट्रक और ट्रैक्टरों पर लदकर समूह में नहीं आते हैं.

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मेरठ से हरिद्वार के रास्ते पर आपको कई पति-पत्नी भी मिल जाएंगे, जो अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ कांवड़ यात्रा पर जाते हैं. बुजुर्ग भी होते हैं. आधी यात्रा में पैर चोटिल कर चुके कांवड़िए भी होते हैं. स्वाभाविक है कि ऐसा कोई भी इंसान हिंसा में शामिल नहीं होगा.

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कांवड़ियों के साथ एक और दिलचस्प बात है. अगर आप उनके जैसे भगवा कपड़े नहीं पहने हैं, तो आप कांवड़ का हिस्सा नहीं हैं. और अगर आप कांवड़ का हिस्सा नहीं हैं, तो कांवड़ियों के साथ आप हमेशा रिस्क पर हैं. लेकिन, अगर आप उन्हीं के भेष में हैं, तो कोई आपसे कुछ नहीं कहेगा.

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यहां तक कि आपके किसी बुरे व्यवहार पर भी तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी जाएगी. साथी कांवड़ियों से आप खाने-पीने की चीजें मांगने से लेकर गाड़ी में बिठाने के लिए भी कह सकते हैं. न तो वो बुरा मानते हैं और न मना करते हैं.

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आपस में उनके इस प्यार भरे बर्ताव के पीछे एक कारण समानता भी है. कांवड़ यात्रा में पश्चिमी यूपी के ढेर सारे लोग जाते हैं. यूपी वो राज्य है, जहां जातिवाद बहुत है. लेकिन जब आप भगवा कपड़े पहनकर कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं, तो सारे एक हो जाते हैं.

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सब ‘बोल बम’ कहते हुए साथ चलते, खाते, रहते हैं. कांवड़ यात्रा में पेश आने वाली समस्याएं अगर दूर हो जाएं, तो ये समाज का एक बेहतर हिस्सा साबित हो सकती है. हालांकि, इसकी संभावना न के बराबर है.


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