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इस देश के लोगों का भगवान दुनिया छोड़ गया

भूमिबोल अदुल्यदेज. थाईलैंड के किंग. वो भी ऐसे जिन्होंने 70 साल तक अपनी बादशाहत को बनाए रखा. ऐसा करने वाले वो थाईलैंड के अकेले किंग हैं. चक्री वंश के 9वें किंग. जिसकी शुरुआत 1782 में हुई थी. 88 साल की उम्र में बीमारी की वजह से गुरुवार को उनकी मौत हो गई. और थाईलैंड के एक  दौर का अंत हो गया. क्योंकि थाईलैंड के लोग भूमिबोल को भगवान की तरह मानते थे. 18 साल का लड़का जब किंग बना तो उस वक्त राजशाही तंत्र की नाव थाईलैंड में डगमगा रही थी. और आज जब उस किंग की मौत हुई तो वहां राजशाही कहीं ज्यादा मज़बूत हो चुकी है. तभी तो उनके बेटे को किंग बनाने की घोषणा हो चुकी है.

थाईलैंड के लोग किंग भूमिबोल को भगवान मानते थे. मंदिर में लगी उनकी तस्वीर. Reuters
थाईलैंड के लोग किंग भूमिबोल को भगवान मानते थे. एक बौद्ध मंदिर में लगी उनकी तस्वीर. Reuters

भूमिबोल को ‘पूमीपोन’ के नाम से भी पुकारते हैं. जैसे ही उनकी मौत की खबर आई थाईलैंड में गम की लहर दौड़ गई लोग दहाड़े मारकर रोने लगे. जिस हॉस्पिटल में वो एडमिट थे वहां हजारों की तादाद में भीड़ थी, जिनकी आंखों में आंसू थे.

मौत की खबर मिलने पर हॉस्पिटल के बाहर हजारों की तादाद में लोग जमा हो गए. Reuters
मौत की खबर मिलने पर हॉस्पिटल के बाहर हजारों की तादाद में लोग जमा हो गए. Reuters

थाईलैंड के प्रधानमंत्री प्रत्युत चान ओचा ने कहा कि 64 साल के युवराज महा वजीरालोंगकोर्न देश के अगले किंग होंगे. थाईलैंड में सालभर शोक मनाया जाएगा और तीस दिन तक नेशनल फ्लैग झुका रहेगा. 

थाईलैंड, साउथ ईस्ट एशियन कंट्री है. जिसके ईस्ट बॉर्डर पर लाओस और कम्बोडिया, साउथ में मलेशिया और वेस्ट में म्यांमार है. साल 1946 में इस देश के किंग बने भूमिबोल. 5 दिसंबर 1927 को अमेरिका में पैदा हुए. और 70 साल तक राजगद्दी संभाले रहे. इस दौरान कई बार आर्मी ने तख्तापलट किया, लेकिन वो ऐसी ताकत बन के उभरे कि लोगों को लगा ये शख्स ही थाईलैंड में स्टेबिलिटी ला सकता है. वो संवैधानिक तरीके से बनाए गए किंग थे, जिसके पास कुछ ही पॉवर थी. लेकिन जब-जब राजनीतिक संकट आया तो अपना दखल देकर उस को कंट्रोल कर लिया.

गद्दी संभालने का किस्सा भी अजीब है

जब भूमिबोल पैदा हुए उस वक्त उनके पिता प्रिंस माहिडोल अदुल्यदेज हार्वर्ड में पढ़ाई कर रहे थे. बाद में उनकी फैमिली थाईलैंड लौट आई. महज दो साल के ही थे जब उनके पिता चल बसे. इसके बाद उनकी मां अपने बच्चों को लेकर स्विट्ज़रलैंड चली गईं. उनकी फैमिली में एक भाई आनंद और एक बहन गलयानी वधाना थीं. वहीं सबकी पढ़ाई हुई. भूमिबोल महज 18 साल के थे जो किंग की गद्दी संभालनी पड़ गई.

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक हुआ ये था कि उनके बड़े भाई आनंद थाईलैंड के किंग बने हुए थे. और एक दिन निशानेबाजी के दौरान एक एक्सीडेंट हो गया, जिसमें आनंद को गोली लगी. और मौत हो गई. लेकिन ये सब कैसे हुआ. मतलब ये एक एक्सीडेंट था या मर्डर. कुछ सच सामने नहीं आया, क्योंकि ये राजमहल से जुड़ा था और वहां की जानकारी छापने की इजाजत नहीं थी. आनंद को राजगद्दी तब मिली थी जब उनके चाचा किंग प्रजादिपोक ने साल 1935 में राजगद्दी त्याग दी थी. सिर्फ इसलिए क्योंकि थाई राजशाही का तेजी से पतन हो रहा था. जिसकी शुरुआत 1932 में हो गई थी. अचानक हुई भाई की मौत के बाद भूमिबोल को किंग बनना पड़ा. जबकि उनकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी. ताजपोशी के बाद फिर से भूमिबोल स्विट्ज़रलैंड पढ़ने के लिए लौट गए. और इस दौरान उनके प्रतिनिधि ने थाईलैंड पर शासन किया. पर 1957 तक तो भूमिबोल सिर्फ नाम के ही किंग थे, क्योंकि थाईलैंड आर्मी के कब्जे में था.

भूमिबोल की पत्नी क्वीन सिकिरित बीच में) उनके बेटे प्रिंस महा Reuters
भूमिबोल की पत्नी क्वीन सिरिकित (बीच में) उनके बेटे प्रिंस महा वजीरालोंगकोर्न (लेफ्ट में ). Reuters

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक जब भूमिबोल पेरिस में थे, तब उनकी मुलाकात सिरिकित से हुई. वो उनको पसंद कर बैठे. सिरिकित फ्रांस में थाईलैंड के डिप्लोमेट की बेटी थीं. 28 अप्रैल 1950 में शादी रचा ली. और उसके एक हफ्ते बाद बैंकाक में फिर से नए किंग की तरह राजगद्दी सौंपी गई. भूमिबोल को फोटोग्राफी करने और गीत लिखने तो शौक था ही. साथ ही पेंटिंग और लेखन भी करते थे.

किंग भूमिबोल को गीत लिखने के अलावा फोटोग्राफी का शौक था. Reuters
किंग भूमिबोल को गीत लिखने के अलावा फोटोग्राफी का शौक था. Reuters

कैसे राजशाही को संभाला

सितंबर 1957 में जनरल सरित धनराजत ने सत्ता हथिया ली. लेकिन किंग भूमिबोल अदुल्यदेज ने बड़ी ही चतुराई से एक आदेश जारी कर सरित को राजधानी का सैनिक रक्षक घोषित कर दिया. और उसके शासन में राजशाही को जिंदा कर दिया. लेकिन सरित ने उन रिवाजों को कायम करना शुरू किया, जिसके तहत लोग किंग के सामने अपने हाथों और घुटनों पर रेंगते थे. ये ही वजह थी कि 1973 में लोगों में बगावत के सुर फूटे और आर्मी ने लोकतंत्र के समर्थकों पर गोलियां चलाईं. मगर किंग भूमिबोल ने चालाकी दिखाई और लोगों की हमदर्दी समेटने के लिए प्रोटेस्ट कर रहे लोगों को राजभवन में शरण दी. नतीजा ये हुआ कि उस टाइम प्रधानमंत्री जनरल थानम कित्तीकार्चन के शासन का अंत हो गया. 1980 और 1992 में भी विद्रोह हुए लेकिन किंग भूमिबोल ने सबको कंट्रोल कर लिया.

वो देश के विभिन्न हिस्सों में गए और बहुत काम कराया, ताकि लोगों का विश्वास जीत सकें. और राजशाही में उनका यकीन पक्का कर सकें.

1988 में द न्यूयॉर्क टाइम्स को भूमिबोल ने इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि सब कुछ आर्मी के हाथ में था. मेरे पास कुछ ही पॉवर थी. मेरे लिए चुनौती थी कि कम पॉवर में ऐसा क्या करूं जिससे लोगों का विश्वास हासिल किया जा सके. तब मैंने इंडस्ट्रियल और एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट पर फोकस किया. और बहुत सारे काम कराए.

डेविड के. व्याट ने 1982 में अपनी बुक ‘थाईलैंड: ए शार्ट हिस्ट्री’ में लिखा कि किंग भूमिबोल ने राजशाही को सोशल और पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशन में बदल दिया. जिसकी वजह से वो कामयाब किंग रहे. जब भूमिबोल बीमार रहने लगे तो रानी सिरिकित ने जिम्मेदारी संभाली और 12 सौ डेवलपमेंट प्रोजेक्टों को पूरा कराया. साथ ही थाई हैंडीक्राफ्ट्स पर भी जोर दिया. राजशाही को संभालने में ‘लेसे मजेस्ते’ कानून ने भी मदद की. इस कानून के तहत राजमहल की कोई भी बात पब्लिक नहीं की जा सकती थी. इस पर कंट्रोवर्सी भी हुई थी.

अब क्या हैं हालात

मई 2014 में फिर से तख्तापलट हुआ. उससे पहले भी काफी राजनीतिक उठापटक हुई. तो 2014 में जनरल प्रयुत चान ओचा ने सत्ता पर कब्जा कर लिया. और कुछ महीने बाद ही आर्मी की तरफ से नियुक्त संसद ने प्रयुत चान ओचा को प्रधानमंत्री बना दिया. प्रयुत चान ओचा ने प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक सुधार लाने का भरोसा दिलाया. लेकिन उनके आलोचकों का कहना है उनका प्रधानमंत्री बनना सिर्फ इसलिए था ताकि वो सत्ता को राजशाही में तब्दील कर सकें क्योंकि उनसे पहले प्रधानमंत्री आम चुनाव होने के बाद बने थे. इसलिए प्रयुत चान ओचा उनकी पार्टी को बर्बाद करना चाहते थे. जो अपने मकसद में कामयाब भी हुए. अब भूमिबोल का बेटे महा वजिरालोंगकोर्न नए किंग बनेंगे.

थाईलैंड के प्रधानमंत्री प्रयुत चान ओचा और उनकी पत्नी किंग को नमन करते हुए. Reuters
थाईलैंड के प्रधानमंत्री प्रयुत चान ओचा और उनकी पत्नी किंग को नमन करते हुए. Reuters

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