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सूडान में तख्तापलट के पीछे की पूरी कहानी समझिए

हे देशप्रेमियों!

ये हमारे शहीदों के सम्मान का वक़्त है

उठो और उन्हें सलाम करो

जिनके लहू ने मुल्क़ की नींव मज़बूत की है

ये लाइनें साउथ सूडान के राष्ट्रगान की है. इसे विभाजन से ठीक पहले लिखा गया था. विभाजन से पहले तक सूडान, क्षेत्रफल के नज़रिए से अफ़्रीका का सबसे बड़ा मुल्क़ हुआ करता था. 2011 में सूडान दो हिस्सों में बंट गया. एक हिस्सा बना साउथ सूडान, जबकि नॉर्थ सूडान ने ‘सूडान’ वाला नाम अपना लिया. साउथ सूडान के इस राष्ट्रगान को जुबा यूनिवर्सिटी के म्युजिक डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स ने तैयार किया था. इस डिपार्टमेंट को चलाने वाले मोहम्मद अली का ताल्लुक नॉर्थ सूडान से था. अली अरब मूल के थे. वो समुदाय, जिनसे खफ़ा होकर साउथ के ईसाईयों ने अपने लिए अलग मुल्क़ की मांग रखी थी. ये विरोधाभास था. इसके बावजूद इसमें अविश्वसनीयता नहीं थी.

कहते हैं कि सूडान अलग-अलग संप्रदायों से मिलकर बना एक सुंदर सा गुलदस्ता था. इसे अफ़्रीकी महाद्वीप में एक प्रयोग की तरह देखा जाता था. फिर ये गुलदस्ता कैसे बिखर गया? आज के सूडान के पीछे की ऐतिहासिक कहानी क्या है? सू़डान में तख़्तापलट एक रूटीन प्रोग्राम कैसे बना? 29 साल तक एकछत्र राज चलाने वाले ओमर अल-बशीर के साथ क्या हुआ था? और, आज के दिन सूडान चर्चा में क्यों है? सब विस्तार से बताते हैं.

चाइनीज गॉर्डन

1850 के दशक में ब्रिटेन, चीन में अफ़ीम बेचना चाहता था. चीनी साम्राज्य ने अपने यहां अफ़ीम के व्यापार पर बैन लगा रखा था. महत्वाकांक्षाओं के टकराव में लड़ाई हुई. इसमें ब्रिटेन ने चीन को घुटनों पर ला दिया. युद्ध के अंतिम समय में ब्रिटेन ने अपनी एक टीम राजदरबार में भेजी. चीनी शासकों से सरेंडर की शर्तों पर बात करने के लिए. इस टीम में टाइम्स का एक पत्रकार भी था.

जैसे ही टीम दरबार में पहुंची, उन्हें बंधक बना लिया गया. तीन दिनों तक उन्हें बंधक बनाकर रखा गया. टॉर्चर के चलते पत्रकार समेत कई लोगों ने दम तोड़ दिया. इससे ब्रिटिश हाई कमिश्नर लॉर्ड एल्गिन नाराज़ हो गए. उन्होंने आदेश दिया कि चीनी सम्राट का समर पैलेस जला दो. ब्रिटिश आर्मी ने वही किया. हालांकि, आग लगाने से पहले उन्होंने कीमती कलाकृतियों को बाहर निकाल लिया था. इन्हें बाद में ब्रिटिश म्युजियम में रखा गया. इस पैलेस को चीन का ‘लाज-महल’ कहा जाता है. इस लूट की आग आज भी चीन को परेशान करती रही है.

जिस अफसर ने समर पैलेस में आगजनी और लूट का ज़िम्मा संभाला था, उसका नाम था चार्ल्स गॉर्डन. ब्रिटिश सैन्य इतिहास के सबसे काबिल अफ़सरों में से एक. कहा जाता है कि उसने अपने जीवन में एक भी लड़ाई नहीं हारी. ताइपिंग विद्रोह को दबाने में भी उसका अहम योगदान था. इंग्लैंड में जनता गॉर्डन की दीवानी हो चुकी थी. उसकी बहादुरी के लिए उसे ‘चाइनीज़ गॉर्डन’ का नाम भी मिला.

बगावत की शुरुआत

चीन के बाद गॉर्डन का अगला प्रोजेक्ट सूडान में था. वहां ब्रिटेन के वरदहस्त से इजिप्ट शासन चला रहा था. 1880 के दशक में मोहम्मद अहमद नाम का एक विद्रोही नेता खड़ा हुआ. उसने ख़ुद को पैगंबर मोहम्मद का अवतार घोषित कर दिया था. वो सूडान को बाहरी शासन से मुक्त कराना चाहते थे. अहमद की सेना ने इजिप्ट को बुरी तरह पीटा. 1884 में वे लोग ख़ारतूम को घेरकर बैठ गए.

घबराए इजिप्ट ने ब्रिटेन से मदद मांगी. ब्रिटेन सैन्य मदद भेजने के पक्ष में नहीं था. उसने इजिप्ट से ख़ारतूम को खाली करने के लिए कहा. इस काम को सुचारू ढंग से चलाने के लिए चार्ल्स गॉर्डन को वापस सूडान भेजा गया. गॉर्डन ने वहां पहुंचकर स्क्रिप्ट ही बदल दी. उसने ख़ारतूम को खाली कराने की बजाय विद्रोहियों को कुचलने का प्लान बनाया. इस काम के लिए सरकार की मदद ज़रूरी थी. गॉर्डन ने ब्रिटिश सरकार को चिट्ठी लिखी. सरकार टाल-मटोल करती रही. तब तक मोहम्मद अहमद की सेना ने खारतूम पर धावा बोल दिया था. 26 जनवरी 1885 को चार्ल्स गॉर्डन का सिर काटकर दीवार पर टांगा जा चुका था. अगले तीन दिनों तक ख़ारतूम में बेहिसाब क़त्लेआम चला. अहमद की सेना ने ख़ारतूम समेत सूडान के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया. उन्होंने इस साम्राज्य का नाम ‘महदिया’ रखा. कुछ महीने बाद ही अहमद की मौत हो गई. हालांकि, उसके बाद भी महदिया साम्राज्य चलता रहा.

तख्तापलट

उधर ब्रिटेन में सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा था. जनता चार्ल्स गॉर्डन की हत्या का बदला चाहती थी. सरकार ने बदला लिया. 1899 में ब्रिटेन और इजिप्ट ने सूडान पर फिर से क़ब्ज़ा कर लिया. मोहम्मद अहमद के बचे-खुचे परिवार को जेल में बंद कर दिया गया. सूडान में ब्रिटेन और इजिप्ट का गठजोड़ 1955 तक चला. एक जनवरी 1956 को सूडान आज़ाद हो गया. आज़ादी के समय तय हुआ था कि सूडान में लोकतंत्र का शासन होगा. लेकिन शुरुआत से ही इसमें पेच फंसता रहा. पहले तो चुनाव में देरी हुई. आज़ादी मिलने के दो साल बाद चुनाव हुए. गठबंधन सरकार बनी. प्रधानमंत्री का पद अब्दुल्लाह ख़लील के पास आया. कुर्सी पर बैठते ही मुसीबतों का दौर शुरू होने वाला था.

दक्षिणी सूडान ईसाई-बहुल क्षेत्र था. आज़ादी की लड़ाई में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया था. लेकिन जब सत्ता चलाने की बात आई तो मुस्लिम-बहुल नॉर्थ सूडान आगे निकल गया. सिविल अधिकारियों के आठ सौ उच्च पदों में से सिर्फ़ चार पद दक्षिणी सूडान के पास आए थे. इसको लेकर भी नाराज़गी बढ़ती जा रही थी. जून 1958 में दक्षिणी सूडान के सांसदों ने इस्तीफ़ा दे दिया. राजनीतिक संकट काबू से बाहर जा रहा था. इसको सुधारने की बजाय प्रधानमंत्री ख़लील ने एक और ब्लंडर कर दिया. ख़लील ने सेना के मुखिया जनरल इब्राहिम अबूद से समझौता कर लिया. पीएम की मिलीभगत से सेना ने सरकार का तख़्तापलट किया. ये सूडान में सैन्य तख़्तापलट की शुरुआत थी. जिसकी नई किस्त हर कुछ सालों में रिलीज़ होती रही.

तख्तापलट

अबूद का शासन 1964 तक चला. देशभर में लोकतंत्र की मांग एक बार फिर तेज होने लगी. अक्टूबर 1964 में अबूद को इस्तीफ़ा देना पड़ा. उसी साल सूडान में लोकतंत्र की वापसी हुई. लेकिन ये बस पांच सालों का मेहमान था. जब तक लोकतंत्र रहा, सूडान में तरक्की की बयार रही. हालांकि, सरकार बुनियादी दिक्कतों को सुधारने में नाकाम साबित हुई.

सेना ने इसका फायदा उठाया. 25 मई 1969 को ज़फ़र नुमैरी ने सरकार पलट दी. नुमैरी अगले 16 सालों तक शासन में रहे. इस दौरान उन्होंने तीन अहम काम किए. पहला, उन्होंने अपनी जान बचाई. जुलाई 1971 में नुमैरी का तख़्तापलट की साज़िश रची गई. उन्हें तीन दिनों तक घर मे बंद रखा गया. एक दिन वो खिड़की से कूदकर भाग गए. इसके बाद उन्होंने साज़िश को बुरी तरह कुचल दिया. दूसरा काम था आदिस अबाबा एग्रीमेंट. फ़रवरी 1972 में उन्होंने साउथ सूडान के विद्रोहियों के साथ समझौता किया. साउथ सूडान को ऑटोनॉमी दी गई. इस तरह सूडान का पहला सिविल वॉर बंद हुआ.

नुमैरी का तीसरा अहम काम था, हसन अल-तुराबी को अटॉर्नी जनरल बनाना. तुराबी को सूडान के सबसे बड़े इस्लामिक नेताओं में गिना जाता है. 1983 में तुराबी के कहने पर नुमैरी ने देश भर में शरिया कानून लागू कर दिया. छोटी-छोटी ग़लतियों पर हाथ काटना, अवैध संबंध पर पत्थर मारकर हत्या, शराब पर बैन आदि. इस तरह के कानून पूरे सूडान में लागू किए गए. साउथ सूडान की ऑटोनॉमी भी ख़त्म कर दी गई. ये 1972 के आदिस अबाबा समझौते का उल्लंघन था. शरिया लॉ से साउथ सूडान के ईसाई नाराज़ थे. उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. सूडान में एक बार फिर सिविल वॉर शुरू हो गया.

ये जफ़र नुमैरी के लिए दोहरा झटका था. सूडान आर्थिक मोर्चे पर पहले से ही पस्त हो रहा था. सिविल वॉर ने हालात और बिगाड़ दिए थे. तीन अप्रैल 1985 को डॉक्टर्स, प्रफ़ेसर्स और वकीलों के कुछ संगठन साथ आए. उन्होंने नुमैरी के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट करने की अपील की. लोग नाराज़ तो थे ही. उन्हें गुस्सा निकालने का रास्ता मिल गया था. प्रोटेस्ट के बाद नुमैरी देश छोड़कर भाग गए. वो 14 सालों तक इजिप्ट में रहे. निर्वासन में.

बंटवारा

14 बरस बाद नुमैरी को वापस बुलाने वाला नेता उन्हीं की तरह सत्ता में आया था. सैन्य तख़्तापलट के जरिए. नाम ओमर अल-बशीर. 1986 में सूडान में चुनाव हुए थे. चुनाव के बाद सादिक़ अल-महदी ने सरकार बनाई. अल-महदी साउथ सूडान की समस्या को सुलझाना चाहते थे. उन्होंने साउथ सूडान के विद्रोही धड़े से बातचीत का दिन भी तय कर लिया. 18 सितंबर 1989 को सूडान सरकार और SPLM के बीच बैठक होनी थी. लेकिन उससे पहले ही ब्रिगेडियर ओमर अल-बशीर ने तख़्तापलट कर दिया. ओमर अल-बशीर ने अगले 29 सालों तक सूडान पर राज किया. बशीर के शासन को डार्फ़र के वॉर क्राइम्स और सूडान के बंटवारे के लिए याद किया जाता है. एक समझौते के तहत 2011 में जनमत-संग्रह हुआ. साउथ सूडान के 99 फीसदी लोगों ने अलग होने के प्रस्ताव पर हामी भरी. उसी साल साउथ सूडान अलग हो गया.

2009 में इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) ने बशीर पर डार्फ़र में नरसंहार और रेप जैसे संगीन अपराध कराने के आरोप में मुकदमा दायर किया. बशीर सत्ता में रहते हुए ICC का मुकदमा झेलने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष थे. हालांकि, उन्हें इससे तब तक कोई फर्क नहीं पड़ा, जब तक कि सूडान की जनता उनसे आजिज नहीं आ गई. सूडान के विभाजन के समय देश का 75 फीसदी तेल भंडार साउथ में था. विदेशी प्रतिबंधों से जूझ रहे सूडान की हालत पहले से ही खराब थी. जब तेल से होने वाली आमदनी कम हुई तो सरकार ने बुनियादी चीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी पर रोक लगा दी. जब प्रोटेस्ट हुए तो सरकार ने बात करने की बजाय सेना उतार दी.

बशीर की गिरफ्तारी

2018 में सरकार ने ईंधन और ब्रेड पर दी जाने वाली सब्सिडी भी खत्म कर दी. दिसंबर आते-आते प्रदर्शनकारी उग्र होते चले गए. एक तरफ सरकार प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करती, दूसरी तरफ विरोध और बढ़ जाता. फरवरी 2019 में सूडान की सिक्योरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज ने ऐलान किया कि राष्ट्रपति ओमर अल-बशीर कुर्सी छोड़ रहे हैं. बशीर ने बात मानने की बजाय आपातकाल लगा दिया. उन्होंने राज्य की सरकारों को भंग कर दिया. वहां मिलिट्री लीडर्स बिठा दिए गए.

इसके बावजूद विरोध नहीं थमा तो बशीर ने अंतिम कार्ड खेला. उन्होंने कहा कि इस टर्म के अंत तक रहने दो. अगले चुनाव में हिस्सा नहीं लूंगा. लेकिन जनता इस भुलावे में आने के लिए तैयार नहीं थी. छह अप्रैल 2019 को प्रदर्शनकारी मिलिट्री हेडक़्वार्टर पहुंच गए. सेना ने उनके ऊपर गोली चलाने से मना कर दिया. आख़िरकार 11 अप्रैल को ऐलान हुआ कि ओमर अल-बशीर को गिरफ़्तार कर लिया गया है. बशीर पर कई मामलों में मुकदमा चल रहा है. अगस्त 2021 में उन्हें ICC को सौंप दिया गया. वहां उनके ऊपर वॉर क्राइम्स समेत कई और मामलों में केस चलेगा.

बशीर की गिरफ़्तारी के बाद क्या हुआ?

उसके बाद एक अस्थायी सरकार बनाई गई थी. इसमें सिविलियन और मिलिट्री मिलकर सरकार चला रहे थे. सिविलियन वाले हिस्से में कई सारी पार्टियां मिली हुईं थी. इसका नाम रखा गया था, फ़ोर्सेज़ ऑफ़ फ़्रीडम एंड चेंज (FFC). इन सबने तय किया हुआ था कि 2023 में चुनाव कराए जाएंगे. तब तक अस्थायी सरकार काम करती रहेगी. लेकिन पिछले कुछ समय से FFC में मनमुटाव चल रहा था. कुछ धड़े आरोप लगा रहे थे कि बलिदान की तुलना में उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं मिला. इसी को लेकर पिछले हफ़्ते दो प्रोटेस्ट शुरू हुए. एक तरफ़ के प्रदर्शनकारी मिलिट्री रूल की वापसी की मांग कर रहे थे. वहीं, दूसरा धड़ा पूरी तरह से सिविलियन रूल लाने की मांग को लेकर अड़ा हुआ था. प्रधानमंत्री अब्दुल्ला हमदोक बार-बार चेता रहे थे कि ये सूडान के इतिहास का सबसे गंभीर राजनीतिक संकट है.

इसी चेतावनी के बीच 25 अक्टूबर को सेना ने फिर से तख़्तापलट कर दिया. तड़के सुबह उठने पर लोगों को पता चला कि प्रधानमंत्री के बारे में अपुष्ट ख़बरें आ रहीं है. क्या? मसलन, कुछ अज्ञात सैनिकों ने पीएम को हाउस अरेस्ट में रखा है. कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्रियों को हिरासत में ले लिया गया है. दोपहर होते-होते ख़बरें पुष्ट हो गई. हालांकि, अभी भी प्रधानमंत्री का कोई अता-पता नहीं है. सेना ने आपातकाल लगा दिया है. सेना का कहना है कि अभी वाले हालात में देश की शांति और स्थिरता को ख़तरा था, इसलिए ऐसा कदम उठाना पड़ा. सेना ने स्टेट टीवी पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है. राजधानी के एयरपोर्ट को बंद कर दिया गया है. हर तरफ़ बैरिकेडिंग लगा दी गई है.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने लोगों को तख़्तापलट के विरोध में उतरने की अपील की है. लोग उतरे भी. सेना के साथ हुई मुठभेड़ में 12 लोगों के घायल होने की ख़बर है. सिविलियन काउंसिल ने ख़ून की आख़िरी बूंद तक विरोध करने की बात कही है. यूनाइटेड नेशंस, यूरोपियन यूनियन समेत कई देश इस घटना की निंदा कर रहे हैं. उन्होंने जल्द से जल्द अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की है. इसका क्या असर होता है, देखने वाली बात होगी.


दुनियादारी: सूडान का इतिहास और तख्तापलट की असली कहानी ये है

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