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'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' के बारे में बताया गया है सबसे बड़ा झूठ!

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हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से ईडी ने करप्शन और काले धन के मामले में पूछताछ की. मुख्यमंत्री ने ईडी दफ्तर के बाहर मुट्ठी बांधकर कहा,” सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में है.”

अब मुख्यमंत्री ने करप्शन के मुद्दे पर क्या सोचकर ये शेर पढ़ा, नहीं पता. हालांकि इंडिया ही नहीं, पूरी दुनिया में नेता फंसने पर देशभक्ति की दुहाई देने लगते हैं. तमाम तानाशाह भी यही तरीका अपनाते हैं.

पर अगर वीरभद्र सिंह ने ये सोचकर ये शेर पढ़ा कि रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखा है, तो ये गलत है. हालांकि चारों ओर ये बात फैलाई गई है कि बिस्मिल ने ही ये शेर लिखा था. पर ये सच नहीं है. इस शेर को शाह मोहम्मद हसन बिस्मिल अजीमाबादी ने लिखा था. कलकत्ता से पब्लिश होने वाले उर्दू जॉर्नल असर जदीद में 1922 में ये छपा था. ये गजल काजी अब्दुल गफ्फार की पत्रिका सबाह में भी छपी थी.

bismil azimabadi
बिस्मिल अजीमाबादी twocircles.net

वैसे तो इनका नाम शाह मोहम्मद हसन ही था. ये बिस्मिल अजीमाबादी के नाम से लिखते थे. बिस्मिल पटना से थे. पटना की मशहूर खुदाबख्श लाइब्रेरी में इनकी लिखी कविता की मैनुस्क्रिप्ट रखी हुई है.

बिस्मिल उर्दू भाषा का एक शब्द है. इसका मतलब होता है रेस्टलेस. बेचैन या दिल से घायल. इस चीज को शब्द से ज्यादा दिल के अंदर समझा जा सकता है. पर क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद भी बिस्मिल लिखा करते थे अपने नाम के पीछे. वो बिस्मिल के नाम से शेर भी लिखा करते थे. इस शेर का मिजाज भी उनके मिजाज से मेल खाता था. पर उनके नाम के साथ इस शेर के जुड़ने की कहानी कुछ और है.

Bismil's dead body in father's lap 1927
रामप्रसाद बिस्मिल का शव लिए हुए उनके पिताजी

मिलीगजट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक बिस्मिल अजीमाबादी के बेटे सैयद शाह हमीद हसन बिहार की विधान परिषद के सदस्य हुआ करते थे. उनके मुताबिक ब्रिटिश सरकार ने इस शेर के साथ लिखी हुई उनकी पूरी गजल ही जब्त कर ली थी. उनके नाम पर अरेस्ट वारंट भी निकाल दिया था. 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में फांसी होने से पहले ये शेर पढ़ा था. तभी ये शेर उनके नाम के साथ जुड़ भी गया और अमर भी हो गया. पर लिखने वाले बिस्मिल और पढ़ने वाले बिस्मिल दोनों ने ही नहीं सोचा होगा कि इस शेर को लोग करप्शन के आरोप लगने पर भी पढ़ेंगे. 1901 में पैदा हुए शायर बिस्मिल अजीमाबादी 1978 तक जिंदा रहे थे.

बिस्मिल अजीमाबादी ने देश के बंटवारे पर भी एक नज्म लिखी थी:

बयाबान-ए-जनों में शाम-ए-ग़रबत जब सताया की

मुझे रह रह कर ऐ सुबह वतन तू याद आया की

आज़ादी ने बाज़ू भी सलामत नहीं रखे

ऐ ताक़त-ए-परवाज़ तुझे लाए कहां से

कहां क़रार है कहने को दिल क़रार में है

जो थी ख़िज़ां में वही कैफ़ियत बहार में है

चमन को लग गई किसकी नज़र खुदा जाने

चमन रहा न रहे वो चमन के अफ़साने

पूछा भी है कभी आप ने कुछ हाल हमारा

देखा भी है कभी आके मुहब्बत की नज़र से

किस हाल में हो, कैसे हो, क्या करते हो बिस्मिल

मरते हो कि जीते हो ज़माने के असर से…

‘कहां तमाम हुई दास्तान बिस्मिल की

बहुत सी बात तो कहने को रह गई ऐ दोस्त’

बिस्मिल अजीमाबादी की कुछ और नज्में:

1. ये बुत फिर अब के बहुत सर उठा के बैठे हैं
ख़ुदा के बंदों को अपना बना के बैठे हैं

हमारे सामने जब भी वो आ के बैठे हैं
तो मुस्कुरा के निगाहें चुरा के बैठे हैं

2. तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम
घबरा के पूछते हैं अकेले में जी से हम

मजबूरियों को अपनी कहें क्या किसी से हम
लाए गए हैं, आए नहीं हैं ख़ुशी से हम

3. अब मुलाक़ात कहाँ शीशे से पैमाने से
फ़ातिहा पढ़ के चले आए हैं मय-ख़ाने से

क्या करें जाम-ओ-सुबू हाथ पकड़ लेते हैं
जी तो कहता है कि उठ जाइए मय-ख़ाने से

4. चमन को लग गई किस की नज़र ख़ुदा जाने
चमन रहा न रहे वो चमन के अफ़्साने

सुना नहीं हमें उजड़े चमन के अफ़्साने
ये रंग हो तो सनक जाएँ क्यूँ न दीवाने

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