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'वाइस': एक ख़ौफनाक पोलिटिकल फिल्म जो हर वोटर को देखनी चाहिए

'ऑस्कर वाली फ़िल्में' सीरीज [सीज़न-2] में आठवीं फिल्म है डायरेक्टर एडम मकै की Vice.

उस भयावह दिन, उस कमरे में जो लोग मौजूद थे उन्होंने जो देखा उसमें कनफ्यूजन था, भय था, अनिश्चितता थी लेकिन डिक चेनी ने कुछ और देखा. वो जो किसी ने भी नहीं देखा. उसने इसमें अवसर/मुनाफा देखा.

– 11 सितंबर 2001 की सुबह साढ़े नौ बजे अमेरिकी राष्ट्रपति का आपातकालीन ऑपरेशन केंद्र. ट्विन टावर्स में दो विमान जा टकराए हैं. पूरे अमेरिका में आतंक का माहौल है. राष्ट्रपति बुश यहां नहीं है. उप-राष्ट्रपति डिक चेनी ने जिम्मा संभाल रखा है. अभी भी बहुत से यात्री विमान आसमान में हैं. रुल्स ऑफ इंगेजमेंट पता नहीं है. जब पेंटागन से फोन करके रक्षा सचिव डॉनल्ड रम्सफील्ड पूछते हैं तो डिक चेनी कहते हैं कि जो भी विमान खतरनाक प्रतीत होता हो उसे मार गिराओ. प्रेज़िडेट के बजाय ये अथॉरिटी वो देते हैं, उनका ये रूप देखकर राज्य सचिव कोंडोलीज़ा राइस अवाक रह जाती हैं. यहां आते-आते पृष्ठभूमि से फिल्म के नरेटर की आवाज गूंजती है वो ये कहते हुए डिक चेनी की कहानी सुनानी शुरू करता है. वो चेनी जिसकी शैतानी सोच के कारण लाखों निर्दोष बच्चे, औरतें, आम लोग मारे गए. जिसने पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिर कर दिया. जिसकी गलती से आतंकवाद में आईएसआईएस जैसे राक्षस का जन्म हुआ. जिसके फैसलों ने विश्व में शरणार्थी संकट पैदा किया. ट्रंप जैसा आदमी राष्ट्रपति बना. और जिसने विश्व के भविष्य को ऐसे खतरनाक रास्ते पर धकेल दिया जिसमें पीछे लौटना अब संभव नहीं.

ये कहानी 1963 से शुरू होती है. अमेरिका के वायोमिंग राज्य में कहीं. दिशाहीन युवक डिक चेनी (क्रिश्चन बेल) दिन में बिजली के खंभे ठीक करता है. रात में ठेके/बार में खूब शराब पीता है और झगड़े करता है. उसकी इन दो आदतों के कारण येल यूनिवर्सिटी ने निकाल दिया गया था. उसकी गर्लफ्रेंड लिन (एमी एडम्स) बार-बार जेल से छुड़ाकर तंग आ गई है.

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बोल देती है – “तुममें से पेशाब और सस्ती शराब की बदबू आती है. तुम एक मोटे से ज़ीरो हो. या तो सुधरो, नहीं तो मेरे पास डेटिंग के लिए बहुत से विकल्प हैं.” लिन की ये फटकार, डिक का भविष्य और दुनिया का इतिहास बदल देती है. वो सुधरता है. दोनों शादी कर लेते हैं. वॉशिंगटन आ जाते हैं. डिक राष्ट्रपति निक्सन के प्रशासन में इंटर्न का काम करने लगता है.

यहां से वो हैरतअंगेज राजनीतिक प्रगति करता है. शराबीपना छोड़ने के सिर्फ 11 साल के अंदर वो अमेरिका के राष्ट्रपति जेरॉल्ड फोर्ड का चीफ ऑफ स्टाफ बन जाता है. वाइट हाउस का सबसे कम उम्र का चीफ ऑफ स्टाफ. न जाने उसकी महत्वाकांक्षा का आकार कितना विशाल था.

उसके बाद वो महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर रहता है. 1995 में वो प्राइवेट सेक्टर में जाता है. तेल क्षेत्र की और मिलिट्री ठेके लेने वाली बड़ी कंपनी हैलिबर्टन में सीईओ बन जाता है. कुछ साल बाद जॉर्ज डबल्यू बुश (सैम रॉकवेल) राष्ट्रपति के चुनाव में खड़ा होता है तो डिक को उप-राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव देता है क्योंकि उसके पास अनुभव की कमी है और डिक के पास लंबा अनुभव है. शातिर डिक चाल चलता है. पहले मना कर देता है.

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करीब 40 साल लंबा अमेेरिकी सरकार/राजनीति का अनुभव रखने वाला डिक चेनी, इस मुलाकात में क्लूलेस बुश के साथ किसी खिलौने की तरह खेलता है. जिसका फायदा दोनों को ही होता है. बुश के हाथ से चुनाव निकल गए होते हैं तो डिक की चतुराई से ये लोग चुनावों को हथियाकर सत्ता में आ जाते हैं. चेनी जैसे मोहरे सेट करता है उससे राष्ट्रपति का पद सांकेतिक हो जाता है और उसका कार्यकारी. और ये करने के बाद वो एनर्जी कंपनियों के साथ बैठकें चालू करता है जिनका रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. लेकिन बाद में जानकारियों से पता चलता है कि वो इराक में तेल के कुओं के बारे में होने वाली बैठकें थीं.

बुश फिर मिन्नत करता है तो वो कहता है कि – ‘उप-राष्ट्रपति सांकेतिक पद है, मैं ऐसा कमजोर पद क्यों लूंगा जब बड़े पदों पर रहा हूं और अब प्राइवेट सेक्टर की बड़ी कंपनी चला रहा हूं.’ कहता है कि ‘शायद ऐसा कर सकते हैं कि मैं प्रशासन, मिलिट्री, एनर्जी, विदेश नीति जैसे “रोजमर्रा के काम” हैंडल कर लूं.’ बुश उसके कांटे में फंस जाता है. मान जाता है.

नतीजतन आगे ये होता है कि डिक चेनी अमेरिकी इतिहास का सबसे ताकतवर उप-राष्ट्रपति बनता है. राष्ट्रपति उसकी जेब में होता है, जो उसे करना होता है वो करता है.

उसके शैतानी कृत्यों में सबसे बड़ा कृत्य होता है 9/11 के हमलों की आड़ में 2003 में इराक पर हमला करवाना.

फिल्म देखते हुए साफ पता चलता है कि सबको पता था इराक के पास कोई जन-विध्वंस के हथियार नहीं हैं, न ही इराक की भूमि से कोई आतंकवाद पनपा, न ही वो अमेरिका के लिए कोई खतरा था. ये सब बातें डिक को पता थीं. अमेरिका की दर्जनों इंटेलिजेंस एजेंसियों में से किसी की इराक में रुचि नहीं थी, कोई सबूत नहीं था लेकिन उसने चाल चलते हुए झूठ प्लांट किया कि इराक में सद्दाम हथियार बना रहा है. बाद में जब पता चल गया कि इराक में कोई हथियार नहीं था और लाखों इराकी लोगों की हत्याएं अकारण ही की गईं, तो भी डिक ने कभी माफी नहीं मांगी. वो देश और दुनिया को गलत रास्ते पर ले जाता गया.

उसके ऐसा करने के पीछे सबसे बड़ा मकसद पैसा होता है –  मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स और कॉरपोरेट मुनाफे का लालच. देश की सुरक्षा के नाम पर अमेरिका की जनता मूर्ख बनती गई.

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पुलित्ज़र अवॉर्ड विनिंग कार्टूनिस्ट टोनी ऑफ, और पॉल कॉम्ब्स के व्यंग्य चित्र जो युद्ध कराने वाले असली चेहरों को दिखाते हैं.

‘वाइस’ को बनाया है एडम मकै ने. जो इससे पहले जर्नलिज़्म पर कटाक्ष करने वाली ‘एंकरमैन: द लैजेंड ऑफ रॉन बर्गुंडी’ (2004) और 2008 के सब-प्राइम संकट के असली कारणों का पता लगाने वाली उम्दा फिल्म ‘द बिग शॉर्ट’(2015) लिख और डायरेक्ट कर चुके हैं. डिक चेनी पर फिल्म बनाने से पहले उन्होंने उनके ऊपर लिखी गई 18 किताबें पढ़ीं जिसमें खुद डिक की लिखी बुक “इन माई टाइम” (2012) शामिल है. उन्होंने पत्रकारों द्वारा की गई विस्तृत कवरेज का भी भरपूर इस्तेमाल किया.

इस फिल्म को उन्होंने ‘द बिग शॉर्ट’ की तरह एक विशिष्ट हास्य और कथानक के साथ प्रस्तुत किया है लेकिन इसे देखने का अनुभव बहुत ही ट्रैजिक और पीड़ा में पागल कर देने वाला है. क्योंकि मौजूदा समय में सरकारें वही सब चालें चल रही हैं जो डिक ने चलीं. लोग आतंकवाद से सुरक्षा के नाम पर अपनी निजता और दूसरे नागरिक अधिकार सरकार को देने को तैयार हो गए.

दिसंबर 2018 में भारत की सरकार ने भी ऐसा ही किया लेकिन लोग नींद में सोए रहे. सरकार ने 10 एजेंसियों को ये शक्तियां दे दीं कि वे नागरिकों के कंप्यूटरों की निगरानी कर सकती हैं, उनकी जानकारियां हासिल कर सकती है. डिक चेनी ने आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर जेनेवा समझौते की धूर्त व्याख्या करते हुए कैदियों से पूछताछ के अमानवीय और इंसानी गरिमा को तार-तार करने वाले तरीकों की इजाजत सीआईए और प्राइवेट मिलिट्री ठेकेदारों को दी.

उसने इन तरीकों को बड़ी कुटिलता से पूछताछ की विस्तृत तकनीक (Enhanced interrogation techniques) का नाम दिया. इनमें वॉटरबोर्डिंग (जिसे ‘उड़ी’ में भी देखा गया और किसी को कोई आपत्ति तक नहीं हुई), लंबे समय कैदियों के एक ही मुद्रा में खड़े रखना, नंगा करके कुत्तों से डराना और कई घृणित तरीके शामिल थे. इनकी तस्वीरें भी अमेरिकी मीडिया में लीक हुई थीं जिनमें सैनिक कैदियों को नंगा करके, उनके गले में पट्टा डालकर खेल रहे हैं, फोटो खींच रहे हैं, हंस रहे हैं.

ये तक किया गया कि कैदियों को नंगा करके उनके लिंग आपस में बांधे गए, फिर एक को धक्का दिया जाता और सारे गिरते. उन्हें एक-दूसरे के साथ ओरल सेक्स करवाया जाता.

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इराक की अबु गरीब जेल की फोटोज़. कुछ यहां प्रकाशित भी नहीं की जा सकतीं. ये वहशीपन और अपराध सामने नहीं आते अगर यहीं पर तैनात एक सैनिक जोसेफ डार्बी इन्हें सेना की अपराध जांच शाखा को लीक नहीं करता. डार्बी के अंदर इंसानियत थी. लेकिन उसकी कीमत डार्बी को चुकानी पड़ी. आज भी वो किसी गोपनीय जगह पर अपनी पत्नी के साथ रहता है. उसे अपनी ही सेना से जान का खतरा बना हुआ है.

इसे उद्घाटित करने वाली डायरेक्टर एलेक्स गिबनी की डॉक्यूमेंट्री ‘टैक्सी टू द डार्क साइड’ मस्ट वॉच है. 2008 में इसे बेस्ट डॉक्यूमेंट्री फीचर का ऑस्कर मिला था. अपनी स्पीच में गिबनी ने कहा था – “मेरी प्यारी पत्नी ऐन सोच रही थी कि मैं रोमैंटिक कॉमेडी बनाऊंगा. लेकिन ईमानदारी से कहूं तो ग्वांटानेमो और अबु गरीब (इराक युद्ध के दौरान और बाद में इन जेलों में बंदियों के साथ क्रूरता की हदें पार की गईं) के बाद मेरे लिए ऐसा करना संभव नहीं था. ये अवॉर्ड दो लोगों को समर्पित है जो अब हमारे साथ नहीं हैं. युवा अफगान टैक्सी ड्राइवर दिलावर (दिसंबर 2002 में उसे अमेरिका ने अफगानिस्तान में उठा लिया. बगराम की ब्लैक साइट में उसे अमानवीय यातनाएं दी गईं. पांचवें दिन उसने दम तोड़ दिया. वो निर्दोष था. बगराम में पूछताछ की इंचार्ज कैप्टन कैरोलीन वुड को वीरता का ब्रॉन्ज़ स्टार दिया गया.) और मेरे पिता जो वर्ल्ड वॉर-2 के दौरान एक नेवी एंटेरोगेटर थे जिन्होंने मुझसे ये फिल्म बनाने का अनुरोध किया था क्योंकि उन्हें गुस्सा था कि (अमेरिकी सरकार द्वारा) कानून के साथ कैसा खिलवाड़ किया जा रहा है.”

फिल्म के अंत में गिबनी के पिता कहते भी हैं – “मेरे लिए ये कल्पना करना भी संभव नहीं कि रम्सफील्ड, बुश और चेनी जैसे शीर्ष अधिकारी न सिर्फ इन यातनाओं की सफाई देंगे, बल्कि उनकी वकालत तक करेंगे. इस चीज ने अमेरिकी सरकार में मेरी आस्था को तबाह कर दिया. क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और कोरियाई युद्ध के दौरान हम लोगों में ये सेंस था कि हम लोग अच्छाई की तरफ हैं. कि अमेरिका में हमेशा न्याय मिलता है. लोगों से भद्र बर्ताव होता है. एक कानून का शासन हुआ करता था. हम कभी ये भूले नहीं. युद्धकाल में भी एक कायदा-कानून होता था जिनका लोगों ने पालन किया. ये वो चीज थी जिसमें हमारा यकीन था. क्योंकि इसी ने अमेरिका को दूसरों से अलग बनाया.”

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अमेरिकी सत्ता तंत्र में डिक और लिन का ऊपर की ओर आते जाना और अकूत संपत्ति इकट्ठा करना,  भारत जैसे देशों (रूस, चीन, यूरोप वगैरह) के धनिकों/oligarchs की सच्चाई है. वो चंद लोग जो सही मायनों में मुल्क चलाते हैं और लोग लोकतंत्र के अंतर्गत होने के भुलावे में जीते जाते हैं.

‘वाइस’ में तीन मौकों पर हैलिबर्टन का जिक्र आता है. इनसे पता चलता है कि डिक चेनी ने इराक पर हमला किया तो मुनाफा कमाने के लिए. उप-राष्ट्रपति पद ग्रहण करने से पहले तैयारियों में लगे डिक और उसकी पत्नी लिन बातें कर रहे हैं. डिक कहता है – “हैलिबर्टन ने 2.6 करोड़ डॉलर का एग्जिट (नौकरी समाप्ति) पैकेज दिया है. हम जितनी उम्मीद कर रहे थे उससे दुगुना.” इस पर लिन कहती है – “वो लोग मूर्ख नहीं हैं.”

यानी उस कंपनी को पता है कि उप-राष्ट्रपति बनने के बाद डिक कंपनी को मदद पहुंचाएगा. ऐसा हुआ भी. जब इराक युद्ध चालू हो जाता है तो बिना बोली के ठेका सीधे हैलीबर्टन को मिलता है. फिर ये कंपनी मनमाने बिल बनाने लगती है. अपने उत्पादों की कीमतें बाजार कीमत से बहुत ऊंची लगाने लगती है. बिलिंग में धांधली चलती है. एक सीन है जहां एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी, रक्षा सचिव रम्सफील्ड, उप-सचिव वॉल्फोविट्ज बात करते हैं:

“सैन्य अधिकारीः हैलीबर्टन केबीआर के बिलों में जो प्रैक्टिस (इराक युद्ध में रक्षा सेवा आपूर्ति के लिए ओवरबिलिंग) अपनाई जा रही है उसे लेकर हमें चिंताएं हैं. जैसा कि आप जानते हैं, उन्हें बिना नीलामी के सीधे ही जो ठेके प्राप्त हुए वो बहुत बड़े बड़े हैं.
रम्सफील्डः हम चिंतित नहीं हैं. क्या हम हैं?
डिकः बिलकुल नहीं.
वॉल्फोविट्ज़ः रक्षा सचिव और उप-राष्ट्रपति महोदय ने अभी कहा कि वे चिंतित नहीं हैं. तो, क्या हम अब ईरान के बारे में बात करें?”

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डॉनल्ड रम्सफील्ड (स्टीव कैरल) के ऑफिस में इंटर्न के रूप में डिक चेनी ने करियर शुरू किया था. तीन दशक बाद जब डिक ने बुश प्रशासन में रम्सफील्ड को रक्षा सचिव बनाया. और प्लान बताया कि कैसे उसने राष्ट्रपति पद को अपने उप-राष्ट्रपति कार्यालय के आगे गौण कर दिया है. यहां तक कि इंटेलिजेंस के मेल भी राष्ट्रपति कार्यालय से पहले उसके ऑफिस में आएंगे. तो ये देखकर रम्सफील्ड का दिमाग भी चकरा जाता है जिसे लेकर कहा जाता था कि जो उसकी राह में आता है उसे वो काट देता है. रम्सफील्ड चेनी का ये रूप देख पूछता है – “क्या तुम उससे भी ज्यादा क्रूर हो गए हो डिक, जितने पहले हुआ करते थे?”

इराक में घुसपैठ करने के बाद के वर्षों में हैलीबर्टन के शेयर की कीमत में अभूतपूर्व 500 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. ये सीधे-सीधे युद्ध से कमाया जाने वाला मुनाफा था. जिसे धड़ल्ले से डिक चेनी और बुश वगैरह ने अंजाम दिया. चेनी और हैलीबर्टन का रिश्ता बहुत पुराना है. 1991 में जब सीएनएन पर दुनिया खाड़ी युद्ध के जरिए पहली बार लाइव वॉर कवरेज देख रही थी उस समय चेनी अमेरिका के रक्षा सचिव थे. युद्ध खत्म होने के बाद उनको कुवैत के पुर्ननिर्माण का काम मिला, खासकर तेल के कुओं में जो आग लगी थी उनको बुझाने का काम.

इसके लिए चेनी ने हैलीबर्टन की कंपनी ब्राउन एंड रूट को ठेका दिलवाया. 1993 में सोमालिया युद्ध में यही कंपनी अफ्रीका पर राज कर रही थी. 1996 में अमेरिका ने बोस्निया के लिए 190 करोड़ डॉलर का जो भारी बजट दिया उसमें से 13 प्रतिशत ब्राउन एंड रूट को गया. और तब तक तो चेनी सरकारी क्षेत्र से निजी क्षेत्र में आ चुके थे और अक्टूबर 1995 में हैलीबर्टन के सीईओ बन गए.

एडम मकै अपनी फिल्म में चेनी के अलावा बाकी लोगों के कॉरपोरेट जुड़ावों को नहीं टटोल पाते लेकिन राष्ट्रपति बुश ने भी यही किया था. इराक युद्ध से बहुत कमाई करने वाली कार्लाइल ग्रुप की कंपनी यूनाइटेड डिफेंस में बुश और उसके पिता (राष्ट्रपति बुश सीनियर) दोनों ने काम किया था. दंग करने वाली बात तो ये है कि इसी कंपनी के निवेशकों में उस ओसामा बिन लादेन का परिवार भी था जिसके अमेरिका के ट्रेड टावर्स पर हमला करने का बहाना लेकर इन सब लोगों ने इराक में 6 लाख लोगों की हत्या की. 9/11 हमले के छह हफ्ते बाद ही यूनाइटेड डिफेंस को शेयर बाजार में उतारा और एक दिन में उसने 23.7 करोड़ डॉलर की कमाई की.

जब ये कंपनी इराक युद्ध से पैसे कमा रही थी तब बुश के पिता इसमें बड़े पद पर नौकरी कर रहे थे. राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत होने के बाद एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी?

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‘वाइस’ के एक दृश्य में डिक चेनी जब वो हैलिबर्टन के सीईओ के तौर पर अरब देशों में विजिट कर रहा होता है. दूसरी झलक माइकल मूर की डॉक्यूमेंट्री की जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बुश सीनियर कार्लाइल ग्रुप के प्रतिनिधि के तौर पर सऊदी की टॉप लीडरशिप से मुलाकात कर रहे हैं.

रॉबर्ट ग्रीनवॉल्ड की 2006 में आई डॉक्यूमेंट्री ‘इराक फॉर सेलः द वॉर प्रॉफिटीयर्स’ और माइकल मूर की 2004 में प्रदर्शित फिल्म ‘फॉरेनहाइट 9/11’ देखने के बाद दुनिया को बर्बाद करने वाले इन नेताओें, प्राइवेट मिलिट्री इंडस्ट्री और कॉरपोरेट लालच का अविश्वसनीय चेहरा दिखता है. अधिकतर आम लोगों को इस सच का कोई अंदाजा नहीं. ये भी स्पष्ट होता है कि युद्ध शुरू करवाकर किसी का भला नहीं किया जा रहा था. मूर की डॉक्यूमेंट्री में अमेरिकी और इराकी दोनों पक्षों को दिखाया जाता है.

इराक युद्ध में भेजा गया एक सैनिक मरने से पहले अपनी मां को ख़त में लिखता है – “हे ममा, मैं कॉल नहीं कर पाया हूं. इन लोगों ने सात दिन पहले फोन ले लिया. मुझे आपका लेटर और बॉक्स मिला. बहुत कूल है. आपका पहला पोता उसी दिन जन्मा जिस दिन आपका सबसे बड़ा बेटा. सब कैसे हैं? मैं ठीक हूं. हम यहां रेत और तूफानी हवाओं के बीच हैं. इंतजार कर रहे हैं. जॉर्ज (बुश) की दिक्कत क्या है. शायद अपने बाप (बुश सीनियर) जैसा बनने की कोशिश कर रहा होगा. उसने हमें (फौज) बिना वजह यहां भेजा. ख़ैर, मैं बहुत गुस्से में हूं ममा. मैं सच में उम्मीद करता हूं कि लोग इस मूर्ख को दोबारा राष्ट्रपति न चुन लें.”

डॉक्यूमेंट्री में एक दूसरा सीन है जिसमें एक छोटी लोडिंग टैक्सी में एक इराकी आदमी संभवतः अपने ही परिवार की ताजा लाशें ले जा रहा हैं. उनमें से बमुश्किल कुछ महीने के एक बच्चे का ख़ून से सना, निर्जीव शरीर उठाते हुए आवेश में कहता है – “इस बच्चे का क्या अपराध था? क्या ये अमेरिकी सैनिकों से लड़ने जा रहा था? कायर कहीं के. मैं बैट लेकर बाहर गया था और सैनिक से कहा कि मुझे मार! मैं कुरान की कसम खाता हूं. जो लोग मौत से नहीं डरते वो मरते नहीं हैं.” ये बोलकर वो टैक्सी लेकर चला जाता है. पीछे बच्चा, औरत व अन्य लाशें नजर आती हैं.

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कलेजे की गहराइयों से अमेरिका और उसके सैनिकों को बद्दुआएं देता हुआ वो इराकी आदमी. हाथ में बच्चे का शव है, दूसरी ओर एक महिला व अन्य लोगों की लाशें.

ऑस्कर 2019 में ‘वाइस’:
आठ नामांकन मिले.

बेस्ट पिक्चर – डीडी गार्डनर, जैरेमी क्लाइनर, एडम मकै और कैविन मैसिक
बेस्ट डायरेक्टर – एडम मकै
बेस्ट एक्टर – क्रिश्चन बेल
सपोर्टिंग एक्टर – सैम रॉकवेल
सपोर्टिंग एक्ट्रेस – एमी एडम्स
ओरिजिनल स्क्रीनप्ले – एडम मकै
फिल्म एडिटिंग – हैन कॉरविन
मेकअप और हेयरस्टाइलिंग – ग्रेग केनॉम, केट बिस्को और पेट्रिशिया डहॉनी

सीरीज़ की अन्य फिल्मों के बारे में पढ़ें:
Green Book – ऑस्कर 2019 की सबसे मनोरंजक और पॉजिटिव कर देने वाली फिल्म
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Bohemian Rhapsody – उस रॉकस्टार की कहानी जो एड्स से मरा और लोग रात भर रोए
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