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कहानी उस दिलेर भारतीय की जो अपना सबसे खराब गेम खेलकर भी ओलंपिक्स मेडल ले आया

साल 1952. केडी जाधव ने भारत का पहला व्यक्तिगत ओलंपिक मेडल जीता. पर इस जीत को सेलिब्रेट कर रहे लोगों को नहीं पता था कि अगली बार ये मौका लगभग पांच दशक बाद आएगा. जी हां. 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक्स के पूरे 44 साल बाद, साल 1996 में भारत को अपना दूसरा व्यक्तिगत ओलंपिक मेडल मिला. और ये मेडल जीता टेनिस लेजेंड लिएंडर पेस ने. दी लल्लनटॉप की ओलंपिक स्पेशल सीरीज विजेता के दूसरे एपिसोड में हम लिएंडर पेस के इसी कमाल की बात करेंगे.

# कौन हैं Leander Paes?

लिएंडर पेस भारतीय टेनिस के सचिन तेंडुलकर हैं. कितनी क्लीशे बात है ना? लेकिन क्या करें, ये क्रिकेटप्रेमी देश पेस की सफलताओं को इससे आसान तरीके से नहीं समझ सकता. पेस भारत और विश्व टेनिस के महानतम प्लेयर्स में से एक हैं. खासतौर से डबल्स में तो उनके आगे पूरी दुनिया के कम ही प्लेयर्स टिक पाते हैं. पेस ने डबल्स और मिक्स्ड डबल्स में मिलाकर कुल 18 ग्रैंडस्लैम खिताब जीते हैं. 90 के दशक में टेनिस की दुनिया में एंट्री करने वाले पेस 30 साल तक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ टेनिस प्लेयर्स में से एक रहे.

लगातार सात ओलंपिक्स खेलने वाले पेस की उपलब्धियां इतनी हैं कि उनका ज़िक्र किया जाए तो एक किताब तैयार हो जाएगी. लेकिन यहां हम किताब नहीं लिख रहे इसलिए अपना फोकस क्लियर रखेंगे. सिर्फ 16 की उम्र में जूनियर कैटेगरी में वर्ल्ड नंबर वन बनने वाले पेस ने जूनियर दिनों से ही जलवा दिखाना शुरू कर दिया था. जूनियर यूएस ओपन और विम्बलडन जीतने के बाद वह साल 1991 में प्रोफेशनल टेनिस प्लेयर बने. लेकिन पेस प्रोफेशनल डेब्यू से पहले ही घरेलू सर्किट में चर्चित हो चुके थे.

साल 1990 में सिर्फ 16 साल के पेस ने ज़ीशान अली के साथ जोड़ी बनाई, और डेविस कप में जापानी दिग्गज शुज़ो मातसुका और शिगेरु ओता को मात दी थी. पांच सेट तक खिंचे इस मुकाबले में पेस ने ऐसा खेल दिखाया, कि भारत तो भारत जापान के लोग भी उनके फ़ैन हो गए. फिर आए 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक्स.

पेस ने रमेश कृष्णन के साथ जोड़ी बनाकर डबल्स में क्वॉर्टर-फाइनल तक का सफर तय किया. और क्वॉर्टर-फाइनल में मिली हार ने पेस को इस कदर परेशान किया कि उन्होंने अपना स्टाइल ही बदल दिया. और इसी बदले स्टाइल का कमाल था कि उन्होंने 11 ओलंपिक्स से चला आ रहा सिलसिला तोड़ भारत को दूसरा व्यक्तिगत मेडल दिलाया.

# 1996 Atalanta Olympics Bronze Medal

बार्सिलोना के क्वॉर्टर-फाइनल में मिली हार के बाद पेस किसी भी तरह से ओलंपिक्स मेडल जीतना चाहते थे. लेकिन इस रास्ते में कई समस्याएं थीं. सबसे पहली तो ये कि बार्सिलोना के उनके पार्टनर रमेश कृष्णन रिटायर होने वाले थे. यानी अगले ओलंपिक्स के लिए उन्हें नया पार्टनर चाहिए था. और यही तो थी उनकी दूसरी समस्या. कोई दूसरा युवा दिख नहीं रहा था जो पेस के साथ मिलकर उनका सपना पूरा कर सके. इस बारे में उन्होंने स्क्वैश प्लेयर सौरव घोषाल के साथ एक बातचीत में कहा था,

‘जब 1992 में रमेश कृष्णन और मैंने ओलंपिक्स मेडल जीतने का मौका गंवा दिया… मैंने ध्यान दिया कि कृष्णन तो रिटायर हो रहे थे और वह 1996 ओलंपिक्स में नहीं खेलेंगे. साथ ही मुझे यह भी अहसास हुआ कि हमारे पास कोई ऐसा युवा भी नहीं है जो अटलांटा में मेडल जीतने के लिए तैयार हो.

साल 1992 में मैं सिर्फ ओलंपिक्स तक जाना चाहता था. और जब मैं मेडल जीतने के इतने क़रीब पहुंचकर हार गया, तो मैं इस हार के बाद लगभग पौने तीन घंटे तक वहीं बेंच पर बैठा रहा.’

इस हार और भविष्य को देखते हुए पेस ने अपनी तैयारी और खेलने का अंदाज बदल दिया. बार्सिलोना के तुरंत बाद ही पेस ने सिंगल्स पर फोकस मोड़ा और उसी के हिसाब से तैयारी करने लगे. घोषाल से अपनी बातचीत में इस बारे में उन्होंने कहा,

‘अपनी सोच में नयापन लाते हुए मैंने 1992 से 1996 के बीच सिंगल्स इवेंट के लिए अपनी शारीरिक ताकत और मानसिक योग्यता में बदलाव लाने का फैसला किया.’

इन तैयारियों के सिलसिले में पेस ने कई बड़े इवेंट छोड़ते हुए छोटे इवेंट्स में भाग लिया. दरअसल पेस इस दौरान अटलांटा की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इवेंट्स में भाग ले रहे थे. और फिर वो दिन भी आ गया. अटलांटा 1996 ओलंपिक्स का टेनिस ड्रॉ सामने आया. और इसके आते ही टीम इंडिया के कैप्टन जयदीप मुखर्जी ने पेस से कहा,

‘Tough Luck Lee, Tough Draw’

दरअसल ड्रॉ के मुताबिक ओलंपिक्स के पहले ही मैच में पेस को अमेरिकी दिग्गज पीट सैम्प्रास से भिड़ना था. इसके साथ ही पेस के लिए अपना वादा पूरा कर पाना बेहद मुश्किल दिख रहा था. घर से निकलते वक्त पेस अपने अंकल से बोलकर निकले थे,

‘मैं अटलांटा से मेडल लेकर ही लौटूंगा’

और जवाब में उनके अंकल ने कहा था,

‘कलकत्ता एयरपोर्ट पर मेडल और तुम्हें रिसीव करने के लिए तैयार रहूंगा.’

रात किसी तरह उधेड़बुन में बीती. और अगली सुबह ही पता चला कि सैम्प्रास ने ओलंपिक्स से नाम वापस ले लिया है. और उनकी जगह मिली रिची रेनेबर्ग को. उस वक्त की सिंगल्स रैंकिंग में 20वें नंबर के रिची भी आसान प्रतिद्वंद्वी नहीं थे. और वाइल्ड कार्ड के जरिए अटलांटा पहुंचे पेस को यह बात पहले ही सेट में पता चल गई. लेकिन पहला सेट हारने के बाद उन्होंने कमाल की वापसी की और फिर सेमी-फाइनल तक पहुंचकर ही रुके.

यहां उनके सामने थे नंबर वन आंद्रे अगासी. पेस आगासी से हार गए लेकिन हार से पहले उन्होंने अगासी पर जो प्रभाव डाला वो इस अमेरिकी लेजेंड की ऑटोबायोग्रफी में दिखता है. यहां इस मैच के बारे में अगासी ने लिखा है,

‘सेमी में मेरी मुलाकात भारत के लिएंडर पेस से हुई. वह एक उड़ता, उछलता बीन जैसा है जिसके पास बहुत सारी गतिज ऊर्जा यानी हाइपरकाइनेटिक एनर्जी और टूर के सबसे तेज हाथ हैं. इसके बाद भी उसे आज तक टेनिस बॉल को हिट करना नहीं आया.

लेकिन तमाम खामियों के बावजूद वह नेट तक उड़ता है, इतना कमाल का कवर करता है कि यह काम आ जाता है. एक घंटे के बाद आपको लगता है कि उसने एक भी गेंद को सफाई से नहीं मारा है- और इसके बाद भी आपको आसानी से मात दे रहा है. चूंकि मैंने तैयारी की थी, मैंने धैर्य रखा, शांत रहा और पेस को 7-6, 6-3 से हरा दिया.’

सेमी के बाद हुए ब्रॉन्ज़ मेडल मैच में पेस ने ब्राज़ील के फेरनान्डो एरिएल मेलिगेनी को हराया. अर्जेंटीनी/इटैलियन मूल के फेरनान्डो अपनी फाइटिंग स्पिरिट के लिए मशहूर थे. ब्राज़ील के इतिहास के बेस्ट प्लेयर्स में गिने जाने वाले फेरनान्डो मैच को टाइब्रेकर और पांच सेट में खींचने के मास्टर थे. पेस के लिए मैच की शुरुआत अच्छी नहीं रही. पहला सेट वह 3-6 से गंवा बैठे. बाद में इंडिया टुडे से बात करते हुए पेस ने उस मैच के बारे में बताया.

‘मैं सुबह जब सोकर उठा तो मूड सही नहीं था, मैंने सारे काम अपने रुटीन से किए लेकिन खुद को मैच के बारे में सोचने से नहीं रोक पाया.’

यह मैच बारिश से प्रभावित भी रहा. और पहला सेट हारने के बाद मैच रुकने से पेस की हालत और खराब हुई. पेस बताते हैं,

‘मैंने स्ट्रैटजी पर काम नहीं किया, मैं उस वक्त बस मैच खत्म करना चाहता था. मैं इमोशनल टेनिस खेल रहा था, मैं सोच ही नहीं रहा था.’

इसके बाद भी पेस ने अगले दोनों सेट 6-2, 6-4 से जीत मैच को 3-6, 6-2, 6-4 से अपने नाम कर लिया. पेस से हारने के बाद मेलिगेनी ने कहा था,

‘आपको कभी नहीं पता होता कि पेस का अगला कदम क्या होगा. उसके खिलाफ खेलना आसान नहीं है.’

उस दिन लिएंडर ने टेक्निकली अपने करियर की सबसे खराब टेनिस खेली थी. लेकिन भारत के लिए खेलते वक्त हमेशा की तरह वह एक बार फिर से अपनी ‘हिम्मत’ से जीते. मैच के बाद जब मशहूर पत्रकार रोहित बृजनाथ ने लॉकर रूम में उनसे पूछा-

तुम आज कैसे जीते? पेस ने कहा- हिम्मत से.

ऐसा कहते वक्त पेस की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.


कुश्ती पहलवान केडी जाधव ने कैसे जीता था हेलसिंकी ओलंपिक्स में ब्रॉन्ज़ मेडल?

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