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कोरोना वायरस लीक की कहानियों के बीच जानिए ऐंथ्रेक्स लीक की कहानी

क्या किसी वायरस का लैब से लीक होना मुमकिन है? क्या कभी ऐसा हुआ, जब कोई वायरस या बैक्टीरिया प्रयोगशाला से लीक हुआ हो? इस लीकेज़ के चलते कोई महामारी फैली हो और लोग मरे हों? किसी सरकार ने इस लीकेज़ को छुपाने, इसपर पर्दा डालने की कोशिश की हो? जवाब है, हां. ऐसा हो चुका है. कब, कहां, कैसे? साथ में, कोविड की लैब लीकेज़ थिअरी पर दुनिया के एक टॉप महामारी एक्सपर्ट की भी राय भी जानेंगे.

सबसे पहले एक क़िस्सा सुनिए

ये बात है 42 साल पुरानी. साल था, 1979. रूस में साइबेरिया नाम का एक प्रांत है. यहां एक शहर था- स्वेदलॉव्स्क. अप्रैल 1979 की बात है. इस शहर में एकाएक एक बीमारी फैली. बीमारी का नाम था, ऐंथ्रेक्स. ये बैक्टीरिया जनित एक दुर्लभ बीमारी है. मुख्य तौर पर ये बीमारी जानवरों में होती है. इन्फ़ेक्टेड जानवर के संपर्क में आने पर इंसान भी संक्रमित हो सकते हैं.

ऐंथ्रेक्स का एक दूसरा सोर्स हो सकता है, सांस. यानी, बीमार करने वाले बैक्टीरिया इंसान की श्वासनली में प्रवेश कर जाएं. इस संक्रमण में न्यूमोनिया जैसे लक्षण उभरते हैं. अगर सांस के मार्फ़त संक्रमण अंदर पहुंचा हो, तो इलाज मुश्किल हो सकता है और जान भी जा सकती है.

बीमारी का चरित्र चित्रण करने के बाद वापस चलते हैं अप्रैल 1979 की घटना पर. के स्वेदलॉव्स्क शहर पर. हुआ ये कि स्वेदलॉव्स्क में एकाएक कई लोग बीमार होने लगे. बीमारी के लक्षण थे- बुख़ार, खांसी, उल्टी. छह हफ़्तों तक रही ये महामारी. इस दौरान कितनी मौतें हुईं, इसकी ठीक-ठीक संख्या मालूम नहीं है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि अनुमानित संख्या 68 से 300 के बीच थी.

इस रहस्मय संक्रमण की ख़बर मॉस्को भी पहुंची. सरकार ने वहां से एक्सपर्ट्स की एक टीम को स्वेदलॉव्स्क भेजा. इस टीम ने जांच-पड़ताल के बाद बीमारी की वजह बताई- संक्रमित मीट. उनके मुताबिक, एक ऊंट ऐंथ्रेक्स संक्रमित था. उसी का मीट खाने के बाद शहर में ये बीमारी फैली थी.

ऐंथ्रेक्स, बैक्टीरिया जनित एक दुर्लभ बीमारी है. (तस्वीर: एएफपी)
ऐंथ्रेक्स, बैक्टीरिया जनित एक दुर्लभ बीमारी है. (तस्वीर: एएफपी)

क्या एक्सपर्ट्स सच बोल रहे थे?

क्या वाकई संक्रमित मांस खाने से ये बीमारी फैली थी? इस सवाल का जवाब मिला घटना के करीब पांच महीने बाद अक्टूबर 1979 में. उन दिनों वेस्ट जर्मनी के फ्रैंकफ़र्ट शहर में रूसी भाषा का एक अख़बार चलता था. उसके रशिया में अंदरूनी सूत्र थे. उन्हीं सूत्रों से मिली एक जानकारी के आधार पर अख़बार ने सनसनीखेज़ रिपोर्ट छापी. इसमें लिखा था कि रूस में जीवाणुओं से जुड़ा एक बड़ा हादसा हुआ है. और इसकी वजह से हज़ारों लोगों की मौत हो रही है.

एक तरफ़ जहां ये रिपोर्ट छपी, वहीं दूसरी तरफ़ अमेरिकन ख़ुफ़िया एजेंसी CIA को भी कुछ खुसुर-पुसुर सुनाई दे रही थी. दबी ज़ुबान हो रही इन बातों का सिरा टटोलने के बाद 15 अक्टूबर, 1979 को CIA ने डिफ़ेंस इंटेलिज़ेंस डिपार्टमेंट को एक टॉप सीक्रेट केबल भेजा. इसमें लिखा था कि उन्होंने मई 1979 में सोवियत की एक लैब में हुए ऐक्सिडेंट की चर्चा सुनी है. केबल के मुताबिक, ये हादसा स्वेदलॉव्स्क शहर स्थित सोवियत बायोलॉजिकल वॉरफ़ेयर इंस्टिट्यूट में हुआ है. जिसके चलते 40 से 60 लोग मारे गए.

CIA ने लिखा कि उन्हें लगता है, ये घटना सोवियत के कथित जैविक हथियार प्रोग्राम से जुड़ी हो सकती है. अगले कुछ महीने तक भी CIA इस विषय पर सीक्रेट केबल भेजता रहा. इस डिस्क्लेमर के साथ कि उन्हें इस हादसे का संबंध जैविक हथियारों की स्टोरेज़ से होने के साक्ष्य नहीं मिले हैं. मगर फिर फरवरी 1980 में आकर CIA का स्वर बदला. उसने वॉशिंगटन को फिर एक गोपनीय केबल भेजा. इसकी हेडिंग थी-

सोवियत बायोलॉज़िकल वॉरफ़ेअर, प्रॉबेबल कॉज़ ऑफ़ दी ऐंथ्रेक्स एपिडेमिक इन स्वेदलॉव्स्क.

बाद के सालों में रूस ने माना कि स्वेदलॉव्स्क में फैली ऐंथ्रेक्स महामारी की असली वजह सोवियत सेना की गतिविधियां थीं. (तस्वीर: एएफपी)
बाद के सालों में रूस ने माना कि स्वेदलॉव्स्क में फैली ऐंथ्रेक्स महामारी की असली वजह सोवियत सेना की गतिविधियां थीं. (तस्वीर: एएफपी)

क्या लिखा था इस केबल में?

इसमें लिखा था कि स्वेदलॉव्स्क में हुई हालिया मौतें शायद एक मिलिटरी लैब से लीक हुए ऐंथ्रेक्स के चलते हुईं. CIA ने लिखा कि उन्हें इस संबंध में ठोस साक्ष्य मिले हैं. ये भी पता चला है कि ये लीकेज़ इरादतन नहीं, शायद ऐक्सिडेंटल थी.

ठीक इसी टाइम, यानी फ़रवरी 1980 में फ्रैंकफ़र्ट के उसी अख़बार ने फिर ख़बर छापी. इसके मुताबिक, अप्रैल 1979 में स्वेदलॉव्स्क शहर के पास स्थित सोवियत सेना के एक सीक्रेट लैब में धमाका हुआ. ब्लास्ट के चलते वहां स्टोर करके रखे गए ऐंथ्रेक्स बैक्टीरिया की बड़ी मात्रा हवा में रिलीज़ हो गई. नतीजतन, हज़ारों लोग संक्रमित हुए और मारे गए.

इस ख़बर को ब्रिटेन, अमेरिका और वेस्ट जर्मनी के और भी कई अख़बारों ने पिक किया. तहलका मच गया. सोवियत ने कहा, ये आरोप झूठे हैं. न तो उन्होंने ऐंथ्रेक्स स्टोर करके रखा था. और न ही, ऐसा कोई लीकेज़ हुआ. मगर इस वक़्त तक वेस्टर्न स्पाई एज़ेंसियां इस प्रकरण पर ध्यान लगा चुकी थीं. सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों और सोवियत सीक्रेट केबल्स में की गई सेंधमारी के आधार पर उन्होंने जानकारी जुटाई. इसमें सामने आया एक नाम- कंपाउंड 19.

सोवियत के तत्कालीन रक्षा मंत्री दिमित्री उस्तिनोव. (तस्वीर: एएफपी)
सोवियत के तत्कालीन रक्षा मंत्री दिमित्री उस्तिनोव. (तस्वीर: एएफपी)

क्या था कंपाउंड 19?

ये स्वेदलॉव्स्क शहर के पास स्थित सोवियत सेना के एक सीक्रेट परिसर था. मालूम चला कि 1979 के अप्रैल में यहां सचमुच एक बड़ा हादसा हुआ था. इसके बाद इस कंपाउंड तक आने वाले रास्ते सील कर दिए गए थे. मिलिटरी ने कंपाउंड के डिकन्टेमिनेशन के लिए ख़ास ट्रक्स भी भिजवाए थे. यहां तक कि ख़ुद सोवियत के तत्कालीन रक्षा मंत्री दिमित्री उस्तिनोव ने इस कंपाउंड का दौरा किया था. ये सारी चीजें और अडिशनल जानकारियां ऐक्सिडेंटल लीकेज़ की थिअरी को मज़बूत करती थीं.

क्या ये मुमकिन है कि सोवियत सच में ऐंथ्रेक्स से कोई जैविक हथियार बनाने की कोशिश कर रहा हो?

उस दौर में केवल सोवियत नहीं, अमेरिका और ब्रिटेन भी बायोफ़ेअर प्रोग्राम्स चलाते थे. 1975 में इसी को रोकने के लिए ‘बायोलॉज़िकल विपन्स कन्वेंशन’ हुआ था. उम्मीद थी कि इसके बाद जैविक हथियार बनाने के प्रोग्राम्स थम जाएंगे. लेकिन स्वेदलॉव्स्क का कथित हादसा इस कन्वेंशन के बाद हुआ था. ऐसे में सोवियत पर आरोप लगे कि वो अब भी भीतर-ही-भीतर जैविक हथियार बनाने में लगा है. इसीलिए वेस्टर्न देश इस प्रकरण पर सोवियत को ख़ूब घेर रहे थे. उसके और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया था.

अमेरिकी बायोलॉज़िस्ट जॉशुआ लेडेरबर्ग. (तस्वीर: एएफपी)
अमेरिकी बायोलॉज़िस्ट जॉशुआ लेडेरबर्ग. (तस्वीर: एएफपी)

इस प्रसंग में सोवियत को सबसे बड़ी राहत किसने दी?

किसने उसके दावों पर मुहर लगाई? उत्तर है, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने. तब अमेरिका के एक टॉप बायोलॉज़िस्ट थे- जॉशुआ लेडेरबर्ग. 20वीं सदी के सबसे नामी वैज्ञानिकों में से एक. बैक्टीरिया जेनेटिक्स पर उनका काम मील का पत्थर माना जाता है. इसीलिए 1958 में उन्हें नोबेल प्राइज़ भी मिला था. 1986 में वो लैब लीकेज़ घटना की जांच के लिए स्वेदलॉव्स्क शहर गए थे. अपनी जांच में उन्होंने सोवियत को क्लीन चिट दी. उन्होंने कहा-

हर महामारी के बाद अफ़वाह फैलने लगने लगती है. स्वेदलॉव्स्क शहर में फैले संक्रमण पर सोवियत जो कह रहा है, वो सत्य है.

और भी कई वैज्ञानिकों ने सोवियत के दावे का समर्थन किया. कहा कि सोवियत द्वारा दिए गए साक्ष्य विश्वसनीय हैं. लेकिन क्या ये साइंटिस्ट सही थे? जवाब है, नहीं. इस बात का ख़ुलासा हुआ 1992 में. सोवियत संघ के विघटन के बाद राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने स्वीकार किया कि स्वेदलॉव्स्क में फैली ऐंथ्रेक्स महामारी की असली वजह सोवियत सेना की गतिविधियां थीं.

कैसी गतिविधियां? इसका कच्चा-चिट्ठा खुला 15 मार्च, 1993 को. इस रोज़ PNAS, यानी ‘प्रॉसिडिंग्स ऑफ़ दी नैशनल अकैडमी ऑफ़ साइंसेज़’ में एक लेख छपा. इसे लिखा था, अमेरिका और रूस के छह वैज्ञानिकों ने. इन्होंने साक्ष्य देकर कन्फ़र्म किया कि अप्रैल 1979 में फैला वो संक्रमण ऐक्सिडेंटल लैब लीकेज़ के ही चलते हुआ था. और पता है, इन वैज्ञानिकों को ज़रूरी साक्ष्य दिए किसने थे? ये सबूत उपलब्ध करवाए थे सोवियत के ही दो डॉक्टरों ने. KGB ने तो बड़ी सफ़ाई से इस घटना से जुड़े सारे हॉस्पिटल रेकॉर्ड्स और अटॉप्सी साक्ष्य मिटा दिए थे. मगर उन दो डॉक्टरों ने अपनी जान पर खेलकर चुपके से मृतकों का टिशू सैंपल सुरक्षित रख लिया था.

सोवियत संघ के विघटन के बाद के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन. (तस्वीर: एएफपी)
सोवियत संघ के विघटन के बाद के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन. (तस्वीर: एएफपी)

सवाल है कि हम ये सब आज क्यों बता रहे हैं आपको?

दो वजहें हैं इसकी. पहली, कोविड के शुरुआत की थिअरी. दुनिया के वैज्ञानिक दो धड़ों में बंटे हुए हैं. एक कह रहा है, कोविड की शुरुआत नैचुरल है. माने, ये चमगादड़ से जंप करके इंसानों तक पहुंचा है. दूसरे धड़े का मानना है कि शायद वुहान लैब से हुआ कथित लीकेज़ इसकी वजह है.

लैब लीकेज़ थिअरी की जांच की सिफ़ारिश कर रहे वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ये आशंका मुमकिन है. ऐसा पहले भी हो चुका है. एक उदाहरण हमने भी आपको बताया. इसीलिए निष्पक्ष जांच के बिना ये आशंका खारिज़ नहीं की जानी चाहिए.

अब आते हैं क़िस्सा सुनाने की दूसरी वजह पर

हाल में लैब लीकेज़ थिअरी से जुड़ी कई नई जानकारियां सामने आईं. इसके मद्देनज़र मई 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का ऐलान आया. उन्होंने अमेरिकी खुफ़िया एजेंसियों को इस आशंका की जांच के आदेश दिए.

इस डिवेलपमेंट के चलते फ़ोकस का एक सिरा वैज्ञानिकों पर भी घूम गया. वो साइंटिस्ट, जिनकी सलाह से बाइडन प्रशासन की कोविड नीति तय होती है. इन्हीं वैज्ञानिकों में से एक हैं- डॉक्टर एंथनी फ़ाउची. अमेरिका के चीफ़ महामारी विशेषज्ञ. नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एलर्ज़ी ऐंड इन्फ़ेक्शियस डिजिज़ेस के डायरेक्टर. कोरोना मामलों पर राष्ट्रपति बाइडन के मुख्य मेडिकल सलाहकार.

Joe Biden
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन. (तस्वीर: एपी)

लैब लीकेज़ थिअरी पर डॉक्टर फ़ाउची की क्या राय है?

बाइडन से पहले फ़ाउची ट्रंप के भी चीफ़ मेडिकल अडवाइज़र थे. ट्रंप लैब लीकेज़ की ख़ूब बातें करते थे. उनका आरोप था कि कोविड-19 असल में चीन का बनाया जैविक हथियार है. उसने अमेरिका को तबाह करने के लिए इसे विकसित किया है.

यही वो ऐंगल था, जिसके चलते ट्रंप और उन जैसी बातें करने वाले ‘कन्सपिरेसिस्ट्स’ की फूहड़ श्रेणी में गिने जाने लगे. क्यों? क्योंकि वैज्ञानिकों ने कोविड-10 के जैविक हथियार होने की आशंकाओं को सिरे से खारिज़ कर दिया था. साइंस कम्युनिटी में कोरोना के बायोलॉज़िकल वेपन होने पर बहस नहीं थी. बहस थी, ऐक्सिडेंटल लीकेज़ और नैचुरल ऑरिज़न थिअरीज़ पर.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप. (तस्वीर: एपी)
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप. (तस्वीर: एपी)

जानकारों ने तार्किक तौर पर भी इसे सही बताया. इसलिए कि इस महामारी का पहला विक्टिम तो चीन ख़ुद ही था. वो मृतकों की संख्या भले कम करके बताए, मगर असलियत में उसके भी हज़ारों नागरिक मरे. अर्थव्यवस्था ऑल-टाइम लो पर पहुंच गई.

वापस आते हैं ट्रंप और फ़ाउची पर कोविड-19 को लेकर दोनों दो धुरियों पर थे. ट्रंप कोविड के इलाज़ की अनाप-शनाप दवाएं बताते. मास्क और सोशल डिस्टेन्सिंग से ऐतराज़ जताते. मगर फ़ाउची साइंस का दामन पकड़े रहे. कोविड के ऑरिज़न पर भी उनकी अलग राय थी. वो नैचुरल ऑरिज़न के पक्षधर थे.

अमेरिका के चीफ़ महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर एंथनी फ़ाउची. (तस्वीर: एपी)
अमेरिका के चीफ़ महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर एंथनी फ़ाउची. (तस्वीर: एपी)

क्या ये राय अब भी कायम है?

जवाब ज़रा कॉम्प्लिकेटेड है. बीते दिनों लैब लीकेज़ थिअरी पर कुछ नई जानकारियां आईं. इनका असर फ़ाउची पर भी पड़ा. 11 मई, 2021 को फ़ाउची ने सेनेट से कहा-

मैं अब नैचुरल डिवेलपमेंट थिअरी पर कॉन्फ़िडेंट नहीं हूं. ऐक्सिडेंटल लैब लीकेज़ भी एक वजह हो सकती है. मैं इस मामले में विस्तृत जांच का पक्षधर हूं. हमें पता लगाना चाहिए कि चीन में दरअसल हुआ क्या था.

इस बयान के कुछ ही रोज़ बाद बाइडन प्रशासन ने भी लैब लीकेज़ की जांच के निर्देश दिए. बाइडन फ़ाउची पर बहुत भरोसा करते हैं. ऐसे में कई जानकारों ने कहा कि मुमकिन है, ये फ़ैसला फ़ाउची से परामर्श के बाद लिया गया हो.

इस डिवेलपमेंट के बाद 1 जून, 2021 को एक और बड़ी ख़बर आई. इस रोज़ ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ अख़बार ने फ़ाउची के कई आधिकारिक ईमेल्स पर आधारित ख़बर छापी. सूचना के अधिकार के तहत पोस्ट ने ये ईमेल्स हासिल किए थे. इन ईमेल्स में एक संवाद कथित वुहान लैब लीकेज़ पर भी था. जनवरी 2020 में रिसर्च बायोलॉजिस्ट क्रिस्टियान ऐंडरसन ने फ़ाउची को भेजे अपने ईमेल में लिखा था-

इस वायरस के इवॉल्यूशनरी थिअरी की राह इंसानों तक पहुंचने की संभावना सुदृढ़ नहीं है. वायरस की जेनेटिक सिक्वेंसिंग को बहुत करीब से देखने पर लगता है कि शायद इसके कुछ फ़ीचर्स इंजिनियर्ड हों.

इस ईमेल के सामने आने पर कई लोग डॉक्टर फ़ाउची पर सवाल उठाने लगे. उनका आरोप था कि फ़ाउची ने आशंकाएं सामने रखे जाने के बावजूद इस पक्ष की अनदेखी की. हालांकि आलोचना करने वालों को शायद ख़बर न हो. वो जिन ऐंडरसन के ईमेल को लेकर फ़ाउची पर उंगली उठा रहे थे, उन्होंने भी मार्च 2020 आते-आते अपनी राय बदल ली थी. मार्च 2020 में नेचर पत्रिका में छापे गए अपने एक लेख में ऐंडरसन ने वायरस के जेनोमिक सिक्वेंसिंग के आधार पर नैचुरल ऑरिज़न की वकालत की थी.

अमेरिका की जानी-मानी पत्रकार कैरा स्विशर.
अमेरिका की जानी-मानी पत्रकार कैरा स्विशर.

डॉक्टर फ़ाउची क्या कह रहे?

ख़ैर, जो भी हो. डॉक्टर फ़ाउची की आलोचना थमी नहीं है. अमेरिकियों का एक पक्ष उन्हें हीरो मानता है, दूसरा विलन. अब इसी लैब लीकेज़ के सवाल पर उनसे विस्तृत बातचीत की गई है. अमेरिका की जानी-मानी पत्रकार कैरा स्विशर ने फ़ाउची का एक इंटरव्यू लिया है. कैरा ‘स्वै पॉडकास्ट’ की होस्ट हैं. न्यू यॉर्क टाइम्स में कॉलम लिखती हैं.फ़ाउची का उनका इंटरव्यू NYT ने भी छापा है. इस इंटरव्यू में स्विशर का पहला ही सवाल लैब लीकेज़ पर था. स्विशर बोलीं-

वुहान लैब में हुए कथित लीकेज़ के मसले पर काफी पॉलिटिक्स हो रही है. अप्रैल 2020 में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उनके पास ऐसे सबूत हैं, जो लैब लीक थिअरी को साबित कर देंगे. हालांकि उन्होंने वो कथित सबूत कभी दिए नहीं. इस मसले पर आपकी क्या राय है?

जवाब में फ़ाउची बोले-

मैंने ऐसा कोई साक्ष्य नहीं देखा. क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण है ही नहीं. आजकल अटकलबाज़ियां बहुत बढ़ गई हैं. सही डेटा और प्रमाण नहीं आ रहे. कथित जानकारी है कि वुहान लैब में काम करने वाले तीन लोग बीमार पड़े. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. अगर ये जानकारियां ठोस हैं, तो हमें उन तीनों लैब कर्मियों का हेल्थ रेकॉर्ड हासिल करना चाहिए. मैं खुले दिमाग़ का इंसान हूं. वायरोलॉज़ी और इवॉल्यूशनरी बायोलॉज़ी का ज्ञान रखने वाले ज़्यादातर वैज्ञानिक नैचुरल ऑरिज़न थिअरी से सहमत हैं.

इस जवाब पर स्विशर ने बाइडन प्रशासन द्वारा करवाई जा रही जांच को लेकर सवाल किया. इसपर फ़ाउची का जवाब था-

राष्ट्रपति बाइडन ने खुफ़िया एजेंसियों को जांच के लिए 90 दिन का समय दिया है. मैं इसका समर्थन करता हूं. हम सब सच जानना चाहते हैं.

फ़ाउची ने कहा है कि कोरोना की जांच वैज्ञानिकों द्वारा हो और राजनीति को इससे दूर रखा जाए. (तस्वीर: एपी)
फ़ाउची ने कहा है कि कोरोना की जांच वैज्ञानिकों द्वारा हो और राजनीति को इससे दूर रखा जाए. (तस्वीर: एपी)

इसके बाद स्विशर ने डॉक्टर राल्फ़ बारिक और डॉक्टर मार्क लिपसिट्स जैसे जाने-माने महामारी विशेषज्ञों का नाम लिया. ये वो साइंटिस्ट हैं, जो लैब लीकेज़ थिअरी की जांच का समर्थन करते हैं. इस पक्ष का ज़िक्र करते हुए स्विशर ने फिर से जांच का प्रश्न उठाया. इसपर फ़ाउची ने अपना स्टैंड स्पष्ट करते हुए कहा-

आपको वायरस के इवॉल्व होने का अतीत देखना होगा. सार्स, मर्स, इबोला, इनकी हिस्ट्री देखनी होगी. दशकों बाद भी हम इबोला के प्राकृतिक सोर्स का पता नहीं लगा सके. इन्फ़्लूएंज़ा, बर्ड फ़्लू ये सब जानवरों से जंप करके हम तक आए. ये क़ुदरती प्रक्रिया है. कई जानकार कोविड के बारे में भी यही कह रहे हैं. उन्हें इस वायरस के लैब से आने का कोई संकेत नहीं मिला है. हां, मगर मैं जांच के पक्ष में हूं. हमें कोशिश तो ज़रूर करनी चाहिए. बतौर साइंटिस्ट मेरा मानना है कि जब तक कोई चीज पक्के से साबित नहीं हो जाती, तब तक हमें विकल्प खुले रखने चाहिए. अगर कोई जांच हमें कोविड की शुरुआत के सवाल पर और करीब ले जा सके, तो मैं उसका सपोर्ट करता हूं.

यहां फ़ाउची ने एक ज़रूरी चीज कही. उन्होंने कहा कि ये जांच वैज्ञानिकों द्वारा हो. राजनीति को इससे दूर रखा जाए. फ़ॉरेंसिक्स पर फ़ोकस हो. फ़ाउची ने ये भी कहा कि जांच की शैली चीन पर दोषारोपण की न हो. वरना चीन का असहयोग और बढ़ जाएगा.

फ़ाउची ने चाइनीज़ सरकार के तौर-तरीकों पर भी टिप्पणी की. कहा कि उनके पास जब कुछ छुपाने को भी नहीं होता, तब भी वो पारदर्शी नहीं रहते. सीक्रेटिव बर्ताव करते हैं. जानकारियां छुपाते हैं. उनका स्वभाव ही यही है.

इस इंटरव्यू में फ़ाउची से वुहान लैब की वायरोलॉजिस्ट शी झेंगली पर भी सवाल पूछा गया. आरोप है कि शी ही कोविड वायरस पर रिसर्च कर रही थीं. और इसी रिसर्च के दौरान वायरस ऐक्सिडेंटली लीक हो गया. फ़ाउची ने कहा कि वो न तो शी को जानते हैं, न कभी उनसे मिले हैं. मगर उन्होंने टॉप महामारी विशेषज्ञों से बातचीत के दौरान सुना है कि शी बेहद क़ाबिल और ईमानदार साइंटिस्ट हैं. उनके काम का मुख्य मकसद है, महामारियों को फैलने से पहले ही रोकना.

Shi Zhengli
वुहान लैब की वायरोलॉजिस्ट शी झेंगली. (तस्वीर: एएफपी)

ये सब बताने के बाद वापस चलते हैं सोवियत के क़िस्से पर

जिससे हमने शुरुआत की थी. अप्रैल 1979 में हुए सोवियत लैब लीकेज़ का वो प्रसंग इन दिनों अमेरिकी मीडिया में ख़ूब छप रहा है. क्यों? क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच भी कुछ-कुछ कोल्ड वॉर से हालात हैं. दोनों के बीच कई मुद्दों पर तनाव है. सोवियत की तरह चीन में भी पारदर्शिता नहीं है. वो निष्पक्ष जांच नहीं होने दे रहा. उसने WHO टीम की वुहान विज़िट को लंबे समय तक टाला. आख़िरकार जब टीम वुहान गई, तो उन्हें कंट्रोल करता रहा. उन्हें वुहान लैब के रेकॉर्ड्स नहीं दिए गए. इसपर भी चीन चाहता है कि दुनिया उसके कहे को आख़िरी सत्य समझ ले.

शायद इसीलिए पत्रकार कम्युनिटी वैज्ञानिकों को स्वेदलॉव्स्क प्रकरण की याद दिला रही है. आगाह कर रही है कि निष्पक्ष जांच कराए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ग़लत है. क्लीन चिट देना ग़लत है. मोरल ऑफ़ दी स्टोरी ये कि नैचुरल ऑरिज़न के साथ-साथ ऐक्सिडेंटल लैब लीकेज़ की भी जांच की जाए. वैज्ञानिक ही वायरस और वायरोलॉज़ी के एक्सपर्ट हैं. उनकी राय, उनका रुख इस जांच को प्रभावित कर सकता है. इसे लेज़िटिमाइज़ या डिलेज़िटिमाइज़ कर सकता है. इसीलिए उनका ओपन माइंड होना, जांच का समर्थन करना ज़रूरी है.


विडियो- चीन की वुहान लैब से कोरोनावायरस निकलने की थिअरी में क्या नया पता चला?

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