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अगर आपसे भी बिजली मीटर के जरिए मेंटीनेंस चार्ज वसूले जा रहे हैं तो ये रिपोर्ट जरूर पढ़ें

अगर आप दिल्ली-NCR की किसी सोसायटी में रहते हैं तो बहुत संभव है कि आपके फ्लैट में बिजली का प्रीपेड मीटर लगा हो और आपका मेंटीनेंस भी इसी मीटर से कटता होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस तरह मेंटीनेंस चार्ज वसूला नहीं जा सकता और ये कानूनन गलत है? फिर ऐसा क्यों है कि अधिकतर सोसायटियों में बिजली के मीटर के जरिए मेंटीनेंस चार्ज वसूल किया जाता है?

क्या है पूरा मामला?

ग्रेटर नोएडा, ग्रेटर नोएडा वेस्ट, नोएडा, नोएडा एक्सटेंशन और गाजियाबाद में कंक्रीट का मानो पूरा जंगल खड़ा है. इन इलाकों में सैकड़ों सोसायटियां हैं, जिनमें लाखों लोग रह रहे हैं. अधिकतर सोसायटियों में प्रीपेड मीटर लगे हैं और इन्हीं मीटरों के जरिए सोसायटी का मेंटीनेंस भी लिया जाता है.

ऐसी ज्यादातर सोसायटियों में बिजली विभाग की ओर से एक मीटर लगाया जाता है जो पूरी सोसायटी के लिए होता है. फ्लैट्स में जो मीटर लगे होते हैं वो बिल्डर और मेंटीनेंस ऑफिस की ओर से लगाए जाते हैं. जब आप मीटर रिचार्ज कराते हैं तो पैसा, मेंटीनेंस अकाउंट में जाता है और यहां से बिजली विभाग को दिया जाता है (महीने में जितना बिल बनता है).

मान लें कि किसी सोसायटी में एक हजार स्क्वायर फीट का फ्लैट है. इस सोसायटी में मेंटीनेंस का रेट दो रुपये प्रति स्क्वायर फीट (महीना) है. तब ऐसे में इस फ्लैट के मालिक को हर महीने 2000 रुपये मेंटीनेंस चार्ज चुकाने होंगे. यानी दिन के करीब 66 रुपये. अब मेंटीनेंस ऑफिस कर ये रहा है कि महीने में पैसे लेने की बजाय रोजाना आपके बिजली के मीटर से पैसे काट लेता है.

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स्लैब्स के आधार पर नहीं लिए जाते पैसे. फोटो सोर्स- आजतक

परेशानी क्या है?

1. बिजली विभाग की निर्धारित दरें स्लैब्स में बंटी हुई होती हैं. शुरुआत के स्लैब्स में बिजली सस्ती होती है. जैसे-जैसे यूनिट्स की खपत अधिक होती है, बिजली महंगी होती चली जाती है. लेकिन अधिकतर सोसायटियों में बिजली का रेट फिक्स होता है. मान लें कि 7 रुपये प्रति यूनिट बिजली के लिए वसूले जा रहे हैं. लेकिन अगर आप कम यूनिट खर्च करते हैं तो आपको ये महंगी पड़ती है.

2. अगर आपके मीटर में पैसे कम हैं या खत्म हो गए हैं तो अपनेआप आपकी बिजली कट सकती है. अगर आप शहर से बाहर हैं या फिर किसी अन्य काम में फंसे होने के कारण रिचार्ज नहीं करा पाए हैं तो मीटर में पैसे खत्म होते ही बिजली बंद हो सकती है. ऐसी शिकायतें अक्सर रेजिडेंट्स की ओर से आती हैं.

3. चूंकि आपके मीटर से रोजाना मेंटीनेंस के पैसे भी कटते हैं तो आपको अंदाजा नहीं हो पाता है कि आपका बिजली खर्च किस तरह हो रहा है. ये आपको महीने के बाद उस वक्त ही पता चलता है जब बिजली का बिल हाथ में आता है. काफी लोगों के ऐसे आरोप भी हैं कि डीजी (पावर बैकअप) के नाम पर अधिक पैसे वसूल लिए जाते हैं.

बिजली के मीटर से मेंटीनेंस पर क्या कहते हैं नियम?

ग्रेटर नोएडा वेस्ट में बनी रेजिडेंशियल सोसायटी सुपरटेक इकोविलेज-2 में रहते हैं नरेंद्र पॉल. साल 2018 में उन्होंने विद्युत उपभोक्ता व्यथा निवारण फोरम (Consumer Grievance Redressal Forum) में एक केस डाला था. CGRF कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सुपरटेक इकोविलेज-2, बिजली मीटर के जरिए मेंटीनेंस वसूली नहीं कर सकता. साल 2019 में सुपरटेक इकोविलेज-1 में रहने वाले अशोक वर्मा और दो अन्य लोगों ने भी मेंटीनेंस को लेकर CGRF की शरण ली थी. तब भी CGRF ने यही बात दोहराई थी.

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बिजली के मीटर में डाले पैसे पहले मेंटीनेंस के अकाउंट में जाते हैं. फोटो सोर्स- आजतक

अपने आदेश में CGRF ने साफ-साफ कहा था कि बिजली मीटरों के जरिए मेंटीनेंस नहीं वसूल किया जा सकता है. साथ ही कॉमन एरिया के लिए बिल्डर को अलग से मीटर लगाना होगा और इसके लिए वो प्रो-रेटा के आधार पर चार्ज कर सकता है.

क्या कहते हैं जानकार?

नोएडा स्थित पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के चीफ इंजीनियर (वितरण) वीरेंद्र नाथ सिंह ने ‘दी लल्लनटॉप’ को फोन पर बताया,

“माननीय नियामक आयोग ने साफ आदेश दे रखे हैं कि विद्युत मीटरों से केवल विद्युत के पैसे ही लिए जाएं. मेंटीनेंस नहीं देने पर किसी की बिजली सप्लाई को भी काटा नहीं जा सकता है. जब कोई शिकायत हमारे पास आती है तब हम संबंधित पक्ष को नोटिस देते हैं और बताते हैं कि आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. हमारे एक्शियन के द्वारा पहले कई बार ऐसे नोटिस अलग-अलग सोसायटियों में दिए गए हैं.”

वहीं, गाजियाबाद इलाके के चीफ इंजीनियर (वितरण) पंकज ने ‘दी लल्लनटॉप’ को बताया,

“जिन मीटरों के माध्यम से मेंटीनेंस लिया जाता है, वे हमारे विभाग के नहीं होते हैं. ऐसे मीटर बिल्डर्स के अपने होते हैं. सोसायटी में हमारा केवल एक मीटर लगा होता है. उसी से हम बिलिंग करते हैं. किसी को बिजली का व्यापार करने की छूट नहीं है. जब ऐसी कोई शिकायत आती है तो हम बिल्डर को नोटिस देते हैं. हालांकि RWA वालों का कहना है कि 30 से 40 फीसदी लोग मेंटीनेंस जमा नहीं करते. इसलिए बिल्डर्स ऐसा करते हैं. लेकिन ये लीगल नहीं है. इसलिए जहां से भी ऐसी शिकायतें आती हैं तो बिल्डर या RWA को नोटिस दिया जाता है.”

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सोसायटी में रहने वालों से वसूले जाते हैं मेंटीनेंस चार्जेज. फोटो- आजतक

बिल्डर क्यों इस नियम का पालन नहीं करते?

हमने इस मुद्दे पर नोएडा-NCR के रियल एस्टेट कारोबारी अभिषेक मित्तल से भी बात की. वो एक सोसायटी में अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) के अध्यक्ष भी है. अभिषेक ने हमें बताया कि सोसायटी में मेंटीनेंस ऑफिस के सामने बजट एक बड़ी समस्या होता है. अगर लोग मेंटीनेंस जमा करना भूल जाते हैं, या जानबूझकर जमा नहीं करते हैं तो ऐसे में RWA के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वो लंबे वक्त तक बिना वसूली के काम कर सके. वे कहते हैं,

“वैसे तो डीकपलिंग हो रही है सभी जगह. (लेकिन) AOA या फिर RWA कैसे लोगों से पैसे लें अगर लोग देना नहीं चाहें तो. ऐसे में यही एक तरीका होता है कि मेंटीनेंस चार्जेज मीटर के जरिए वसूल किए जाएं. हालांकि ये गलत है, अवैध है. जब लोग शिकायत करते हैं तो फिर मैनेजमेंट को डीकपलिंग करनी पड़ती हैं.”

अभिषेक ने आगे बताया,

“अधिकतर जगहों पर इंफ्रास्ट्रक्चर ऐसा नहीं है कि सरकारी मीटरों का हिसाब रख पाएं. वायरिंग की समस्या है. वो अच्छे नहीं दिखते. समस्या होती है तो डवलपर पीछे हट जाते हैं. कि आप जानो और बिजली विभाग जाने. इसलिए लोग इनकरेज नहीं होते कि सरकारी मीटर लगवाएं.”

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नोएडा, ग्रेटर नोएडा में बनी हैं हजारों सोसायटियां. फोटो सोर्स- आजतक

वहीं, लंबे वक्त से रियल एस्टेट कारोबार में जुटे अनुराग तायल बताते हैं कि जो सोसायटी करीब 10 साल पहले बनी थीं, उनमें तो बिजली के सरकारी मीटर लगे हैं, लेकिन जो सोसायटी पिछले 10 सालों के भीतर बनी हैं उनमें से अधिकतर में निजी मीटर ही लगे हैं और प्रतिदिन के हिसाब से पैसे काटे जाते हैं. अनुराग ने कहा,

इससे मेंटीनेंस लेने वालों को फायदा है. बिल्डर को फायदा है. लोग शिकायत ही नहीं करते. उनके पास टाइम ही नहीं होता. लिहाजा कार्रवाई भी नहीं हो पाती.

एक अन्य रियल एस्टेट कारोबारी हिमांशु कहते हैं कि नोएडा में अब पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की जगह NPCL (नोएडा पावर कंपनी लिमिटेड) आ गया है. नई सोसायटियों में NPCL ही मीटर लगा रहा है. NGT का आदेश है कि DG यानी पावर सप्लाई केवल कॉमन एरिया में चलेगा, फ्लैट के अंदर नहीं.

यानी अगर समस्या रहने वालों को है तो समस्या बिल्डर, AOA और RWA को भी हैं. वहीं, गौतमबुद्धनगर (नोएडा, ग्रेटर नोएडा) के वरिष्ठ पत्रकार पंकज पाराशर इस पर अपनी अलग राय रखते हैं. उन्होंने ‘दी लल्लनटॉप’ को फोन पर बताया,

“AOA और RWA का काम था लोगों की आवाज बिल्डर, डेवलेपर के सामने उठाना, प्रशासन के सामने उठाना. लेकिन अब तो ये दोनों ही मेंटीनेंस वसूलने के काम में लगी हुई हैं. बिजली विभाग और UPERC यानी उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन का ये काम है कि प्रक्रिया का पालन कराएं. पहले प्रीपेड मीटर होते थे, पोस्टपेड नहीं होते थे. अगर नियामक आयोग ने नए मीटरों को स्वीकृत किया है तो इसके जरिए अगर कुछ गलत होता है तो उसे रोकने की जिम्मेदारी भी तो आयोग की होगी ना.”

पंकज कहते हैं कि नियामक आयोग बिल्डरों पर बड़ी शिकायतों से बचते हैं. उन्होंने कहा कि अन्य नियामक आयोग जैसे TRAI, IRDA आदि भी तो जुर्माना लगाते हैं, लेकिन UPERC केवल चेतावनी देकर काम चलाते हैं. पंकज के मुताबिक, बिल्डरों ने एक तरह से समानांतर बिजली कंपनियां खोल ली हैं और बिजली का व्यापार कर रहे हैं जो पूरी तरह गलत है. उन्होंने कहा, ‘नियमों का पालन कराने में बिजली विभाग पूरी तरह फेल है.’


वीडियो- गाज़ियाबाद के मुरादनगर में ‘बिजली चोर’ का ये वीडियो हुआ वायरल, लाइनमैन ने तो कमाल ही कर दिया

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