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F1 रेसिंग के बारे में तो सुना होगा लेकिन ये फॉर्मूला-2 और फॉर्मूला-3 रेसिंग क्या होती है?

आपने ‘फोर्ड vs फरारी’ फिल्म तो देखी होगी ना? उस फिल्म में एक डायलॉग है, जब गाड़ी तीन हजार RPM पर होती है तो ड्राईवर उसे महसूस कर रहा होता है. गाड़ी मानो उसके जिस्म का हिस्सा बन जाती है. आप सोच रहे होंगे, आज ये डायलॉगबाजी क्यों? दरअसल आज हम बात करेंगे रेसिंग के बारे में. फॉर्मूला रेसिंग के बारे में. तो चलिए आपको बताते हैं दिल, जिगर और गुर्दों को हिला देने वाली इस रेसिंग के बारे में.

इससे पहले एक खबर बताते हैं. F2 रेसिंग में भारतीय ड्राईवर जेहान दारूवाला ने जीत हासिल कर नया इतिहास रच दिया है. साखिर ग्रां प्री में 22 साल के जेहान ने फार्मूला-2 चैम्पियन मिक शूमाकर और डेनियल टिकटुम को बेहद रोमांचक मुकाबले में मात दी.

ये फॉर्मूला रेसिंग क्या है?

दरअसल इस रेसिंग के लिए इतने नियम कानून बने यानि इतने फॉर्मूले बने कि रेस का नाम ही फॉर्मूला रेसिंग रख दिया गया. फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल यानि FIA नाम की संस्था इस रेसिंग का आयोजन कराती है. इस संस्था की स्थापना साल 1904 में की गई थी.

वैसे तो आपको पता ही है कि रेसिंग के लिए इंसान शुरू से दीवाना रहा है. कभी घोड़ों से रेसिंग करता था, तो कभी बैलगाड़ियों और भैंसा गाड़ियों से. स्पीड का यही दीवानापन था, जो रेसिंग कार बनाई गईं और इंजन की ताकत को हॉर्सपावर का तमगा दिया गया. रेसिंग सर्किट बनाए गए. तमाम नियम बनाए गए और फिर आस्तित्व में आई FIA और F1 रेसिंग.

ये जानना भी दिलचस्प है कि मामला केवल F1 पर ही खत्म नहीं होता. F2 और F3 रेसिंग भी FIA कराता है. अब यहां ये सवाल उठना जायज है कि भई इनमें फर्क क्या होता है. ये भी आपको बताएंगे लेकिन उससे पहले F1 से जुड़ी कुछ खास बातें जान लीजिए.

# F1 रेसिंग दुनिया की सबसे बड़ी रेसिंग प्रतियोगिता है, और इसका आयोजन चुनिंदा देशों में ही किया जाता है.

# इस रेसिंग में वही ड्राईवर हिस्सा ले सकते हैं, जिनके पास सुपर लाइसेंस होता है. ये लाइसेंस FIA जारी करता है. इसकी कीमत लाखों में होती है.

# इस रेसिंग में कार को बेशक ड्राईवर ही दौड़ाते हैं, लेकिन एंट्री टीम को दी जाती है. ये रेसिंग अकेले बंदे का काम नहीं, लिहाजा टीम जरूरी है. हर टीम की ओर से दो ड्राईवर रेस में हिस्सा लेते हैं. दोनों को जो पॉइंट मिलते हैं, उन्हें जोड़ा जाता है. अधिक अंक पाने वाली टीम जीत जाती है.

# F1 रेसिंग में 12 टीमें हिस्सा लेती हैं, यानि 24 ड्राईवर रेसिंग करते हैं. एक टीम में करीब 150 लोग तक होते हैं.

# इस रेसिंग में इस्तेमाल की जाने वाली गाड़ियां बेहद महंगी, बेहद एडवांस और बेहद तेज रफ्तार वाली होती हैं. इनको कार्बन फाइबर से बनाया जाता है. इसके टायर एक सेकेंड में 50 बार तक घूमते हैं. ऐसे में वे 1200 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाते हैं, इसीलिए बीच रेस में इनको बदला जाता है.

# अब जिनको इस रेस में थोड़ा सा भी इंटरेस्ट होगा, उन्होंने नारायण कार्तिकेयन और करुण चंडोक का नाम सुना ही होगा. अब जेहान दारूवाला का नाम भी इस लिस्ट में जुड़ने वाला है क्योंकि शायद कुछ वक्त बाद वो भी F1 रेसिंग में दिखाई दे सकते हैं.

# आपको पता है कि एक विमान करीब 300 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड पर उड़ान भर लेता है. मजेदार बात ये है कि F1 रेसिंग में गाड़ियां आराम से इस स्पीड को पार कर लेती हैं. दरअसल F1 गाड़ियों में ऐसी तकनीक इस्तेमाल की जाती है ताकि डाउनफोर्स पैदा हो और गाड़ी जमीन पर ही रहे.

# ऐसी हर रेस के बाद गाड़ी चला रहे ड्राईवरों का वजन 3 से चार किलो तक कम हो जाता है. दरअसल 300 की स्पीड में ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, जिनसे शरीर में पानी की काफी कमी हो जाती है.

# इन ड्राईवरों से जुड़ी हर चीज खास होती है. उसका हेलमेट, हेलमेट के नीचे वाला कपड़ा, गले पर लगी खास परत, उसका रेसिंग सूट, उसके दस्ताने, उसके जूते. यानि हर चीज. पता है! इस रेसिंग सूट ऐसा होता है, जिस पर आग का भी असर नहीं होता. इसको तीन लेयर में बनाया जाता है ताकि हर स्थिति में ये ड्राईवर की रक्षा कर सके.

ये तो बात हुई F1 की. अब बताते हैं कि F1, F2, F3 में फर्क क्या है.

ऐसा समझिए कि फॉर्मूला-1 से बड़ी और कठिन कोई रेस नहीं. इस रेसिंग में हर चीज के लिए कुछ नियम होते हैं. आसान शब्दों में कहें तो हर नट और हर बोल्ट तक के लिए कुछ मानक तय किए गए हैं. उनका पालन हर स्थिति में करना होता है.

फॉर्मूला वन में जहां हर टीम अपनी गाड़ी को निर्धारित फॉर्मेट में बनाती है, वहीं फॉर्मूला टू में टायर, चेसिस और इंजन हर गाड़ी में एक बराबर होते हैं. ये रेस F1 के मुकाबले सस्ती भी होती है, इसलिए कम तकनीक वाली होती है. इसका उद्देश्य ड्राईवर को बेहतर बनाना होता है ताकि वह F1 के लिए तैयार हो सके. इसको रेसिंग का टेस्ट मैच समझ लीजिए.

1985 से फॉर्मूला 3000 की शुरुआत की गई थी. 2005 में इसे नाम दिया गया जीपी2 या ग्रैंड प्रिक्स 2. साल 2017 में इसे नाम दिया गया फॉर्मूला-2 या F2.

मजेदार बात ये भी है कि फॉर्मूला 3 जो है, वो फॉर्मूला 2 से अधिक पुरानी है. इसकी शुरुआत 1950 से ही हो गई थी. पहले इसको फॉर्मूला जूनियर कहा जाता था. बाद में इसका नाम बदलकर F3 कहा जाने लगा. F3 में हिस्सा लेने वाला अपनी पसंद से टायर, इंजन और चेसिस लगा सकता है. थोड़े नियम हैं लेकिन उतने कठिन नहीं जितने F2 या F1 में हैं.

ऐसे समझ लीजिए कि F3 के बाद F2 में एंट्री मिलती है, और F2 के बाद F1 में. थोड़ी और खास बातें हैं, जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए जैसे-

# F1 में हर टीम अपनी चेसिस, एयरोडायनामिक्स खुद डिजाइन करती है. F2 में हर गाड़ी के लिए ये सब चीजें सेम होती हैं.

# F1 में जहां गाड़ियां 18 हजार RPM की रफ्तार से दौड़ती हैं, वहीं F2 में ये रफ्तार 10 हजार RPM होती है. यानि स्पीड में 10 से 12 किलोमीटर प्रतिघंटे का फर्क देखा जाता है.

# F2 में ड्राईवर को एक निर्धारित रकम दी जाती है, वहीं F1 में ड्राईवर को काफी अधिक पैसा मिलता है. ये उसकी हर रेस और हर जीत पर निर्भर करता है.

ये मोटा-मोटी फर्क हैं इन रेसों के बीच. वैसे इन रेसिंग में कई और भी अंतर हैं. दोनों के लिए अलग-अलग नियम हैं, अलग-अलग कायदे कानून हैं. दर्शकों की पसंद भी अलग-अलग है. जैसे क्रिकेट में हर कोई टेस्ट को पसंद नहीं करता और टी-20 देखना चाहता है, वैसे ही F2 या F3 हर किसी को पसंद नहीं हैं. अधिकतर लोग F1 को ही पसंद करते हैं. यही कारण है कि इसकी चर्चा ज्यादा होती है.


वीडियो- F1 रेसिंग के दौरान हुए हादसे में कार जलकर खाक हो गई, पर ड्राइवर को खरोंच भी नहीं आई, कैसे?

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