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इन लोगों ने ऐसा क्या खोज लिया कि दुनिया का सबसे बड़ा अवॉर्ड पा गए

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दुनियाभर के सवालों में सबसे बड़े सवाल इस दुनिया के बारे में ही हैं.

ये दुनिया आखिर है क्या? और इस दुनिया में हमारा वजूद क्या है?

एक नज़र में ये सवाल फिलॉसॉफिकल से लगते हैं. हम अभी तक ठीक से नहीं जानते कि दुनिया क्या है, और इसमें हमारा वजूद क्या है. लेकिन इसे लेकर हमारी समझ साल दर साल बढ़ी है. साइंस की मदद से. इन्हीं सवालों और उनके जवाब की तलाश के नाम रहा इस साल यानी 2019 का फिज़िक्स नोबेल प्राइज़.

ये चल क्या रहा है? इस एक सवाल का जवाब ढूढ़ने के लिए ही हमने स्पेस में छलांग लगाई. (सोर्स - नोबेल प्राइज़ )
ये चल क्या रहा है? इस एक सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए ही हमने स्पेस में छलांग लगाई. (सोर्स – नोबेल प्राइज़ )

नोबेल को सबसे बड़ा अवॉर्ड माना जाता है. छह फील्ड में दिया जाता है. पीस, लिटरेचर, फिज़िक्स, केमिस्ट्री, मेडिकल साइंस और इकॉनमिक्स.

2019 के लिए फिज़िक्स नोबेल प्राइज़ विनर्स के नाम 8 अक्टूबर को अनाउंस किए गए. तीन नाम थे. ब्रह्माण्ड के बारे में हमारी समझ बढ़ाने वाले तीन नाम.

1. जेम्स पीबल्स (James Peebles)
2. माइकल मेयर (Michel Mayor)
3. डिडियर केलॉज़ (Didier Queloz)

इनाम की आधी राशि जेम्स पीबल्स को मिलेगी. और बाकी की आधी माइकल मेयर और डिडियर केलॉज़ के बीच बंटेगी. इन्हें 10 दिसंबर को नोबेल प्राइज़ दिया जाएगा.

अल्फ्रेड नोबेल की मौत 10 दिसंबर के दिन हुई थी. इसी दिन बांटते हैं नोबेल प्राइज़. (सोर्स - नोबेल प्राइज़)
अल्फ्रेड नोबेल की मौत 10 दिसंबर, 1896 को हुई थी. इसी दिन बांटते हैं नोबेल प्राइज़. (सोर्स – नोबेल प्राइज़)

अब इन लोगों ने ऐसा क्या कर दिया जो इन्हें फिज़िक्स का नोबेल मिला है? ये हम आपको बताएंगे.

मोटा-मोटी इन तीन जनों ने दो सवालों के जवाब ढूंढ़ने में हमारी मदद की है. एक सवाल पर जेम्स पीबल्स ने काम किया है. और दूसरे पर माइकल मेयर और डिडियर केलॉज़ ने मिलकर काम किया.

जेम्स पीबल्स – सृष्टि के जन्म के बाद क्या हुआ?

एस्ट्रोनॉमी (खगोल शास्त्र) मतलब अंतरिक्ष में मौजूद चीज़ों की पढ़ाई. एस्ट्रोनॉमी की एक ब्रांच होती है कॉस्मोलॉजी. कॉस्मोलॉजी मतलब कॉसमॉस (ब्रह्माण्ड) के जन्म और उसके विकास की पढ़ाई. सिंपल भाषा में कहें तो ब्रह्माण्ड का इतिहास. पीबल्स को कॉस्मोलॉजी में योगदान के लिए नोबेल मिला है.

हमें सबसे पहले कखग और ABC पढ़ाई जाती है. कॉस्मोलॉजी में सबसे पहले ‘बीबीटी’ पढ़ाई जाती है. बीबीटी मतलब बिग बैंग थ्योरी. वो थ्योरी जो ब्रह्माण्ड के जन्म की गुत्थी सुलझाती है.

बहुत सालों तक हम ब्रह्माण्ड को स्थिर मानते रहे. बीसवीं सदी की शुरुआत में पता चला कि ब्रह्माण्ड फैल रहा है. सबकुछ एक-दूसरे से दूर जा रहा है. बिग बैंग थ्योरी कहती है कि अगर ये ब्रह्माण्ड फैल रहा है तो इसकी शुरुआत एक बिंदु से हुई होगी. उसी बिंदु पर सारा ब्रह्माण्ड सिमटा रहा होगा. और वहां एक धमाके (बिग बैंग) से ये ब्रह्माण्ड बना.

बिग बैंग से यहां तक का सफर दिखाता इलस्ट्रेशन.(सोर्स - नोबेल प्राइज़)
बिग बैंग से यहां तक का सफर दिखाता इलस्ट्रेशन.(सोर्स – नोबेल प्राइज़)

बिग बैंग थ्योरी 1927 में आई. लेकिन इसका कोई ठोस सबूत नहीं था. सबूत 1964 में सामने आया, जब दो अमेरिकी एस्ट्रोनॉमर्स के एन्टीना ने जाने-अनजाने एक रेडिएशन पकड़ लिया. रेडिएशन का नाम है कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड. शॉर्ट फॉर्म है CMB.

ये बिग बैंग के बाद का रेडिएशन था, जो अब तक स्पेस में डटा हुआ है. ये रेडिएशन उस समय के ब्रह्माण्ड को जानने का सबसे अच्छा साधन बना. जेम्स पीबल्स ने CMB रेडिएशन की पढ़ाई की. और बिग बैंग से लेकर अब तक के ब्रह्माण्ड का हुलिया सामने रखा.

ब्रह्माण्ड में CMB रेडिएशन के तापमान का एक नक्शा. (सोर्स - विकिमीडिया)
ब्रह्माण्ड में CMB रेडिएशन के तापमान का एक नक्शा. (सोर्स – विकिमीडिया)

पीबल्स ने इस पढ़ाई में दो दशक से ज़्यादा का समय लगाया और एक थ्योरिटिकल मॉडल तैयार किया. पीबल्स का ये मॉडल ब्रह्माण्ड की शुरुआत से लेकर अब तक की कहानी समझने का आधार बना. और पीबल्स के इसी योगदान के लिए आज उनका नाम नोबेल में शामिल किया गया है.

2019 फिज़िक्स नोबेल प्राइज़ के दो हिस्सेदार और हैं. इन दो हिस्सेदारों ने ब्रह्माण्ड की एक और गुत्थी को सुलझाने में दिमाग खपाया.

माइकल मेयर और डिडियर केलॉज़ – क्या हमारे अलावा कुछ और भी है?

बहुत समय तक हमें केवल अपने सौरमंडल के ग्रहों के बारे में ही पता था. 1917 तक हमें नहीं पता था कि सूरज जैसे दूसरे तारों के आसपास कोई ग्रह हैं या नहीं? 1917 में ग्रहों के होने का पता तो चल गया, लेकिन ऐसा कोई ग्रह हमें मिला नहीं था. और इस बारे में सबसे झामफाड़ खोज 1995 में हुई.

मेयर और केलॉज़ ने अपने टेलीस्कोप से ब्रह्माण्ड में झांका और 6 अक्टूबर, 1995 को दुनिया के सामने दो नाम लेकर आए. 51 पेगसी और 51 पेगसी b. 51 पेगसी एक तारे का नाम है और उसके नज़दीक चक्कर काट रहे ग्रह का नाम है 51 पेगसी b.

51 पेगसी और 51 पेगसी b. (सोर्स - विकिमीडिया)
51 पेगसी b (लेफ्ट)और 51 पेगसी (राइट) . (सोर्स – विकिमीडिया)

हमारे सौरमंडल में सभी ग्रह सूरज के चक्कर काटते हैं. लेकिन बाहर भी सूरज जैसे कुछ सितारे ऐसे हैं जिनके चारों तरफ उनके ग्रह घूमते हैं. उन ग्रहों को एग्सोप्लैनेट्स कहते हैं. 51 पेगसी b भी एक एग्सोप्लैनेट है. मेयर और केलॉज़ का एग्सोप्लैनेट पहचानने का तरीका एक क्रांतिकारी कदम था. इसके बाद से अबतक 4000 से ज़्यादा एग्सोप्लैनेट्स खोजे जा चुके हैं.

51 पेगसी b की खोज ने ये समझने में भी मदद की कि किन भौतिक परिस्थितियों में किसी तारे के आसपास ग्रह बनते हैं.

तो कुल मिलाकर 1995 में हुई इस एग्सोप्लैनेट की खोज ही थी जिसने मेयर और केलॉज़ को 2019 का फिज़िक्स नोबेल प्राइज़ दिलाया है.


वीडियो – दुनिया में सिर्फ दो लोगों के पास नोबेल और ऑस्कर दोनों हैं

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