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गजराज राव इंटरव्यू (भाग-4): एक्टिंग मास्टरक्लास - अभिनेताओं के लिए सबक

स्ट्रगलिंग एक्टर्स के लिए बहुत जरूरी सबक.

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Q35. दिल्ली से बंबई जब गए थे तब के दिन कैसे थे? ऑडिशन देते थे?
मैं ऑडिशन नहीं देता था क्योंकि मैं बंबई आया था तो विज्ञापनों में ही असिस्ट कर रहा था प्रदीप सरकार जी को. मैं उस सोच समझ के साथ ही आया था कि मुझे बेचारगी के साथ अभिनय नहीं करना है. मुझे वही पात्र करने हैं जो मुझे पसंद आएं. और ऐसे ही निर्देशकों के साथ काम करना है जिनकी अप्रोच अच्छी हो, जिनका कुछ विजन हो. अगर आप मेरे सारे काम देखेंगे तो उसी तरीके से चीजों को मैंने किया है. मुझे नहीं याद कि कभी ऑडिशन के लिए जाना होता था. 100-200 लोगों के बीच जाकर बैठना, उससे मुझे बहुत घबराहट होती थी. दिल्ली में रहते हुए मैंने ऑडिशन दिए थे प्रकाश झा के लिए, डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के लिए.

Q36. कौन सी फिल्म थी प्रकाश झा की?
नहीं याद. उसमें 50-100 एक्टर थे. वहीं डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के धारावाहिक ‘चाणक्य’ के लिए ऑडिशन दिया था. लेकिन अच्छी बात ये थी कि दोनों ही प्रोडक्शन हाउस से बाद में मुझे अंतर्देशीय पत्र आया और एक पोस्टकार्ड आया था. वो मुझे बड़ा अच्छा लगा था कि अरे यार मैं गया और उसको इन्होंने सम्मान दिया. ऐसा नहीं है कि आप भीड़ में जाकर आ गए और खत्म हो गया.

Q37. एक्टिंग करना सीखने में कितना टाइम लगता है? एक आकांक्षी कैसे तय करे कि उसे ठीक एक्टिंग आने लगी है? उनके लिए बताएं जिनका सपना है फिल्मों में जाना.

 ≈1. मुझे लगता है कि एक्टर की जो क्लास है एक्टिंग की वो कभी खत्म होती ही नहीं है. जैसे मैं अभी आप से बात कर रहा हूं और मैं आपकी भाषा समझने की कोशिश कर रहा हूं कि आप कैसे भाषा बोल रहे हैं, आपका स्लैंग क्या है, आपने जगह बताई है तो आप कहां बैठे होंगे, क्या आपकी उम्र होगी, मुझे अगर किसी जगह किसी फिल्म में ऐसे एक जर्नलिस्ट का पात्र करना पड़ा तो मैं इसको कैसे फॉलो कर सकता हूं तो ये आज 25वें साल में भी आप मेरी क्लास ले रहे हैं. मुझे मौका दे रहे हैं कि मैं आपको ऑब्जर्व कर पाऊं, आपकी बातों को सुनकर. एक अभिनेता के लिए उसकी क्लास कभी खत्म नहीं होती.

≈2. लगातार रियाज़, लगातार ट्रेनिंग, लगातार ऑब्जर्वेशन. आप लोगों को देखते रहते हैं, बात करते करते.

करियर के पहले किरदार अशोक चंद (बैंडिट क्वीन, 1994) को निभाते हुए गजराज राव.
करियर के पहले फिल्मी किरदार अशोक चंद (बैंडिट क्वीन, 1994) को निभाते हुए गजराज राव.

≈3. जैसे कॉफी शॉप मुझे बड़े पसंद आए हैं. मैं सीसीडी में या स्टारबक्स में या बाकी जो भी चाय की दुकानें होती हैं वहां पर बैठकर लोगों को देखता हूं. उनकी बॉडी लैंग्वेज समझना, या एयरपोर्ट पर, सिनेमा हॉल में, या बाजार में, लोगों को देखना मुझे बड़ा अच्छा लगता है. कि उनमें से कौन किस शहर या प्रांत का होगा, कैसे बोलता होगा, किस प्रोफेशन का होगा.

≈4. जैसे मैं डॉक्टर्स से मिलता हूं तो उनके हाव भाव को आत्मसात करने की कोशिश करता हूं ताकि जीवन में कोई अगर रोचक पार्ट मिल गया तो. लिख लेता हूं मैं कि इसने इसको ऐसे बोला था, ज को ज़ बोला तो ऐसे .. या जैसे होता है न कि कई बार लोग आपको मिलते हैं तो हाथ आगे बढ़ा देते हैं, कुछ जोक बोला और हाथ आगे बढ़ा दिया ताली बजाने के लिए, ऐसे.

≈5. मेरा सोचना है कि ऐसा नहीं है कि आपके अंदर एक्टर नहीं है और कोई इंजेक्ट कर देगा. एक्टर आपके अंदर होता है, आपको पॉलिश करने की जरूरत होती है. वो करने में एक महीना, छह महीने, साल कितना भी लग सकता है.

≈6. निर्भर करता है कि आपकी समझ कितनी है. उसकी भूख कितनी है. आपकी बोध शक्ति (grasping power) कितनी है.

≈7. कई लोग होते हैं जो जिंदगी के बहुत लंबे पड़ाव के बाद एक्टिंग करते हैं. डॉ. श्रीराम लागू के बारे में मैंने पढ़ा कि वो डॉक्टर थे और शायद तीस-चालीस साल की उम्र के बाद उन्होंने एक्टिंग शुरू की थी. विज्ञापन में भी ऐसे लोगों को जानता हूं जिन्होंने बहुत देर के बाद एक्टिंग शुरू की.

≈8. एक्टिंग का लिमिटेड कुछ नहीं होता है. आपके अंदर एक्टर होना जरूरी है. कोई एक स्पार्क या ऑब्जर्वेशन पावर होनी चाहिए.

≈9. आपके रिफ्लेक्स बहुत शॉर्प होने चाहिए.

≈10. आपकी जो ट्रेनिंग होती है चाहे वो एक्टिंग स्कूल हैं, वीकली या मंथली, या तीन महीने या तीन साल के वो आपकी एक्टिंग को पॉलिश कर सकते हैं, आपको इंजेक्ट कोई नहीं कर सकता. क्योंकि मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं जो 20-20, 10-10 साल बाद भी अभिनय नहीं कर पाते हैं. उनको लगता है कि अभिनय इतनी मेहनत करने के बाद हो जाएगा. ऐसा होता नहीं है.

Q38. मान लें किसी राज्य का कोई लड़का या लड़की है, वो मुंबई में जाकर कास्टिंग असिस्टेंट बन गया/गई है. ताकि थोड़ा किराए के पैसे की व्यवस्था भी हो जाए और  साइड में ऑडिशन भी दे रहे हैं. वो अगर अपनी शक्ल देखकर या उच्चारण देखकर तुलना करेंगे बड़े फिल्म स्टार्स या अदाकारों से, तो उन युवा एक्टर्स को कैसे यकीन हो पाएगा कि वो वहां कभी पहुंच भी पाएंगे? और अगर न पहुंच पाए तो? 

≈11. एब्सलूटली, जब मैंने तय किया था 25 साल पहले तब स्थितियां बहुत नेगेटिव थीं. बहुत कम अवसर थे काम के मुकाबले. आज की तारीख में अभिनेताओं के लिए, अगर आपके अंदर टैलेंट है तो बहुत सारे अवसर हैं. शोज़ हैं, डांस शोज़ हैं, इंडियन आइडल है, इंडियाज़ गॉट टैलेट है, यूट्यूब है.

अपने सबसे लेटेस्ट किरदार जीतेंदर कौशिक (बधाई हो, 2018) को निभाते हुए राव.
अपने सबसे लेटेस्ट किरदार जीतेंदर कौशिक (बधाई हो, 2018) को निभाते हुए राव.

≈12. मतलब सबसे बड़ी कमाल की बात है कि आपके अंदर अगर टैलेंट है और आप झुंझनू में हो कहीं पर, या आप बीकानेर में बैठे हो और आपको लग रहा है कि आपको अपॉरच्यूनिटी नहीं मिल रही है या आपको कोई काम नहीं दे रहा है, आप बॉम्बे भी स्ट्रगल करके लौट आए हो, तो आप कुछ मत करो. आप यूट्यूब पर अपने वीडियो निकाल निकालकर पोस्ट करो.

≈13. उसमें कॉन्टेंट होना चाहिए. ऐसा नहीं है कि कुछ भी पोस्ट करोगे. उसके अंदर ड्रामा होना चाहिए जिसकी वजह से लोग आपको देखें. उसकी व्यूअरशिप बढ़े. तो आपके पास जरिए हैं अपने टैलेंट को दिखाने के बहुत सारे. आज का जो युवा है उसके लिए स्थिति बहुत अच्छी है.

≈14. जैसे आपने कहा कि किसी कास्टिंग डायरेक्टर को असिस्ट करना या ऑडिशन देना, ये आपको बहुत अच्छे से सिखाता है.

≈15. जब आप किसी दूसरे को खराब या अच्छी एक्टिंग करते हुए देखते हैं तो आप बहुत सारी चीजें सीखते हैं प्रैक्टिकल में.

≈16. मैं हमेशा कहता हूं जो मेरे पास एक्टिंग के लिए, स्ट्रगल के लिए आते हैं. कि आप अपने लिए समय सीमा रखें. छह महीना, साल अपने आप को दें कि भई इतना टाइम और इतना मेरे पास बजट है. और इसके हिसाब से मैं इतना स्ट्रगल करूंगा. और उसके बाद नहीं हो रहा है तो कुछ और काम कीजिए. भले ही वो सिनेमा से संबंधित हो, असिस्ट कीजिए और फिर उसके साथ साथ इस कोशिश को दोहराते रहिए. लेकिन दीवार पर सिर फोड़ने से कुछ नहीं होगा. हर कोई नवाजुद्दीन सिद्दीकी नहीं होता कि वो गार्ड की नौकरी भी करेगा और बेचारगी के दिन भी झेलेगा और आज एक दिग्गज अभिनेता कहलाएगा. ऐसा लाखों में कोई एक विरला होता है जिसकी किस्मत ऐसी चमकती है.

एक एड फिल्म के सेट पर, डायरेक्शन करते हुए राव.
एक एड फिल्म के सेट पर, डायरेक्शन करते हुए राव.

Q39. शुरुआती फिल्में आपको कैसे मिली थीं?
कर्टसी तिग्मांशु धूलिया. ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘दिल से..’ ये दोनों (पहली और दूसरी फिल्म) मुझे तिग्मांशु धूलिया की वजह से मिलीं. क्योंकि वो मेरा थियेटर देखते थे और मैं उनका प्रिय था उस समय.

Q40. थियेटर में आपको लेकर ऐसा क्या आकर्षण हुआ करता था? तिग्मांशु की आंखों में आपको देख क्यों चमक आती होगी? या क्या ऐसा जादू था जो आपके जानने वालों के मन में आपका रेफरेंस हो गया होगा?
मैं improvise (तत्क्षण, अभिनय को अनियत तरीके से आगे बढ़ाते जाना) बहुत अच्छा करता था. मंच से मुझे बड़ा प्रेम था. मंच से मुझे भय नहीं लगता था. कभी डर नहीं लगता था. तीन दिन पहले भी अगर मुझे किसी प्ले में कास्ट किया गया है तो वो मैं पूरे अच्छे तरीके से निभा पाया. लकी था कि मेरी मैमोरी बहुत शार्प थी खासतौर पर उस वक्त पे. डायलॉग बहुत जल्दी याद होते थे. और इंप्रोवाइज़ेशन हो, वो शायद पसंद आता था. मेरी भाषा भी. क्योंकि मैं रेलवे कॉलोनी में रहता था तो अलग अलग भाषाओं से मेरा परिचय हुआ. जैसे एक प्ले हमने किया था ‘नेटुआ’, जो बिहार में लौंडा नाच होता है ना. मनोज बाजपेयी उसमें मुख्य भूमिका निभा रहे थे और वो बिहार के एक गांव की कहानी थी. उसमें एक जमींदार का रोल किया था मैंने. थोड़ा भोजपुरी और बिहारी लहजे में बोलना, वो हो पाया. ऐसी बहुत सारी चीजें थीं.

Q41. आपने कहा आपको भय नहीं लगता था. तो ये भय थियेटर में आने के बाद लगना बंद हुआ या शुरू से ही नहीं लगता था और क्यों नहीं लगता था?
रंगमंच से पहले तो लगता था. पहले तो पिंडलियां, घुटने जम जाते थे. चूल पूरी हिल जाती थी. हाथों को मालूम ही नहीं होता था करना क्या है. कहां रखेंगे, जेब में रखेंगे, कमर पर रखेंगे, कैसे होगा. नहीं मालूम था. लेकिन हमारा जो ग्रुप बना था.. एक अच्छी चीज हुई कि मैंने तकरीबन 100 प्ले किए, एक ग्रुप था खिलौना थियेटर ग्रुप. उसके अंदर एनएसडी के ग्रेजुएट थे वीके शर्मा, उनका ग्रुप था ये जिसमें हम लोग पांच-छह एडल्ट लोग, बच्चों के लिए नाटक किया करते थे. मिनिमम प्रॉप्स के साथ. दिल्ली और आस-पास की स्कूलों में जाकर हम लोग प्ले करते थे बच्चों के लिए. एक घंटे का शो होता था, उसमें उनकी एक कविता थी ‘सोने की मछली’. तो उसने बहुत गांठें खोल दीं और बच्चों के सामने जब आप थियेटर करते हैं तो उसके अंदर आपके लिए बहुत सारी चीजें आसान हो जाती हैं.

'एक्ट वन' के दौर के अपने साथियों मनोज बाजपेयी, निखिल वर्मा और आशीष विद्यार्थी के साथ गजराज राव.
‘एक्ट वन’ के दौर के अपने साथियों मनोज बाजपेयी, निखिल वर्मा और आशीष विद्यार्थी के साथ गजराज राव.

कुछ समय के लिए स्ट्रीट प्लेज़ भी किए थे. फिर जो एक्ट वन थियेटर ग्रुप बना तो उसके अंदर जिस तरह के नाटक हमारे होते थे, जो एडेप्टेशन हम लोग करते थे, उसमें इंप्रोवाइजेशन की बहुत गुंजाइश होती थी क्योंकि हम लोग कभी भी बनी बनाई लीक वाले प्लेज़ नहीं करते थे. कोई कहानी उठाई या कोई अंग्रेजी नाटक उठाया और उसका एडेप्टेशन हम लोग करते थे. और आपके जो संगी साथी होते हैं निश्चित तौर पर उनका बहुत योगदान होता है. मेरे जो साथी थे सारे, मेरे जो निर्देशक हैं, एनके शर्मा, आशीष विद्यार्थी, मनोज बाजपेयी, पीयूष मिश्रा, निखिल वर्मा, अरुण कालरा, ये सब लोग थे जो कि एक बड़ी अच्छी camaraderie हो गई थी उस दौरान. तो उस वजह से शायद रंगमंच से इतनी दोस्ती बन गई थी. ये वजह रही होगी. क्योंकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. ऐसा नहीं कोई कह सकता कि मैं तीसमारखां हूं. वो, खासतौर से रंगमंच, एक ग्रुप एक्टिविटी है. उसमें सभी का योगदान आपके जीवन में होना जरूरी है.

Q42. ये थियेटर के आपकी बुनियाद के कुल बरस कितने थे?
चार-पांच साल कह सकते हैं. इस दौरान एक्ट वन भी हुआ और मैं लकी था कि मुझे रंजीत कपूर के साथ दो-तीन प्ले करने का मौका मिल गया. उन्होंने दो-तीन बड़े धांसू पात्र दिए मुझे. एक प्ले तो ऐसा था जो शुरू में मिला मुझे, ये 1989 की बात है, नवंबर की. 11-12-13-14 नवंबर को उनका प्ले होने वाला था – “एक संसदीय समिति की उठक-बैठक”. ये एक अंग्रेजी नाटक का एडेप्टेशन था जिसके अंदर सांसदों की एक कमिटी बैठी है, जिसमें तीन लोग दून स्कूल वाले हैं और तीन लोग हार्टलैंड से हैं काऊ बैल्ट से. और वो किसी बात पर बहस कर रहे हैं. ये बड़ा विजनरी प्ले था. उतना आप सोच भी नहीं सकते थे कि इंडियन पार्लियामेंट में कभी इस तरह की जूतम पैजार होगी.

उस समय ये हुआ कि शो से तीन दिन पहले दो-तीन जो एक्टर्स थे, किसी वजह से उनको प्ले छोड़ना पड़ा. उनको चूंकि अवसर कम मिलते थे और शायद कोई लंबा सीरियल मिल गया था ऐसा कुछ हुआ था बंबई में, और आपसी सहमति से वो लोग चले गए. मुझे चेयरमैन का पार्ट मिला था प्ले में. रंजीत भाई को भरोसा था क्योंकि उनके जो बाकी प्लेज हुए थे उनमें मैंने छोटे छोटे पात्र किए थे लेकिन मैं रिहर्सल में सारे पात्रों की रीडिंग करता था. उनको ये था कि यार इसको लाइनें याद हो जाती हैं जल्दी. उन्होंने मुझे बुलाकर बोला कि गजराज ये ऐसा है, तुम्हे करना पड़ेगा. मैंने कहा, नहीं सर ये तो पूरा प्ले भरा हुआ है चेयरमैन के डायलॉग्स से. उन्होंने मुझे क्या बोला कि तुम टेबल पर स्क्रिप्ट अपने सामने रख लेना. जहां भूलोगे वहां पढ़ लेना.

Luckily, ऐसा हुआ कि वो लाइनें मुझे याद हो गईं. घोषाल था, बंगाली चेयरमैन बना दिया मैंने उसको. बड़ा हिट हुआ था वो नाटक. ऐसी चीजें होती हैं जो आपको बल देती हैं जैसे रंजीत भाई ने बोला कि ‘गजराज तुम कर लोगे मुझे मालूम है. और नहीं होगा तो उसकी जिम्मेदारी मेरी है. तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं है.’ तीन दिन में हुए उस प्ले से मुझे बहुत हौसला मिला कि मैं ये कर सकता हूं.

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गजराज राव इंटरव्यू Part-1: वो एक दिन जिसने जिंदगी बदल दी
गजराज राव इंटरव्यू Part-2: खुद को निराशा से बाहर कैसे निकालते हैं
गजराज राव इंटरव्यू Part-3: कोई रोल करते हुए एक्टर के सरोकार क्या होते हैं?
गजराज राव इंटरव्यू Part-5: अपने किरदारों को कैसे अप्रोच करते हैं?

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