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कहानी उस एक्टर की, जिसकी एक साथ 6 फ़िल्में 25 हफ्ते तक सिनेमा घरों में चलती रहती थीं

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और आज़ादी का आपस में बड़ा गहरा रिश्ता है. आज़ादी के बाद बंटवारे के दौरान मौत की नंगी नुमाइश ने यूं तो ढेरों नगीनों की कुर्बानी ली, लेकिन फिर कईयों से नवाज़ा भी. लोग दिए, बात करने के लिए मुद्दे दिए, कालजयी कृतियां दी, अविस्मणीय सिनेमा दिया और ढेरों बनाने वाले दिए. आज़ादी के वक्त लोगों ने ढेरों सपने देखे थे. लेकिन उन सपनों के साकार होने में अभी वक़्त था. जब लोग इन चीज़ों से जूझ रहे थे, तो सिनेमा ने उनके वो ख्वाब पूरे करने शुरू किए.

ये जिन लोगों की वजह से हो रहा था उनमें कई अदला-बदली के शिकार कलाकार थे, जो अपना सब कुछ छोड़कर दूसरे मुल्क में पनाह लेने आए थे. उसी में एक नाम था अभिनेता राजेंद्र कुमार का, एक वक्त जिनकी अमूमन हर फिल्म सिल्वर जुबली होती थी. लोग उन्हें प्यार से ‘जुबली कुमार’ बुलाने लगे थे. ये वो वक़्त था, जब भारत की फिल्म इंडस्ट्री में सुपरस्टार नहीं हुआ करते थे. वैसे अगर सुपरस्टार का दर्जा होता, तो इन्हें जरूर मिलता. (किसी एक्टर को सुपरस्टार का दर्जा इनके बाद इंडस्ट्री में कदम रखने वाले राजेश खन्ना के दौर से शुरू हुआ था.)

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लेकिन राजेंद्र कुमार को कम आंकने की भूल करने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि वो एक ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने अपने चार दशक लंबे करियर में ढेरों सुपरहिट फ़िल्में दीं. 60 के दशक में तो एक ऐसा वक़्त भी आया, जब इनकी 6-7 फ़िल्में एक ही समय पर सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली (लगातार 25 हफ्ते तक सिनेमाघरों में चलना) सेलिब्रेट कर रही थीं. ‘साजन बिना सुहागन’, ‘कानून’, ‘गूंज उठी शहनाई’, ‘बिन फेरे हम तेरे’, ‘गंवार’, आदि उनकी खास फ़िल्में थीं.

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राजेंद्र ने प्रोड्यूसर के तौर पर भी ढेरों फ़िल्में बनाईं. अपने बेटे कुमार गौरव का बॉलीवुड लॉन्च उन्होंने अपने बैनर से ही किया. वो फिल्म थी ‘लव स्टोरी’. 1981 में आई ये फिल्म ब्लॉकबस्टर रही और गौरव रातों रात स्टार बन गए. लेकिन उनका करियर आगे कुछ खास चल नहीं पाया.

आइए जानते हैं उस राजेंद्र की ज़िंदगी और फिल्मों से जुड़ी कुछ बातें:

पहला ब्रेक

20 जुलाई 1929 को पंजाब के सियालकोट में जन्में थे राजेंद्र कुमार. तब हमारा देश ब्रिटिश इंडिया कहलाता था. उनके दादा जी मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर थे और पापा कराची और सिंध में कपड़े का बिज़नस करते थे. मतलब राजेंद्र खाते-पीते घर के थे. लेकिन बंटवारे ने आरामगाह छीनकर एक रिफ्यूजी में तब्दील कर दिया जिसे अपना मुल्क छोड़कर परिवार संग दिल्ली आना पड़ा. पैसे की ज़रूरत थी. कमाने का कोई ज़रिया चाहिए था, क्योंकि सारा काम-धंधा तो पाकिस्तान में रह गया था.

राजेंद्र कुमार ने सोचा करना ही है, तो कुछ ढंग का करते हैं. सो फिल्मों में जाने का सोचा लेकिन हीरो बनने नहीं, डायरेक्टर बनने. लेकिन पैसों की इतनी किल्लत थी कि ट्रेन का किराया तक जेब नहीं था. अपनी कलाई से घड़ी उतारी और बेच दी, 65 रूपये में. फ्रंटियर मेल पकड़ी और अपने सपनों की पोटली लिए पहुंच गए सपनों की नगरी मुंबई.

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राजेंद्र मुंबई पहुंचकर मशहूर डायरेक्टर एच.एस रवैल को असिस्ट करने लगे. इसी दौरान प्रोड्यूसर देवेन्द्र गोयल की नज़र इनपर पड़ी और उन्होंने राजेंद्र को अपनी फिल्म ‘जोगन’ में दिलीप कुमार और नर्गिस के साथ साइन कर लिया. ये साल था 1955. इस फिल्म के लिए इन्हें मात्र 1500 रूपये मिले थे. ये फिल्म हिट हुई और राजेंद्र कुमार को स्टार माना जाने लगा.

राज कुमार को बुलाते थे ‘डैडी’, ‘उल्लू का पट्ठा’

पहली फिल्म हिट होने के बाद राजेंद्र के पास फिल्मों के ढेरों ऑफर आने लगे, जिन्हें इन्होंने बखूबी स्वीकार भी किया. उनकी अगली फिल्म थी महबूब खान की ‘मदर इंडिया’. इस फिल्म में इनके सह-कलाकार थे सुनील दत्त, राज कुमार और नर्गिस. जैसा कि आपको सब को मालूम होगा, फिल्म में राज कुमार और नर्गिस ने सुनील और राजेंद्र के माता पिता की भूमिका अदा की थी. लेकिन इनकी उम्र में कोई ज़्यादा अंतर नहीं था.

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फिल्म मदर इंडिया के एक दृश्य में सुनील दत्त और नर्गिस के साथ राजेंद्र कुमार

एक इंटरव्यू में राजेंद्र कुमार ने बताया था कि इस फिल्म की तरह ही शूटिंग के दौरान भी नर्गिस उनका अपने बच्चे जैसा ही ख्याल रखती थीं. सुबह हाथ में ब्रश और पेस्ट लेकर वो ही राजेंद्र और सुनील को जगाने आती थीं. जबकि फिल्म में इनके पिता का किरदार निभाने वाले राज कुमार को ये ‘डैडी और ‘उल्लू का पट्ठा’ कहकर बुलाते थे.

इनका घर राजेश खन्ना खरीदना चाहते थे

राजेंद्र कुमार का सियालकोट में महलनुमा मकान था, लेकिन भारत आने के बाद उनके पास घर नहीं था. मुंबई में रहने के दौरान जब उन्हें कार्टर रोड पर एक खाली बंगले के बारे में पता चला तो वो उसे खरीदने की जुगत में लग गए. उस घर को लोग भुतहा मानते थे और राजेंद्र के पास पैसे कमी भी थी. लेकिन राजेंद्र कुमार वो बंगला खरीदने की ज़िद पर अड़े हुए थे. इसमें उनकी मदद की बी.आर चोपड़ा ने. चोपड़ा ने इन्हें तीन फिल्मों की फीस एडवांस में दे दी, जिसमें एक फिल्म थी ‘कानून’.

इस घर में शिफ्ट होने के बाद राजेंद्र कुमार की मानो किस्मत ही बदल गई. उनकी फिल्में लगातार हिट होतीं और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चलती रहतीं. लेकिन अच्छा वक़्त हमेशा के लिए नहीं रहता. एक वक्त आया, जब राजेंद्र कुमार की फ़िल्में चलना कम हो गईं. वजह, इंडस्ट्री में एक नया लड़का आ गया था – राजेश खन्ना नाम का. राजेश खन्ना की फ़िल्में अब काफी पसंद की जाने लगी थीं. लेकिन उन्हें सुपरस्टार बनने में अभी कुछ वक्त था. फिर भी राजेश खन्ना ने राजेंद्र कुमार के बंगले को खरीदने की इच्छा जता दी. ये सबको हैरान करने वाला था.

बाद में पता चला कि राजेश खन्ना स्टारडम के लालच में वो बंगला खरीदना चाहते थे. उन्हें लगता था कि जिस तरह इस घर ने राजेंद्र कुमार को अपार सफलता दिलाई थी, उस घर में जाने के बाद उनके साथ भी कुछ वैसा ही होगा.

जब खुद बिस्मिल्ला ख़ां ने तारीफ की

राजेंद्र कुमार जब अपने स्टारडम के शिखर पर थे, उसी दौरान एक फिल्म आई थी ‘गूंज उठी शहनाई’. इस फिल्म में राजेंद्र कुमार ने शहनाई वादक की भूमिका निभाई थी. इस फिल्म में अपने किरदार को निभाने के लिए राजेंद्र कुमार को खासी मशक्कत करनी पड़ी थी. उन्होंने शहनाई तो नहीं सीखी लेकिन एक्सप्रेशंस सीखने पड़े. इस काम लिए उन्होंने मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्ला ख़ां से मदद ली.

राजेंद्र कुमार लकड़ी की नकली शहनाई लेकर शीशे के सामने बैठ जाते और रिकॉर्डिंग के दौरान देखे बिस्मिल्ला ख़ां के एक्सप्रेशन और कंधे-गले की हरकत को कॉपी करने की कोशिश करते. फिल्म रिलीज़ होने के बाद जब राजेंद्र कुमार ने बिस्मिल्ला ख़ां को फिल्म दिखा कर उनसे फीडबैक लिया तो उन्होंने ने कहा,

‘आप फिल्म में कहां थे मैंने तो फिल्म में सिर्फ खुद को देखा.’

 


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