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'फिर उन्होंने कुछ टैंकों को अपनी बटालियन की तरफ आते देखा'

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अंकिता जैन चंबल की घाटियों में बसे एक छोटे से गांव जौरा की रहने वाली हैं और आजकल सतपुड़ा की वादियों में बसे जशपुरनगर में रह रही हैं. मासिक पत्रिका ‘रूबरू दुनिया’ की संस्थापक-संपादक रहीं अंकिता की लिखी कहानी को जब अंतरराष्ट्रीय कहानी लेखन प्रतियोगिता में टॉप टेन में जगह मिली तो उन्हें लगा कि वह भी थोड़ा-बहुत लिख सकती हैं. इस विचार ने उन्हें बिग एफएम के फेमस शो ‘यादों का इडियट बॉक्स’ एवं ‘यूपी की कहानियां’ तक पहुंचाया. रेडियो पर अब तक अंकिता की दो दर्जन कहानियां प्रसारित हो चुकी हैं. 2015 में अंकिता के लिखे पहले अंग्रेजी उपन्यास ‘The Last Karma’ को पाठकों ने पसंद किया. एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए अंकिता की ये कहानी


वो वीर था हिंदुस्तानी

‘दस-दस को एक ने मारा… वो वीर था हिन्दुस्तानी..’ दिन है १० सितम्बर और गाजीपुर जिले के धामुपुर गांव की प्राथमिक शाला में किसी राष्ट्रीय त्यौहार की जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं..पूरे स्कूल को तिरंगे से सजाया गया है, स्कूल ग्राउंड में बिछे फर्श पर कतार में बच्चे बैठे हैं, उनके सामने रखी टीचरों की कुर्सियों के बगल में ही रखी एक टेबल पर सफ़ेद चादर बिछी है और उसके ऊपर रखी है भारत-माता की तस्वीर के साथ ही परमवीर चक्र अब्दुल हमीद की तस्वीर.. लेकिन उस पर कोई माला नहीं चढ़ी है, क्योंकि स्कूल के प्रिंसिपल का मानना है कि ‘वीर कभी मरते नहीं’. ये वही प्राथमिक शाला है जहां से अब्दुल हमीद ने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी. अब्दुल हमीद १९६५ के हिन्दुस्तान पाकिस्तान युद्ध का एक जाना-माना नाम है… जिन्होंने अकेले ही दुश्मनों के पसीने छुड़ा दिए थे.. तभी से १० सितम्बर का दिन जो उनकी शहादत का दिन भी है, को गांव वाले शहीद दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं… स्कूल में इकठ्ठा होकर, जहां छोटे-बड़े कार्यक्रम रखे जाते हैं, बच्चों को देश सेवा के लिए प्रेरित किया जाता है और सुनाई जाती है वीर अब्दुल हमीद की वीरता की कहानी, पहले ये कहानी सुनाने उनकी पत्नी रसूलन बी और पोते जमील आते थे, और जब वे पूरे जोश से बच्चों को सुनाते थे कि-

‘हमारा गाजीपुर दो ही चीज़ों के लिए प्रसिद्ध है…. एक अफीम के कारखाने और दूसरा हमारे दादा जी अब्दुल हमीद के लिए.. जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब कक्षा ६ में मेरी किताब में मेरे दादाजी के नाम का एक अध्याय भी था, मेरे मास्टर जब उसे पढ़ाते थे तो मैं फक्र से उन्हें बोलता था कि ये तो मेरे दादाजी हैं’ तो गांव वालों और स्कूल के बच्चों की तालियां गूंज उठती थीं, कईयों ने तो जमील से उनके दादाजी की कहानियां सुन-सुनकर ही एक सच्चा देशभक्त बनने के सपने देख लिए…. लेकिन गुज़रते वक़्त और ढलती उम्र के चलते अब जमील और रसूलन बी यहां नहीं आ पाते हैं, अब वे इस गांव में भी तो नहीं रहते…. कई साल पहले वे लोग धुलापुर रेलवे स्टेशन के पास रहने चले गए हैं…रसूलन बी की आंखें कमज़ोर पड़ गयी हैं, और जमील ने भी ढलती उम्र की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया है.. इसलिए अब इतनी दूर आ पाना उनसे बनता नहीं…… कोई बात नहीं.. आज उस वीर की कहानी मैं आपको सुनाऊंगा…

धुमापुर गांव में कटाई के लिए तैयार फसल के बीचोंबीच खंडहर हालत में जो एक पुराना मकान खड़ा है ना, कई साल पहले यहीं पर अब्दुल हमीद अपनी सिलाई की मशीन के साथ बैठे लोगों के कपड़े सिया करते थे. उनके पिता दर्जी थे, इसलिए देश सेवा में ख़ुद को न्योछावर करने से पहले तक हमीद ने अपने पिता के कन्धों का बोझ बांटा करते थे..

हमीद बचपन से ही स्वाभिमानी थे, वे मेहनत करके सम्मान भरी ज़िन्दगी जीने में विश्वास रखते थे. अपनी ज़रूरतों के लिए मुफ्त के पैसे, या मांगकर पैसे लेना उनकी फितरत नहीं थी. उनकी इसी स्वाभिमान का एक किस्सा गांव वालों से ज़रूर सुनने मिल जाता है….हुआ यूं था कि ‘पास के गांव’ के हसीन अहमद ज़मींदार ने, जो खुद भी एक निशानेबाज़ थे, एक बार एक ख़ास चिड़िया को मार गिराने वाले को ईनाम में बड़ी रकम देने की घोषणा की, क्योंकि वे खुद उस चिड़िया को मार नहीं पा रहे थे. जब हमीद को पता लगा तो उन्होंने अपने दोस्त बच्चू को बुलाया और बोले, – ‘तेरी बन्दूक ला… मैं चिड़िया तो मार दूंगा लेकिन ईनाम का पैसा लेने जमींदार के घर नहीं जाऊंगा..’ फिर उन्होंने बच्चू की बन्दूक से एक ही बार में चिड़िया को मार गिराया. जब उनकी जगह बच्चू जमींदार के घर ईनाम के पैसे लेने गया तो उसने देने से मना कर दिया और हमीद को ही आने को कहा जिस पर वे बोले थे – ‘मैं गरीब भले हूं लेकिन बख्शीस लेने नहीं जाता’ उसके बाद जमींदार को पैसे खुद हमीद के घर भिजवाने पड़े थे.

वे स्वाभिमानी थे इसलिए ही शायद बचपन से एक सैनिक बनने के सपने देखा करते थे.हमीद महज़ २० साल के थे जब बनारस में उन्हें सेना नियुक्ति के लिए चुना गया. नसीराबाद के ग्रेनेडियर्स रेजिमेंटल में ट्रेनिंग लेने के बाद उन्हें १९५५ में ४ ग्रेनेडियर्स में भेज दिया गया. १९६२ में वे नेफा में थांग ला में ७ माउंटेन बिग्रेड, माउंटेन डिवीज़न की तरफ से लडे. जब पाकिस्तान ने कच्छ के रन इलाके पर अप्रैल १९६५ में आक्रमण किया तो एक अच्छे निशानेबाज होने के नाते, उन्होंने युद्ध का रुख पलटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी.
हालांकि १९६५ के युद्ध में जाते वक़्त उनकी पत्नी रसूलन बी को लग गया था कि अब शायद वो वापस नहीं आयेंगे, उनके अनुसार जब हमीद जा रहे थे, तब कुछ हुआ था ऐसा…

उस दिन हमीद अपने बिस्तर बंद को घुटनों से दबाकर मोटी रस्सी से उसे बांध रहे थे, जब वे उसे कसकर उसमें एक और गांठ लगाने लगे तो रस्सी टूटकर उनके हाथ में आ गयी. बिस्तरबंद पूरा खुल गया, और उसके अन्दर की चीज़ें बिखरकर नीचे गिर गईं. उन चीज़ों में वो मफलर भी था जो रसूलन ने पड़ोस के गांव के मेले से उनके लिए खरीदा था. रसूलन की आंख भर आई, वो बोली ‘ये तो बहुत बुरा अपशगुन है… आप मत जाइए’
जिस पर हमीद बोले थे – ‘मैं नहीं रुक सकता, मुझे अपनी बटालियन को ज्वाइन करना है’, फिर उन्होंने रसूलन की आंखों से लुढ़ककर उसके गालों को भिगो चुके आंसुओं को पोंछकर कहा – ‘तू चिंता क्यूं करती है पगली, मैं १९६२ की लड़ाई में सुरक्षित नहीं लौटा था क्या ? इस बार भी दुश्मन को खदेड़कर वापस आउंगा…’ हमीद ने फिर अपना बिस्तरबंद बांधा और चल पड़े….

उस दिन हमीद न रसूलन के रोकने से रुके न किसी दोस्त न रिश्तेदार के रोकने से… जब उनके दोस्त बच्चू सिंह उनका ट्रंक और होल्डआल साइकल पर लादे उनके साथ जा रहे थे, तभी उस साइकल की चेन भी टूट गई. साथ चल रहे गांव वालों ने इसे भी अपशगुन माना और उन्हें एक रात रूककर अगली सुबह की ट्रेन पकड़ने की गुजारिश की, लेकिन हमीद ने किसी की नहीं सुनी… एक सच्चे देश-भक्त के आगे कोई भी बहाना काम नहीं करता… जब उसे अपनी भारत-माता के साथ खिलवाड़ होता दिखता है तो वो अपने गांव, अपने घर और अपने रिश्तों को भूलकर सारे देश से रिश्ता निभाता है, उन हजारों माताओं-बहिनों बच्चों और देशवासियों से रिश्ता निभाता जो शायद उसे जानते भी नहीं… हमीद ने भी तो वही करने की कसम खाई थी तो महज़ एक अपशगुन का भ्रम होने कैसे रोक लेता…

उन्हें ना तो कोई भ्रम रोक पाया और न ही कम हथियार होने की शंका… उस वक़्त १९६२ की लड़ाई से देश पूरी तरह उबर नहीं पाया था, सेना के पास पर्याप्त सैनिक और शस्त्र नहीं थे, हमारी पूरी ताकत महज़ आरसीएल गनों पर टिकी थी… आपको बता दूं कि आरसीएल गन ट्यूबलाइट से आकर की दिखने वाली एक लम्बी सी गन होती है, इन्हें तोप का एक बहुत छोटा सा रूप भी कहा जा सकता है, जो एंटी-टैंक के रूप में इस्तेमाल होती हैं… इस छोटे से हथियार के दम पर हिन्दुस्तान कैसे खुद को बचाएगा यही सोचकर पाकिस्तान को लगा कि कश्मीर को हथियाने की एक और कोशिश करने का यही सही मौका है… तब अमरीका ने भी उसका साथ दे दिया था… २०० पैटन टैंक, दो बमवर्षक जहाजों के बेड़े, चार सबर जेट के बेड़े और एक सुपरसोनिक फाइटर का बेड़ा मिला था पाकिस्तान को अमरीका से…उसी के दम पर उन्होंने कच्छ के रन पर हमला कर दिया था…भारत ने जवाबी कार्यवाई की, लेकिन युद्ध विराम समझौते पर दस्तखत के बाद कुछ दिन के लिए सब शांत हो गया.

फिर कुछ ही महीनों बाद अगस्त १९६५ की शुरुआत में पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में विद्रोह भड़काने की मंशा से चुपचाप अपने सैनिकों की घुसपैठ शुरू कर दी. इस घुसपैठ का मकसद जम्मू ओर कश्मीर में भारतीय शासन के खिलाफ विद्रोह भड़काना था. पाकिस्तान ने बड़ी ही चालाकी से हमले की योजना बनाई थी, १५ अगस्त के दिन भारतीय सेना लड़ाई के मैदान में कूद पड़ी और उसने गुरिल्लाओं के अड्डों को तबाह कर हाजी पी जैसे इलाकों पर कब्जा कर लिया. पाकिस्तान ने अखनूर पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन विफल रहा, फिर ६ सितम्बर को भारतीय सेना द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सीमा को लांघने के खिलाफ आधिकारिक रूप से युद्ध की घोषणा कर दी..

वो ८ सितम्बर की सुबह थी.. ९ बजे थे.. खेत में गन्ने की फसल लहलहा रही थी. हमीद जीप की पेसेंजर सीट पर बैठे थे. जीप के ऊपर आरसीएल गन लगी थी. खेतों के बीच से आती हवा की सरसराहट से हमीद सतर्क थे, चीमा गांव को पार करने के बाद उनकीजीप मिटटी की संकरी सड़क पर धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी. उन्हें पता था कि पाकिस्तान ने पैटन टेंकों की पूरी रेजिमेंट को लेकर हमला बोल दिया है और वे फॉरवर्ड पोजीशन तक घुस आये हैं.

पहले उन्हें बख्तरबंद गाड़ियों की घरघराहट सुनाई दी, फिर उन्होंने कुछ टैंकों को अपनी बटालियन की तरफ आते देखा.. खड़ी फसल की आड़ लेकर उन्होंने अपनी बन्दूक दुश्मन की दिशा में तानी ओर दुश्मन के नज़दीक आने का इंतज़ार करने लगे, दुश्मन चौकन्ना ना हो जाए इसलिए हथगोला फेंकने वाले सैनिक भी बिना आवाज़ किए छुपकर खड़े थे. जैसे ही टैंक ३० गज के दायरे में आये उन्होंने लोडर में गन लोड करके फायर करने को कहा. वो बम को ऊपर जाते हुए और दुश्मन के पहले टैंक की तरफ गिरते हुए देख रहे थे, वे अभी अपनी दूरबीन आंख के आगे ला भी नहीं पाए थे कि एक ज़ोरदार धमाका हुआ, उनकी आंखों के सामने दुश्मन का पहला टैंक जल रहा था.

हमीद और उनके साथी ख़ुशी से उछल रहे थे, उनके मुंह से निकला ‘शाबाश’, और सभी ने मुस्कुराकर एक छोटा सा जश्न मना लिया. उस धमाके से घबराकर पीछे आ रहे दो टेंकों के क्रू वाले जब भागने लगे तो उन्होंने ड्राईवर से गाड़ी मोड़कर चलाने को कह दिया…

फिर थोड़ी देर बाद ही लगभग ११ : ३० बजे के आसपास उनकी बटालियन पर बमबारी शुरू हो गयी. उन्हें एक बार जानी-पहचानी घरघराहट सुनाई दी, उन्होंने दूरबीन से देखा तो तीन और टैंक उनकी तरफ बढ़ रहे थे. उन्होंने अपनी जीप खेत के बीचों बीच खड़ी करवा दी ताकि झाड़ियों में छुपकर वह दुश्मन को नज़र ना आये, और अपनी बन्दूक तानकर खड़े हो गए.. जैसे ही टैंक नज़दीक आये, उन्होंने लोडर को इशारा किया, उनकी नज़रें बम की लीक पर गड़ी थीं, बम निशाने पर जाकर लगा, और एक और टैंक उनकी आंखों के सामने आग के हवाले हो गया. बाकी दो टैंको का क्रू अपने टैंक छोड़कर भाग गया… दिन ख़त्म होने तक हमीद दो टैंक उड़ा चुके थे..और चार को दुश्मन खुद ही डरकर छोड़कर भाग गया था…..’

चूंकि दुश्मन के टैंक उसी रास्ते से आ रहे थे इसलिए इंजीनियर्स को टैंक उड़ाने वाली सुरंगे बिछाने को कहा गया, कम वक़्त में भी इंजीनियर्स ने जितना मुमकिन था अच्छा इंतजाम कर दिया. यह साफ़ था कि बटालियन पर पाकिस्तानी हथियारबंद फौज़ द्वारा बिग्रेड स्तर का हमला किया जा रहा था, और उनका सामना उन्हें अपने आरसीएल गन से करना था… लेकिन जवानों को इसकी कोई ख़ास फिक्र नहीं थी.. अपनी शुरूआती सफलता की वजह से उनका मनोबल बहुत ऊंचा था.. ‘

अगली सुबह हमीद ने वापस लौटकर अपनी आरसीएल गन से दुश्मन के दो और टैंक उड़ा डाले. बटालियन को पाकिस्तान सबर जेट के हवाई हमले भी झेलने पड़े, लेकिन उससे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा था. दिन ढलने तक हमीद और उनकी टीम ने दुश्मन के दो और टैंक उड़ा डाले थे… वो एक बड़ी सफलता थी..’

१९६५ के उस युद्ध में कितने टैंक उड़ाए गए कितने बचे ओर जो बचे उनसे जुडी एक दिलचस्प कहानी ये भी है कि असल उत्तर के युद्ध के बाद,पाकिस्तानियों द्वारा पीछे छोड़े गए पैटन टैंकों को बाद में ट्रोफी के रूप में इकठ्ठा किया गया.. भिक्कीविंड नाम की जगह पर ऐसे ७० टैंक खड़े थे, वहां रहने वाले लोग इन टैंकों की वजह से उस जगह को पैटन नगर कहने लगे थे. युद्ध विराम के बाद भिक्की-विंड में टैंकों का एक कब्रिस्तान बन गया था… वहां के लोगों के लिए ये उनके वीर जवानों की जीत का, उनकी कुर्बानी का, उनकी जंग का एक अनोखा स्मारक था. कुछ समय तक इन टैंकों की प्रदर्शनी वहां लगी रही. फिर उन्हें देश भर में स्थित सेना की अलग-अलग छावनियों में भेज दिया गया, जहां वे बतौर वार ट्रोफी प्रदर्शनी के लिए आज भी रखे हुए हैं…’

हालांकि हमीद ने कितने टैंक उड़ाए इस बात में अस्पष्टता ही रही… कहीं तीन लिखे हैं, कहीं चार, तो कहीं सात… उनके पोते जमील अक्सर कहते हैं कि – ‘अगले दिन भी दादाजान जंग के मैदान में थे… उन्हें तीन और टैंक उड़ाने थे….’ ये कहानियां जमील ने उन जवानों की ज़ुबानी सुनी थी जो युद्ध से ज़िंदा लौट आये थे और जिनकी मृत्यु अभी कुछ साल पहले ही हुई थी… ‘लेकिन अब्दुल हमीद की इस नई उपलब्धि का जिक्र उनके रिकार्ड में कभी नहीं आ पाया… क्योंकि उनका प्रशस्ति पत्र पहले ही जा चुका था…’ जमील के मन में ये अफ़सोस अब भी है कि उनके दादा को उनका पूरा श्रेय नहीं मिल पाया…

अब्दुल हमीद के जंगी साथियों की ज़ुबानी सुनें और अनकहे इतिहास के पन्नों को खंगालें तो १० सितम्बर के उस भारी दिन की पूरी कहानी शब्दों में कह पाना बहुत कठिन लगता है… धुमापुर के एक आंगन में एक तरफ सिलाई मशीन की खड़खड़ लगातार चल रही थी, और दूसरी तरफ रेडियो की खर-खर के बीच जंग की ख़बरें चल रहीं थीं.. रसूलन को उम्मीद थी कि जिस तरह उनके शोहर १९६२ की जंग के बाद लौट आये थे इस बार भी लौट आयेंगे.. उनके बच्चे अपनी मां के आस-पास ही चिपके बैठे थे, वे बड़े हो गए थे लेकिन पिता की जंग की ख़बरें उन्हें मां के आंचल में समेट लाती थीं… उनकी मां भी कभी बच्चों को हिम्मत देती कभी खुद ही हिम्मत हारकर घर के दरवाज़े के चक्कर लगाती रहती, लेकिन शायद इस बार एक पिता को, एक शोहर को नहीं लौटना था, कोई दुआ, कोई फिक्र, कोई चक्कर काटना अब उन्हें वापस नहीं बुला पा रहा था…

वो युद्ध का तीसरा दिन था… जितनी मिन्नतें अब्दुल हमीद के घर से मांगी जा रहीं थीं.. उतनी ही दुआओं से ऊपर वाले को पूरा गांव जगा रहा था कि – ‘या ख़ुदा मेरे देश को सुरक्षित भी रखना और किसी को बेवा भी मत करना, किसी को अनाथ भी मत करना… किसी के बुढ़ापे का सहारा भी मत छीनना…’ लेकिन इन सभी दुआओं की पहुंच से बहुत दूर युद्ध क्षेत्र में वीर सिपाही सिर्फ एक ही तरफ नज़र टिकाये हुए थे… दुश्मन की तरफ..४ ग्रेडियर्स के ऊपर दुश्मन की तरफ से भारी बमबारी हो रही थी.. उसके बाद दुश्मन ने टैंक से एक बार फिर हमला बोल दिया.. वे तीन टैंकों की तिकोन में आगे बढ़ रहे थे.. हमीद झाड़ियों के पीछे छिप गए और जैसे ही पहला टैंक उनके नज़दीक आया उन्होंने उड़ा दिया… उसी वक़्त टैंक से चला एक बम का गोला उसी जगह आकर गिरा जहां वे थोड़ी देर पहले खड़े थे.. लेकिन खुशकिस्मती से ग्रेनेडियर्स ने अपनी जगह बदल ली थी और पास की ही झाड़ियों के पीछे से वे दुश्मन के अगले टैंकों पर निशाना साधे हुए थे. अब तक बमबारी शुरू हो चुकी थी.. जीपें दुश्मन के टैंकों में नज़र आ चुकीं थीं.. और उन्होंने उनपर गोलीबारी शुरू कर दी थी… हमीद बार-बार अपनी पोजीशन बदलकरम गन्ने के खेतों के पीछे खुद को छुपाकर उन्हें चकमा दे रहे थे.

एक टैंक उनकी तरफ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था लेकिन उनके पास जगह बदलने का वक़्त नहीं था क्योंकि दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था.. दोनों ने एक दूसरे को निशाने पर लिया और गोलियां बरसानी शुरू कर दीं..दोनों के निशाने लक्ष्य पर जाकर लगे… तेज़ धमाके के साथ आग और धुआं उठने लगा..हालांकि टैंक उड़ चुका था लेकिन उसका एक बम जीप पर आकर गिरा… बम के धमाके से जीप हवा में उछल गयी, जवान दर्द से चीखने लगे… एक तेज़ धमाका हुआ और सब कुछ शांत हो गया… बीच-बीच में सिर्फ आग के चिटकने की आवाज़ आ रही थी…अब्दुल हमीद शहीद हो चुके थे… मरने से पहले उन्होंने दुश्मन के सात टैंकों का खात्मा कर दिया था… और कुछ टैंकों के क्रू को डरकर मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया था….’

हथियार बंद संरचना के साथ भी इतने टैंकों को उड़ाने की कल्पना नहीं की जा सकती थी….. मिलिटरी इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब एक हथियारबंद डिवीज़न के साथ महज़ आरसीएल गन का इस्तेमाल करते हुए जंग लड़ी गयी…’
जंग के बाद उस बटालियन को बैटल ऑफ़ ओनर ऑफ़ असल उत्तर ओर थिएटर ओनर से नवाज़ा गया और उस उपलब्धि, साहस और बहादुरी के लिए अब्दुल हमीद को मरणोपरांत परम वीर चक्र से नवाज़ा गया….. और मिलिट्री से जुडी इस ऐतिहासिक कहानी में अब्दुल हमीद हमेशा के लिए अमर हो गए…


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