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पुलिस सेवाओं में विकलांग आरक्षण खत्म, सरकार के फैसले पर क्या सवाल उठ रहे हैं?

विकलांगता यानी पर्सन विद डिसेबिलिटी (PwD). अगर मोदी सरकार के शब्दों में कहें तो “दिव्यांग”. विकलांग लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलता है. लेकिन केंद्र सरकार ने हाल ही में भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस और अन्य पुलिस सेवाओं में विकलांगों के लिए 4 प्रतिशत के आरक्षण को हटाने का फ़ैसला किया है. PwD के अधिकारों की लड़ने वाले संगठन इसे विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम (आरपीडी), 2016 का उल्लंघन बता रहे हैं. आइए समझते हैं क्या है पूरा मामला.

कहां-कहां लागू होगा ये बदलाव?

18 अगस्त 2021 को सामाजिक न्याय मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके कहा कि आरपीडी अधिनियम की धारा 34 विशेष पुलिस सेवाओं पर लागू नहीं होगी. इस धारा के तहत सरकारी प्रतिष्ठानों में विकलांगों के लिए नौकरियों में 4 प्रतिशत आरक्षण मिलता रहा है. ये नियम आईपीएस और भारतीय रेलवे सुरक्षा बल (RPF) की सभी श्रेणियों के पदों पर भी लागू होता था. लेकिन अब इस धारा को लेकर किए गए बदलावों के बाद इन पुलिस बलों में PwD कैटिगरी में कोई आरक्षण नहीं मिलेगा. ये बदलाव दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दमन व दीव और दादरा व नगर हवेली में भी लागू होंगे.

इसके अलावा सामाजिक न्याय मंत्रालय ने 18 अगस्त को एक और अधिसूचना जारी की थी. जिसके तहत सुरक्षा बलों में लड़ाकू और गैर-लड़ाकू यानी कॉम्बैट और नॉन-कॉम्बैट भूमिकाओं में विकलांग आरक्षण के प्रावधानों को बदला गया. मंत्रालय ने सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), सशस्त्र सीमा बल (SSB) और असम राइफल्स में कॉम्बैट पदों के लिए विकलांग आरक्षण को भी रद्द कर दिया.

पूर्व पुलिस अधिकारी क्या कह रहे?

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने सरकार के इस कदम को गलत ठहराया है. दी लल्लनटॉप से ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने विकलांगों के लिए दिव्यांग शब्द देकर विशेष दर्जा तो दिया है, लेकिन आरक्षण खत्म करने का सरकार का ये फैसला बहुत ग़लत है. उन्होंने कहा,

“कई बार विकलांगता ड्यूटी के दौरान भी आ जाती है. ऐसे में पुलिसकर्मियों को काम से नहीं हटाया जाता बल्कि उन्होंने ऑफ़िस में कामों में लगाया जाता है. आरक्षण खत्म करने का सरकार का ये फैसला सही नहीं है.”

यूपी पुलिस के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं कि जहां विकलांग लोग आज दुनिया भर में विशेष मुक़ाम हासिल कर चुके हैं, उनके लिए अलग से ओलिम्पिक का भी आयोजन होता है. ऐसे में सरकार का कदम “तर्क से परे है”.

हालांकि सामाजिक न्याय मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि सरकार पुलिस सेवा को कॉम्बैट रोल वाला मानती है. इसमें विकलांग आरक्षण से फ़ोर्स की क्षमता प्रभावित होती है.

यूपी पुलिस के पूर्व DGP विक्रम सिंह भी कॉम्बैट और नॉन-कॉम्बैट के फ़र्क़ पर कहते हैं कि सभी पुलिस सेवाओं में क़रीब 60 प्रतिशत नॉन-कॉम्बैट रोल हैं. वह बताते हैं,

“हमारी सभी पुलिस सेवाओं में जिसमें पैरा-मिलिट्री भी शामिल हैं, करीब 60 प्रतिशत ऑफ़िस के काम होते हैं. ऐसे में 4 प्रतिशत विकलांग आरक्षण को हटाए जाने का मैं विरोध करता हूं.”

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विकलांग पैरा-ऐथलीट सुवर्णा राज

‘हाशिए पर धकेल देगा ये बदलाव’

विकलांग अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन नैशनल प्लैट्फ़ोर्म फ़ॉर द राइट्स ऑफ़ डिसेबल्ड ने इसे लेकर भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाया. संगठन के महासचिव वी मुरलीधरन ने द लल्लनटॉप से कहा कि अगर सरकार BSF, CISF जैसे बलों में नॉन-कॉम्बैट पदों के लिए विकलांग आरक्षण दे सकती है तो आम पुलिस सेवा में विकलांग क्यों वंचित कर दिए गए हैं? उन्होंने कहा कि इस फैसले के पीछे सरकार के पास कोई ठोस तर्क नहीं है. ये विकलांगों के अधिकार अधिनियम की धारा 34 का उल्लंघन है.

मुरलीधरन आगे कहते हैं कि कॉम्बैट और नॉन-कॉम्बैट रोल का जो अंतर है, वो कुछ समय पहले ही आया है. कई लोग ऐसे थे जो सेवा के दौरान विकलांग हो गए. उसके बाद उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. लोगों ने जब कोर्ट का रुख़ किया तो अदालत ने उनके अधिकारों को माना और उन्हें दोबारा नौकरियों में लगाया.

वी. मुरलीधरन कहते हैं कि आरपीडी अधिनियम की धारा 34 का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि लड़ाकू भूमिकाएं विकलांग लोगों को ना सौंपी जाएं. वह कहते हैं कि अलग-अलग पदों के अलग-अलग ज़रूरतें होती हैं. पहले भी कभी कॉम्बैट रोल विकलांग लोगों को नहीं दिया जाता था, लेकिन सरकार का ये बदलाव विकलांगों को हाशिए पर धकेल देगा.

पिछली भर्तियों पर फैसला लागू नहीं

बता दें कि दिल्ली पुलिस ने 2019 में हेड कॉन्स्टेबल (मिनिस्टीरियल) की भर्ती के लिए आवेदन निकाला था, जिसमें विकलांग आरक्षण का प्रावधान था. इस साल मार्च में गोवा पुलिस ने “लोअर डिवीजन क्लर्क” के 34 पदों सहित विभिन्न भर्तियों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे. इसमें भी PwD के लिए आरक्षण था. इस अधिसूचना का पहले हुईं भर्तियों पर असर नहीं होगा लेकिन अगर कोई व्यक्ति काम के दौरान हादसे में या हमले में विकलांग हो जाता है तो क्या उसकी नौकरी पर ख़तरा आ सकता है, सरकार ने इस बारे में अपना रुख़ अब तक साफ़ नहीं किया है.


वीडियो- वैक्सीन लगवाने में विकलांग लोगों को हो रहीं दिक्क्तों को मोदी सरकार को सुनना चाहिए

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