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और आख़िरकार जीत हुई प्रेम की, क्योंकि ख़तरा जान से बढ़कर नहीं था

सत्यत्रिलोक नाथ पांडेय मूलतः उत्तर प्रदेश के वाराणसी के रहने वाले हैं. भारत सरकार के ख़ुफ़िया विभाग में काम कर चुके हैं. 62 बरस के त्रिलोक हिंदी, अंग्रेज़ी में लिखते हैं. ‘प्रेमलहरी’ उनकी पहली औपन्यासिक कृति है. इनसे triloknathpandeytnp@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.


‘प्रेमलहरी’ इतिहास के बड़े चौखटे में कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से बुनी हुई प्रेमकथा है. यह इतिहास नहीं है, न ही इसका वर्णन किसी इतिहास पुस्तक में मिलता है. लेकिन जनश्रुति में इस कथा के अलग-अलग हिस्से या अलग-अलग संस्करण अकसर सुने जाते हैं. इस प्रेम-आख्यान के नायक-नायिका हैं शाहजहां के राजकवि और दारा शिकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ और मुगल शाहज़ादी गौहरआरा उर्फ लवंगी. मध्यकालीन इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम-आख्यान तो कई मिलते हैं, लेकिन किसी शाहज़ादी की किसी ब्राह्मण आचार्य और कवि से यह अकेली प्रेम कहानी है जो मुगल दरबार की दुरभिसन्धियों के बीच आकार लेती है. मुगल शाहज़ादियों को न शादी की इजाज़त थी न प्रेम करने की. ऐसे में चोरी-छुपे प्रेम-सुख तलाश करना उनकी मजबूरी रही होगी.


इज़हार-इ-इश्‍क़

अगले दिन जब जगन्नाथ जहांआरा बेग़म के महल में पहुंचे गीता पढ़ाने के लिए तो उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि झीने पर्दे के पीछे बैठने वाली अमूमन दो शाहज़ादियों की जगह एक ही बैठी है. उन्होंने अनुमान लगाया कि पर्दे के पीछे छोटी बहन लवंगी बैठी है, लेकिन इस बारे में तहक़ीक़ात करना मुनासिब न समझा. उन्हें यक़ीन तब हुआ जब लवंगी अपनी सुरीली आवाज़ में कुछ ज़्यादा ही मिठास घोलते हुए उनसे इठलाकर बोली, ”आज मुझे वह शायरी सुनाइए जिसके लिए मैंने कल इल्तिज़ा की थी.’’

”जीज्ज्जी…’’ जगन्नाथ हकलाने लगे.

”ये क्या जी जी लगा रखा है आपने!’’ लवंगी ने तनिक रोष प्रकट करते हुए कहा, ”आप मेरा नाम नहीं जानते?’’

”जी, बेग़म साहिबा…’’ जगन्नाथ मारे घबराहट के फिर हकलाने लगे.

लवंगी हंसने लगी. ”मुझे लवंगी कहकर पुकारिए. इसी नाम से हमें अपने सब पुकारते हैं. और, मैं आपको पंडितराज जगरनाथ न पुकारूंगी. बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा और बोझिल-सा नाम है यह. मैं तो आपको जगन कहके बुलाऊंगी.’’ लवंगी ने इठलाकर कहा.

”जी? यह तो मेरा बचपन का नाम है. बनारस में मेरे अपने इसी नाम से मुझे पुकारते हैं. आपको कैसे मालूम यह नाम?’’

”मैं भी आपकी अपनी हूं,’’ कहते हुए लवंगी पर्दे से बाहर आ गई.

सफेद संगमरमरी रंगत, रसीले लाल होंठ, कारे मतवारे नैन देखकर जगन्नाथ बेसुध-से हो गए. उनके मुंह से अनायास निकल पड़ा, ”हे भगवान, आप तो ग़ज़ब की सुन्दर हैं. जितना सुना था उससे कहीं बढ़कर.’’ अगले ही क्षण उन्होंने अपने को संभाल लिया यह सोचकर कि यह आकर्षण तो तलवार की धार पर अपनी गर्दन रखने जैसा है.

बातचीत का सिलसिला दूसरी ओर मोड़ देने के लिए जगन्नाथ ने शायरी की बात शुरू की, तो लवंगी ने मीराबाई का एक प्रेमगीत सुनाने की फ़रमाइश दुहरा दी. बिना विलम्ब किए जगन्नाथ ने एक भावपूर्ण ललित गीत गाकर सुनाया :

मैं गिरधर के घर जाऊं.

गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं॥

रैण पड़ै तबही उठ जाऊं भोर भये उठि आऊं.

रैन दिना वाके संग खेलूं ज्यँू तह्यूं ताहि रिझाऊं॥

जो पहिरावै सोई पहिरूं जो दे सोई खाऊं.

मेरी उनकी प्रीति पुरानी उन बिन पल न रहाऊं.

जहाँ बैठावें तितही बैठूं बेचै तो बिक जाऊं.

मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार बार बलि जाऊं॥

लवंगी आंखें मूंदें भावविभोर होकर गीत सुन रही थी. मस्ती के आलम में वह झूम-झूमकर सिर हिला रही थी. बीच-बीच में तरन्नुम की लहरों में बहते हुए वह अपनी अंगुलियों से ताल दे रही थी. लगता था गीत के सुरीले स्वर उसके मन को मथ रहे थे और गीत के भाव उसके दिल में सीधे उतर रहे थे.

मदहोशी में डूबी लवंगी ने अचानक आगे बढ़कर जगन्नाथ का हाथ पकड़ लिया, ”मैं आपकी राधा हूं. जैसे किसन के लिए राधा वैसे जगन के लिए लवंगी. मैं राधा जैसी गोरी तू किसन जैसा सांवला-सलोना. तू मेरा है सिर्फ मेरा जगन और मैं तेरी हूं सिर्फ तेरी, तेरी दीवानी…’’ लवंगी मदहोशी में बोले जा रही थी- जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से बोल रही हो; जैसे वह मस्ती के आलम में शायरी के बोल पढ़ रही हो.

हिचकिचाकर जगन्नाथ ने अपना हाथ पीछे खींच लिया, तो लवंगी लपककर उनके गले लगने लगी. ”बस, बेग़म साहिबा, ज़्यादा दीवानगी ठीक नहीं,’’ कहकर जगन्नाथ वहां से जाने लगे तो लवंगी की आवाज़ कुछ ऊंची हो गई, ”तुम यहां से निकलकर जा रहे हो जगन, लेकिन मेरे दिल से न निकल पाओगे.’’

सचमुच, जगन्नाथ वहां से निकल तो आए, लेकिन अपना दिल वहीं छोड़ आए.

वहां ख़ास तौर पर छुपकर नज़र रखने के लिए तैनात ख़बरी लौंड़ी ने इश्क़ के इस मंजर का जहांआरा के सामने बयान किया. उस रात जब जहांआरा ने लवंगी से इस बाबत कैफियत मांगी तो जवाब में लवंगी कुछ देर चुप रही. फिर हौले से जहांआरा के गले लिपटकर हिचकियां लेने लगी, ”आप हमारी आपा ही नहीं अम्मा भी हो. हमारे दिल का हाल आप न समझोगी तो कौन समझेगा?’’

जवाब में जहांआरा भी हिचकियां लेने लगी और मारे स्नेह के लवंगी का सिर सहलाने लगी. दोनों बहनें देर तक हिचकियां ले-लेकर रोती रहीं.

जहांआरा को लवंगी में अपना अक्स नज़र आने लगा. उसने भी कभी प्यार किया था बल्ख के शाहज़ादे नजाबत ख़ां से. इश्क़ का चक्कर चुपके-चुपके कुछ दिनों चला; मौज़-मस्ती खूब हुई; तन-मन खूब मिले, लेकिन बाद में सब कुछ बिखर गया. उन दिनों अब्बा अम्मी के मरने के बाद बदहवास रहते थे. जब वे उस ग़मगीन माहौल से उबरे तो उन्हें अपनों के सहारे की ज़्यादा ज़रूरत पड़ने लगी. ऊपर से मुए मामू शाइस्ता ख़ां ने अब्बा को समझा दिया कि नजाबत ख़ां एक छोटी-सी रियासत का शाहज़ादा है, शाहज़ादी से शादी करने पर वह भी अपने शाहज़ादों के बराबर वजूद और रुतबे का हक़दार हो जाएगा. फिर तो अब्बा ने नजाबत को कन्धार का सूबेदार बनाकर दूर भेज दिया और मुहब्बत का सिलसिला टूट गया.

अब एक बार फिर जहांआरा की अपनी दमित प्रेम की इच्छा झलकने लगी. लवंगी के प्यार की प्यास में उसने अपनी प्यास महसूस की. उसे लगा कि लवंगी के प्यार की क़ामयाबी में उसकी अपनी प्यार की ख्वाहिश भी पूरी हो जाएगी. मन-ही-मन सोचा कि उसे प्यार का हक़ न मिला तो कम-से-कम लवंगी इससे महरूम न रहे. लेकिन, मुश्किल यह थी कि लवंगी का महबूब तो ऐसे मज़हब और माहौल से है जो खानदाने-तैमूरिया को क़तई क़बूल न होगा. उसने लवंगी को इस मुद्दे पर समझाने की बहुत कोशिश की, पर लवंगी ने एक न सुनी, सि$र्फ आँसू टपकाती रही और गुहार लगाती रही कि अगर बड़ी आपा की इनायत रही तो उसे अपना प्यार हासिल करने से कोई न रोक सकेगा.

लवंगी के प्रति ममता, उसकी आह-भरी गुहार और ख़ानदानी इज़्ज़त के नाम पर लड़कियों के ऊपर लादी गई बन्दिशों के खि़लाफ़ दबे हुए ग़ुस्से ने आखि़र जहांआरा को ऐसे मुक़ाम पर ला खड़ा किया जहाँ उसे लवंगी की हां में हां मिलाने के अलावा कोई रास्ता ही न था.

वह रात बड़ी कशमकश में कटी. पंडितराज जगन्नाथ कोई अनाड़ी न थे. उन्होंने दुनिया देखी थी. वह मुग़लों की ताक़त से वाकि़फ़ थे. वह जानते थे कि किसी मुग़ल शाहज़ादी से मुहब्बत की क़ीमत उन्हें अपना सिर कटाकर चुकानी होगी. उनके दिल और दिमाग़ के बीच अजीब जंग छिड़ी थी. दिमाग़ कहता निकल ले पतली गली से, अपने काम से काम रख, तुम्हारी औक़ात इतनी महँगी मुहब्बत की नहीं है. लेकिन, जब लवंगी का मासूम चेहरा और उसकी प्यार में दीवानगी दिमाग़ में तारी होती तो दिल को मौक़ा मिल जाता अपनी बात आगे बढ़ाने का—जीते तो सभी हैं; प्यार में मरने के मौक़े तो बिरले को ही नसीब होते हैं. तू बहुत ख़ुशनसीब है तुम्हें जन्नत की हूर का प्यार मिला है. पीछे न हट.

आखि़र जीत दिल की हुई; जीत लवंगी के प्यार की हुई. जगन्नाथ ने अपना दिल लवंगी के यहां गिरवी रखना मंज़ूर किया और उसका दिल ख़ुद ले आगे बढ़ने का निश्चय किया. लेकिन इस फ़ैसले पर पहुंचते-पहुंचते उनकी उस रात की नींद बर्बाद हो गई.

आगे-आगे देखिए होता है क्या, मजनूं मियां! अब तो दिन का चैन और रात की नींद गई.


पुस्तक अंश – प्रेम लहरी

लेखक – त्रिलोक नाथ पांडेय

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

विधा – उपन्यास

कीमत – 158 रुपये


वीडियो- किताबवाला: बेखुदी में खोया शहर, एक पत्रकार के नोट्स किताब पर बात

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