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मेवातियों पर मुग़ल साम्राज्य के बर्बर अत्याचारों का दस्तावेज़ - 'ख़ानज़ादा'

‘हलाला’, ‘बाबल तेरा देस में’, ‘रेत’, ‘नरक मसीहा’, ‘सुर बंजारन’, ‘वंचना’, ‘शकुंतिका’, ‘काला पहाड़’ के लिए मशहूर लेखक भगवानदास मोरवाल ने हिंदी साहित्य में अपनी एक अलग जगह बनाई है. हरियाणा के मेवात में जन्मे भगवानदास का नया उपन्यास आया है, जिसका नाम है ‘ख़ानज़ादा’. ‘ख़ानज़ादा’ में भारत में तुग़लक़, सादात, लोदी और मुग़ल साम्राज्य की स्थापना और इसके बाद इनके द्वारा मेवातियों पर किए गए बर्बर अत्याचारों; और मेवात में मचाई गई तबाही का दस्तावेज़ है. इतिहास, कल्पना और किस्सागोई की दिलचस्प संगत में पगा यह उपन्यास पाठक को इतिहास की उन ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर लाकर छोड़ देता है, जिससे वह अब तक पूरी तरह अनजान था.

पढ़िए भगवानदास मोरवाल की पुस्तक ‘ख़ानज़ादा’ का ये अंश.

तैमूर लंग और नायाब तोते

इराक पर आधिपत्य के बाद, दिसम्बर महीने में सिन्ध को पार कर अमीर तैमूर लंग हिन्दुस्तान आ गया.

हिन्दुस्तान आने पर उसने अपने गुप्तचरों को सल्तनत के हाल जानने के लिए भेजा. उसके गुप्तचरों ने अमीर तैमूर को जो ख़बर दी, उसे सुन वह ख़ुशी से झूम उठा.

“ऐ मेरे बहादुर सिपाहियो, क्या यह सच है?”

“जी ख़ुदावंद अमीर. मरहूम सुल्तान तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह का पोता सुल्तान महमूद शाह तो नाम का बादशाह है. असली हुक्म तो यहाँ इक़बाल ख़ाँ और सारंग ख़ाँ नाम के दो वज़ीरों का ही चलता है.”

अमीर तैमूर लंग कुछ पल ठहरकर जैसे कुछ याद करने लगा. फिर बोला,

“यह इक़बाल ख़ाँ कहीं मेवात के हुक्मराँ बहादुर नाहर का पोता मल्लू ख़ाँ तो नहीं है, जिसे इसी सुल्तान महमूद शाह ने इक़बाल के ख़िताब से नवाज़ा था?”

“जी हुज़ूरे आली, आपका अन्दाज़ा एकदम सही है. असल बात तो यह है कि हुकूमत का असली मज़ा ये दोनों ही लूट रहे हैं”, एक गुप्तचर बोला.

उसी दिन अमीर तैमूर ने अपने कुछ ख़ास वज़ीरों के साथ बैठक की और उसी में यह फ़ैसला लिया गया.

“आपकी तरह मेरा भी यही ख़याल है कि हमें मेवात में बहादुर नाहर के पास अपना एलची भेजना चाहिए. एलची के साथ किए जाने वाले सलूक से पता चल जाएगा कि बहादुर नाहर की हमारे बारे में क्या सोच है”, अपने वज़ीरों की राय से सहमत होते हुए अमीर तैमूर बोला.

इस फ़ैसले के तुरन्त बाद अमीर तैमूर ने अपने दूत को मेवात के लिए रवाना कर दिया. दो दिन बाद दूत को मेवात से सही-सलामत लौटा देख अमीर तैमूर को बड़ी हैरानी हुई.

“कहो एलची, कैसा रहा आपका मेवात का सफ़र?” अमीर तैमूर ने अपने दूत से पूछा.

“हुज़ूरे आली, जैसा हमने सोचा था वैसा कुछ नहीं हुआ. बल्कि बहादुर नाहर ने हमारी बड़ी ख़िदमत की.”

“हमारे बारे में और क्या-क्या कहा उसने?”

“हुज़ूर, आप ही पढ़ लीजिए.”

इतना कह दूत ने रेशमी फ़ीते से बँधे गोल ख़रीते को आगे बढ़ा दिया. अमीर तैमूर ने ख़रीते को खोला और ख़त को पढ़ने लगा. जैसे-जैसे वह ख़त पढ़ता गया, उसके चेहरे की मुस्कान और गहरी होती चली गई. ख़त पढ़ने के बाद अमीर तैमूर ने नज़र उठाकर अपने दूत की तरफ़ देखा.

“हुज़ूरे आली, बहादुर नाहर ने आपके लिए एक नायाब तोहफ़ा भी भेजा है.”

“नायाब तोहफ़ा? क्या है वह नायाब तोहफ़ा? एलची जल्दी दिखाइए!” अमीर तैमूर की जिज्ञासा जैसे बग़ावत पर उतर आई.

“ये लीजिए हुज़ूर.”

इतना कह दूत ने बहादुर नाहर की तरफ़ से भेजा गया तोहफ़ा बढ़ा दिया. अमीर तैमूर ने जैसे ही इस नायाब तोहफ़े को देखा, वह अपनी जगह से लगभग उछलते हुए चीख़ा,

“यह क्या बेहूदगी है? यह कैसा तोहफ़ा है? हमें तो लगा था कि बहादुर नाहर हमारे लिए हीरे-जवाहरात और सोने की अशर्फ़ियों से भरे थाल भेजेगा और आप इन्हें उठा लाए.”

“हुज़ूरे आली, मुझे बताया गया है कि सफ़ेद तोतों का यह जोड़ा कोई आम जोड़ा नहीं है.”

“आम जोड़ा नहीं है?”

“जी हुज़ूरे आली. इस जोड़े को सुना है देहली के बादशाह तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह ने कभी बहादुर नाहर को तोहफ़े में दिया था.”

“बादशाह तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह ने बहादुर नाहर को तोहफ़े में दिया था?” इतना कह अमीर तैमूर कुछ शान्त हुआ, और फिर बोला, “अगर ऐसा है तो सफ़ेद रंग का यह तोते का जोड़ा… क्या नाम बताया आपने?”

“हुज़ूर, कोका-तुबा.”

“हाँ वही… मुझे भी कोई मामूली जोड़ा नहीं लगता है. हरे तोते तो मैंने बहुत देखे हैं लेकिन सफ़ेद तोते मैं पहली बार देख रहा हूँ. सचमुच यह तो क़ुदरत का करिश्मा है. वैसे इनकी और क्या ख़ासियत है?”

“कहते हैं कि बादशाही महफ़िलों में ये बहुत ही मीठे बोल बोलते हैं.”

“मीठे बोल, वल्लाह! अगर ऐसा है तो हमारा हुक्म है कि इस पिंजरे को रोज़ाना सुबह हमारे सामने पेश किया जाए, ताकि इस सफ़ेद जोड़े के सुरीले और मीठे बोलों का हम भी लुत्फ़ उठा सकें.”

इसके बाद अमीर तैमूर ने अपने दो वज़ीर सैयद शम्सुद्दीन तरमदी और अलाउद्दीन नायद शेख़ खोकरी को, इस ख़त के जवाब के साथ बहादुर नाहर के पास भेजने का हुक्म दिया. ये दोनों वज़ीर जुम्मे के रोज़ मेवात से बहादुर नाहर, उसके तीन बेटों और एक पोते कुलताज ख़ाँ को कोटला से लेकर अमीर तैमूर के पास फ़िरोज़ाबाद पहुँचे. बहादुर नाहर के साथ उनके बेटों और पोते कुलताज ख़ाँ के अलावा वे सरदार भी थे, जिन्होंने अमीर तैमूर लंग के डर से मेवात में पनाह ली हुई थी. फ़िरोज़ाबाद पहुँचने पर इन्हें सैयद शम्सुद्दीन तरमदी और अलाउद्दीन नायद शेख़ खोकरी ने अपने बादशाह तैमूर लंग से बड़े सम्मान के साथ मिलवाया.

अमीर तैमूर लंग ने बहादुर नाहर का बहुत सम्मान किया. सम्मान करते हुए अमीर तैमूर लंग ने बहादुर नाहर को गले लगाते हुए कहा,

“बहादुर नाहर, हम आपके भेजे गए तोहफ़े से इतने ख़ुश हैं कि हम आज से आपको बहादुर नाहर की जगह बहादुर नाहर ख़ाँ के नाम से तो पुकारेंगे ही बल्कि ख़ानज़ादा के ख़िताब से भी नवाज़ते हैं. आज के बाद आपका ख़ानदान ख़ानज़ादा कहलाया जाएगा.”

अमीर तैमूर लंग द्वारा दिए गए ख़ानज़ादा ख़िताब को बहादुर नाहर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

ख़ानज़ादा बहादुर नाहर ख़ाँ के मेवात लौटने के कुछ दिन बाद अमीर तैमूर लंग को ख़बर मिली, कि देहली का सुल्तान महमूद शाह अपने दोनों वज़ीरों सारंग ख़ाँ और ख़ानज़ादा बहादुर नाहर ख़ाँ के पोते यानी बहादुर ख़ाँ के बेटे मल्लू ख़ाँ अर्थात् इक़बाल ख़ाँ के साथ मिलकर युद्ध की तैयारी कर रहा है.

अमीर तैमूर ने उसी वक़्त अपने वज़ीरों को हुक्म दिया,

“ऐ मेरे वज़ीरो, अपने सिपाहियों से कह दो कि वे किसी ऐसे शख़्स को पकड़कर लाएँ, जो मुझे सुल्तान महमूद शाह और इसके इन दोनों वज़ीरों के बारे में पूरी ख़बर लाकर दे सके कि हमारे ख़िलाफ़ वे क्या और कैसी तैयारियाँ कर रहे हैं.”

अगली रात अमीर तैमूर के सिपाही और गुप्तचर देहली शहर के बाहर, चारों तरफ़ बनी दीवार के आसपास किसी ऐसे आदमी की तलाश में घूम ही रहे थे, कि तभी उन्हें एक आदमी दिखाई दिया. अमीर तैमूर के सिपाहियों ने उसे तुरन्त पकड़ लिया.

“बता तेरा नाम क्या है?” एक सिपाही ने उससे डाँटते हुए पूछा.

“हुज़ूर, मेरा नाम मुहम्मद यूसुफ़ नामी है.” पकड़े गए आदमी ने घबराते हुए अपना नाम बता दिया.

“इस वक़्त कहाँ जा रहे हो?”

“अपने घर.”

“कहाँ से आए हो?”

“हुज़ूर, नौकरी बजाकर आ रहा हूँ.”

“नौकरी, किसकी और क्या नौकरी करते हो?”

“शाही असलाहख़ाने में मुलाज़िम हूँ हुज़ूर.”

“फिर तो तुम यह भी जानते होगे कि सुल्तान महमूद शाह और उसकी फ़ौज की क्या तैयारियाँ चल रही हैं?”

“मुझे क्या मालूम हुज़ूर. मैं तो एक मामूली-सा मुलाज़िम हूँ.”

“ठीक है, यह ऐसे नहीं बताएगा. इसे अमीर के पास ले चलो!”

एक सिपाही के आदेश पर सुल्तान महमूद शाह के शाही असलाहख़ाने में तैनात मुहम्मद यूसुफ़ नामी को अमीर तैमूर के पास ले आया गया.

“हुज़ूरे आली, शाही असलाहख़ाने में तैनात यह मुलाज़िम हमारी पकड़ में आया है”, एक सिपाही ने अमीर तैमूर के सामने मुहम्मद यूसुफ़ नामी को पेश करते हुए कहा.

“कुछ सुराग़ दिया इसने?” अमीर तैमूर ने पूछा.

“नहीं हुज़ूर. कह रहा है कि मुझे कुछ पता नहीं है.”

“नहीं बताता है तो बोरी में भरकर इसे यमुना में फेंक दो!”

अमीर तैमूर ने जैसे ही मुहम्मद यूसुफ़ नामी को बोरी में भरकर यमुना में फेंकने का हुक्म दिया, मौत के डर से वह टूट गया,

“हुज़ूर बताता हूँ!” मुहम्मद यूसुफ़ नामी घिघियाते हुए बोला.

“देखो, सच-सच बताना कि कल होने वाली पानीपत की जंग में उनकी कैसी तैयारी है. अगर रंचमात्र भी झूठ बोला न, तो चमड़ी उधड़वाकर…”

“एकदम सच-सच बताऊँगा हुज़ूर. हुज़ूर, कल सुल्तान महमूद शाह चार हज़ार घुड़सवारों, पाँच हज़ार पैदल सिपाहियों और सत्ताईस हाथी सूरमाओं को साथ लेकर बाग़ों के रास्ते से बाहर निकलेगा.”

“और क्या जानते हो?” अमीर तैमूर ने मुहम्मद यूसुफ़ नामी से पूछा.

“हुज़ूरे आली, जितना मुझे मालूम था, मैंने सब ईमानदारी से बता दिया.”

“ठीक है, अगर इसने सब बता दिया है तो इसका क़त्ल करके यमुना में फेंक दो. अब हमें ऐसे नमकहराम की कोई ज़रूरत नहीं है, जो मौत के डर से अपने बादशाह के साथ गद्दारी कर सकता हो.” अमीर तैमूर ने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया.


 

पुस्तक : ‘ख़ानज़ादा’
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
लेखक : भगवानदास मोरवाल
भाषा : हिंदी
बाईंडिंग : पेपरबैक
मूल्य : 399/-
पृष्ठ : 388


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