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क्या है अयोध्या भूमि विवाद की ज़रूरी बातें जिस पर सुप्रीम कोर्ट फैसला देने जा रहा है?

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अयोध्या की विवादित भूमि पर सुप्रीम कोर्ट 9 नवंबर को फैसला सुनाने जा रहा है. 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की रोज़ाना सुनवाई शुरू की थी. 16 अक्टूबर 2019 को सुनवाई पूरी हो गई. लेकिन ये भूमि विवाद है क्या जो इस वक्त चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है. आइए 10 बिंदुओं में इसकी पूरी कहानी जानते हैंः

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अयोध्या भूमि विवाद का पूरा सच, “दी लल्लनटॉप” पर.

#1. अयोध्या में दरअसल 2.77 एकड़ ज़मीन को लेकर विवाद है. ये विवाद वैसे पुराना है, लेकिन इसमें कोर्ट का दखल 1885 से शुरू हुआ. निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने फैजाबाद सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था. राम चबूतरा क्षेत्र में मंदिर बनाने की मांग की. कोर्ट ने फैसला सुनाया. अदालत का मत था कि मंदिर बनाने की अनुमति देने से दो समुदायों के बीच नफ़रत की नींव पड़ सकती है, इसलिए स्थानीय अदालत ने मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी.

2. फिर आया साल 1949. इस साल 22-23 दिसंबर को मस्जिद में राम की मूर्ति रख दी गयी, जिसे बाद में रामलला कहा जाने लगा.

3. अयोध्या थाने के एसएचओ रामदेव दुबे की ओर से दर्ज एफआईआर के मुताबिक 22 दिसंबर की रात 50-60 लोगों ने राम चबूतरे पर बने मंदिर का ताला तोड़ दिया और वहां से मूर्ति उठा ली. इसके बाद वो मस्जिद की दीवार फांदकर अंदर दाखिल हो गए और वहां भगवान राम की मूर्ति रख दी. उन्होंने दीवार के अंदर और बाहर दोनों ही तरफ गेरुए और पीले रंग से सीताराम-सीताराम भी लिख दिया. रामदेव दुबे की एफआईआर के मुताबिक, मस्जिद में तैनात कॉन्सटेबल माता प्रसाद ने भीड़ को ऐसा करने से रोकने की कोशिश भी की, लेकिन वो नाकाम रहे. कॉन्सटेबल ने और भी फोर्स बुलाने की कोशिश की. लेकिन जब तक फोर्स आती, भीड़ मूर्ति को मस्जिद में रखकर जा चुकी थी. रामदेव दुबे ने इस केस में हनुमानगढ़ी के महंत अभिराम दास को मुख्य आरोपी बनाया गया था.

अब सब पूरा हो चुका है. सुनवाई खत्मे हो चुकी है. और सबको फैसले का इंतजार है.
अब सब पूरा हो चुका है. सुनवाई खत्म हो चुकी है. और सबको फैसले का इंतजार है.

4. 1950 से इस ज़मीन के लिए अदालती लड़ाई का नया दौर शुरू हुआ. विवादित ज़मीन के सारे दावेदार 1950 के बाद के हैं. साल 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अयोध्या मसले पर याचिका दायर की. याचिका में उन्होंने विवादित स्थल पर हिंदू रीति-रिवाज से पूजा-पाठ की इजाजत देने की मांग की.

5. इसके बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित भूमि पर नियंत्रण की मांग शुरू कर दी. हालांकि विवादित स्थान पर निर्मोही अखाड़े से जुड़े संतों ने सबसे पहले 1885 में ही फैजाबाद सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर पूजा करने की अनुमति मांगी थी. निर्मोही अखाड़ा की तर्ज पर मुस्लिम सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी विवादित भूमि पर कोर्ट में अपना दावा ठोक दिया. इस तरह रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर मालिकाना हक का विवाद शुरू हो गया.

अर्थात – लड़ाई इस बात की कि ज़मीन का मालिक कौन है? सुन्नी वक्फ बोर्ड है? रामलला विराजमान है? या निर्मोही अखाड़ा है? और सुप्रीम कोर्ट ठीक इसी विवाद पर फैसला सुनाने वाला है. इस फैसले से तय होगा कि जिस ज़मीन पर मस्जिद थी, और जहां राम का जन्मस्थान बताया जाता है, उस ज़मीन का मालिक कौन होगा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2010 में फैसला सुनाया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2010 में फैसला सुनाया था.

6. इसी विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को फैसला दिया था. कोर्ट ने 2.77 एकड़ ज़मीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान को बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था. फैसले में कहा गया था कि जिस जगह रामलला की मूर्ति है उसे रामलला विराजमान को दिया जाए. सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए. बचे हुए हिस्से को सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए. लेकिन फैसला किसी को मंजूर नहीं हुआ. और तीनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट चले गए. सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी. इसके साथ ही यह भी कहा कि मामला लंबित रहने तक संबंधित पक्षकार विवादित भूमि पर यथास्थिति बनाए रखेंगे.

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अयोध्या भूमि विवाद: साइट मैप. लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के हवाले से

7. एक और ज़रूरी बात है जिसका सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फिलहाल कोई सीधा संबंध नहीं है. 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. इस पूरे मामले में ढिलाई बरतने के आरोपों से घिरी नरसिम्हा राव सरकार ने जनवरी 1993 में कानून बनाया – ‘अयोध्या भूमि अधिग्रहण कानून’. इस कानून के जरिए नरसिम्हा राव सरकार ने अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित ज़मीन के साथ-साथ उसके आस-पास की करीब 67 एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया. नरसिम्हा राव सरकार ने कानून के रास्ते अयोध्या में राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी और एक म्यूजियम बनाने की बात कही. नरसिम्हा राव सरकार ने इस कानून के जरिए पहले के सारे सिविल मुकदमे खत्म कर दिए. मगर उस वक्त हिंदू और मुस्लिम पक्ष के साथ-साथ बीजेपी ने भी इस कानून का विरोध किया.

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या रामजन्म भूमि विवाद की सुनवाई 16 अक्टूबर को पूरी कर ली थी.
सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई 16 अक्टूबर को पूरी कर ली थी.

8. सुप्रीम कोर्ट में नरसिम्हा राव सरकार के इस कानून का रिव्यू हुआ. साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी जजमेंट में ज़मीन पर दावेदारी वाले सिविल केस को बहाल कर दिया. मतलब केस फिर से शुरू हो गया.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन समेत अधिग्रहित 67 एकड़ ज़मीन पर स्टे लगा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक विवादित ज़मीन के मालिकाना हक यानी टाइटल सूट का निबटारा किसी कोर्ट में नहीं हो जाता, तब तक इस कानून को लागू नहीं किया जा सकता है. केंद्र सरकार इस ज़मीन की सिर्फ कस्टोडियन रहेगी यानी सिर्फ देख-रेख करेगी. और जिसके हक में अदालत का फैसला आएगा, ज़मीन उसी पक्ष को सौंप दी जाएगी.

9. अब बात पहुंची 29 जनवरी 2019 तक. मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट गई. याचिका दायर की. कहा कि अयोध्या में जो भूमि अधिग्रहित की गई है, वो रामजन्मभूमि न्यास को दी जाए. अयोध्या में रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद ज़मीन विवाद के आस-पास की करीब 67 एकड़ ज़मीन केंद्र सरकार के पास है. इसमें से 2.77 एकड़ ज़मीन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है. इस ज़मीन में भी सिर्फ 0.313 एकड़ के टुकड़े पर ही विवाद है. सरकार चाहती है कि इस कंडीशन में इस ज़मीन को छोड़कर बाकी ज़मीन भारत सरकार को सौंप दी जाए. सुप्रीम कोर्ट अपना स्टे आदेश भी वापस ले.

10. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में अपने फैसले में कहा था कि एक्वायर की गई ज़मीन पर केंद्र सरकार का पूरा और असीमित अधिकार है. मगर संविधान में यह देश एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है. इसलिए मालिकाना हक का फैसला हो जाने के बाद भी, सरकार खुद कोई धर्मस्थल नहीं बना सकती.


Video: अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय इंटेलिजेंस ब्यूरो क्या कह रहा था?

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