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ऐसा भोजपुरी रैप, जिसके लिए अनुभव सिन्हा और मनोज बाजपेयी ने 26 साल बाद साथ काम किया

संगीत की यात्रा में यह बोलने जैसा गाने  का दौर भी कमाल का है. इसे ‘रैप’ कहा जाता है. थोड़ा-सा याद करने पर यह ज्यादा पंजाबी और थोड़ी हिंदी में आपको याद आएगा. अब गाने का यह दौर भोजपुरी में भी आपके सामने है. बात हो रही है एक ऐसे गाने की, जिसके लिए अनुभव सिन्हा और मनोज बाजपेयी ने 26 साल बाद साथ काम किया है.

ना त बंबई में का बा?

अनुभव सिन्हा के निर्देशन में फिल्माए गए बाकमाल ‘भोजपुरी रैप’ की ये टैगलाइन है. एकदम सरल. एक्टर मनोज बाजपेयी ने इस रैप को गाया भी है और इस पर परफॉर्म भी किया है. इसे लिखा है डॉ. सागर ने. संगीत दिया है अनुराग सैकिया ने. भोजपुरी में इतने नामी-गिरामी कलाकारों के साथ यह अपनी तरह की पहली कोशिश है, जो बहुत ज़रूरी समय पर सबके सामने है. टी-सीरीज़ और बनारस बीट के बैनर तले यह रैप एक बार में ज़ुबान पर चढ़ जाने वाला है. खुद मनोज बाजपेयी ने इस पर बात करते वक्त कहा कि बिना किसी लाग-लपेट के यह रैप पढ़कर ऐसा लगा कि जैसे उनकी ही बात हो रही हो.

ऐसा भी क्या है रैप में

इस रैप की पहली लाइन ही किसी भी परदेसी को अपनी बात महसूस हो सकती है. रेलवे स्टेशन के बैकग्राउंड में बड़ी-सी कुर्सी पर बैठे मनोज बाजपेई सवाल कहते हैं-

दू बिगहा में घर बा, बाकी सूतल बानी टेंपू में
जिनगी इ अझुराइल बा, नून-तेल आ शैंपू में

मनवा हरियर लागे भइया, हाथ लगवते माटी में
मनवा आजुओ अटकल बाटे, गरमे चोखा-बाटी में

जिनगी हम त जियल चाहीं, खेत बगइचा बारी में
छोड़-छाड़ हम आइल बानी, इहवां सब लाचारी में

बंबई में का बा?

यानी दो बीघा का घर छोड़कर यहां ऑटो में सोना पड़ रहा है, जिंदगी नमक-तेल और शैंपू में उलझी हुई है. हाथ में मिट्टी लगने से गद्गद हो जाने वाला मन, आज भी गरम बाटी-चोखा में अटका है. जिंदगी खेत-बागीचे में जीने की चाह है, लेकिन सब छोड़कर यहां लाचारी में मुंबई आना पड़ा है. वरना मुंबई में क्या है?

इस पूरे रैप में बार-बार ‘बंबई में का बा?‘ का सवाल या कहें कि किसी प्रवासी का खुद से यह पूछना, इसे धार दे रहा है. मुंबई में क्या है, के सवाल को आगे बढ़ाते हुए डॉ. सागर ने लिखा है-

बनके हम सिक्योरिटी वाला, डबल ड्यूटिया खटत बानी
डिभरी के बाती के जैसा, रोज़-रोज़ हम घटत बानी

केकरा एतना शौक बा, मच्छर से कटवावे के
के चाहेला अपने के एतना नर्वसावे के

गांव-शहर के बिचवा में हम गज़बे कन्फ्यूजियाइल बानी
दू जून के रोटी खातिर बंबई में आइल बानी

ना त बंबई में का बा?

यानी सिक्योरिटी गार्ड में ओवरटाइम करते-करते रोज़ दीये की बाती की तरह जलना पड़ता है, वरना मच्छरों से कटवाने और नर्वस रहने का किसे शौक है? गांव और शहर के कन्फ्यूज़न के बीच दो जून की रोटी के लिए शहर आना पड़ा, वरना मुंबई में क्या है?

यह पूरा रैप इसी तरह के कमाल के सवालों से भरा है. इन सवालों से लॉकडाउन में पलायन की तस्वीरों को देख रही जनता रिलेट कर पाएगी. यूपी-बिहार के लोग मुंबई में क्या करते हैं, इसे छह मिनट में बताने की कोशिश की गई है. यह रैप किसी को भी जबरिया कटघरे में नहीं लाता. बहुत चुटीले अंदाज़ में अपनी बात कहकर खत्म हो जाता है.

लेकिन ‘बंबई’ ही क्यों

इस सवाल का जवाब डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने सबसे पहले ही शॉट में दिया है. सीन शुरू होते ही बताया जाता है कि बंबई, मुंबई का निक नेम है, जो एक मेटाफर की तरह है. यहां इसे सभी महानगरों के लिए यूज़ किया गया है. लेकिन बंबई- मुंबई की डिबेट पुरानी है. इस शहर को मुंबई कहा जाए, इसके लिए बहुत बवाल कटे. नया नाम मुंबई है. गाने के 3 मिनट 50 सेकंड के बाद मनोज बाजपेयी एकदम से रुक जाते हैं. सवाल करते हैं-

क्या? बंबई नहीं, मुंबई बोलें?

फिर कहते हैं-

मुंबई होखे, बंबई होखे, दिल्ली होखे या चेन्नई हो, हमनी के त जान ओही तरे, सांसत में फसल बा ए बाबू.

यानी मुंबई हो, बंबई हो, दिल्ली या चेन्नई हो, हमलोगों की जान तो वैसे भी सांसत में फंसी रहती है. इस सवाल के जवाब के बाद नियम-कानून की स्थिति पर रैप आगे बढ़ता है, फिर स्कूल, अस्पताल और बच्चों के भविष्य पर बात होने लगती है. यह बातचीत स्वाभिमान, उम्मीद, अपने राज्य में संसाधनों की कमी सहित सभी ज़रूरी सवालों पर होती है. हर बोल के साथ उसे अंग्रेजी में भी लिखकर बताया गया है. रैप की 6:21 सेकंड की इस यात्रा पर आपको एक बार जरूर जाना चाहिए.

इसमें सबसे खास बात ये है

इस पूरे रैप में बिहार-यूपी के लोगों के दशकों पहले गांव-घर छोड़ने से लेकर बीते दिनों हुए लॉकडाउन के पलायन तक को झूमने वाले संगीत के साथ प्रस्तुत कर दिया गया है. एक खास बात यह भी है कि इसके बोल काफी सटीक और कनेक्ट कराने वाले हैं. डॉ. सागर ने इसमें पलायन के क्रोध को सवाल बनाकर सामने रखा है. मगर सबसे जबर जो बात है, वो है मनोज बाजपेयी की उपस्थिति. रैप के बीच में बात करने का उनके अंदाज में कमाल का अभिनय है. जैसे, गीत के 2:30 मिनट में जिक्र आता है कि सालभर से अपनी बेटी से नहीं मिल सके हैं. इस लाइन के खत्म होते ही मनोज बाजपेयी कहते हैं-

ए बबी! आव ना, गोदिया में आव ना. इहां सूत ना जो गोदिया में, सूत जो.

यहां ‘बबी’ संबोधन को सुनकर बिहार-यूपी के गंवई बोध को महसूस किया जा सकता है. ‘बबी’ इतना प्यारा शब्द है कि सिर्फ छोटी बच्चियों के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है. यहां गीत में अपनी बेटी से कहा जा रहा है कि आओ, यहीं मेरे पास, मेरी गोद में ही सो जाओ. और इस बात को कहते वक्त का हाव-भाव याद रह जाने वाला है. यही मनोज बाजपेयी का कमाल भी है. ऐसे ही शुरू में ही फोन पर होली में घर आने वाली बात अचानक से एक बड़ी आबादी को कनेक्ट करा देती है. ऐसी ही छोटी, मगर याद रह जाने वाली चीज़ें इस रैप में मिलेंगी.

बाकी रेलवे स्टेशन के बैकग्राउंड पर शूट हुआ यह गीत, पलायन वाली बात बिना कहे एड्रेस करा रहा है. और यही सबसे खास बात है. इस गीत को आप ज़रूर सुनें. इसमें बहुत-सी बारीक बातें हैं, जिन्हें आप हर बार नोटिस कर सकते हैं.

जाते-जाते गाना सुन लीजिए-


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