Submit your post

Follow Us

यूपी का वो इलाका, जहां सीता के श्राप की वजह से आज भी कोई चना नहीं उगाता

डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता हैं. लोक में खास दिलचस्पी है, जो आपको यहां देखने को मिलेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे और आपसे रू-ब-रू हो रहे हैं. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश है इसकी चौथी किस्त:-


अयोध्या (फैजाबाद) से सटा हुआ जिला है बस्ती. अल्हड़ नदी घाघरा के साथ दूर तक चहलकदमी करता हुआ इसका इलाका! इस इलाके में दो भाषाएं मोहब्बत से गले मिलती हैं- अवधी और भोजपुरी. पूरब बढ़ने के साथ-साथ इस अवधी इलाके को भोजपुरी दुलार मिलने लगता है. मिलवां बयार बहती है यहां. बस्ती-गोण्डा जैसे जिलों में ग्राम्यता फैजाबाद की तुलना में अधिक है. बस्ती के पाहीमाफी गांव की नीम की छांव इस बार मुझे बस्ती खींच ले गई.

बस्ती अपनी ही रंगत में बसती है. बसी है. किसी-किसी को ये बस्ती नहीं, उजड़न लगती है. चाहे उजाड़ की बस्ती कहिए या फिर, उजाड़ के बावजूद बसी कहिए. घनानंद की पंक्ति है, ‘उजड़नि बसी है हमारी अंखियानि देखो!’ बस्ती की आंखों में उजड़न की जो झलक झलकती है, वो नई नहीं है.

dehaatnama

हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी बस्ती की उजड़न को देखा था. अपने हंसमुख गद्य वाली शैली में कह गए थे, ‘यही है बस्ती! काहे की बस्ती! झक मारने की बस्ती! बस्ती इसे कहेंगे, तो उजाड़ किसे कहेंगे!’ ‘बस्ती को बस्ती कहूं, काको कहूं उजाड़!’

उजड़ने-बसने की चर्चा में एक बात और. वो बात, जिसे बस्तीवाले बड़े ताव से कहते हैं. अत्यधिक चालू मुहावरे में बोलूं, तो ‘छप्पन इंची छाती फुलाए हुए’. बस्ती जिला मुख्यालय से लगभग 60 किमी दूरी पर एक जगह है- मखौड़ा. यहीं बताया जाता है कि ऋंगी ऋषि का धाम है. बड़े काम के ऋषि! चिंतित दशरथ की अयोध्या इन्हीं के कारण बसी. कथा सब जानते ही हैं, अलग से क्या कहना. तो बस्ती की उजड़न अपनी जगह, लेकिन अयोध्या जैसी नगरी को बसाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है. इसीलिए तावबाज बस्ती-वासी सुनाने से नहीं चूकते, ‘ज्यादा बनो मत! पौरुष तो हम्हीं ने दिया!’

बस्ती शहर की एक तस्वीर
बस्ती शहर की एक तस्वीर

एक अनाज ने भी बस्ती को उजाड़ कर दिया. चने ने. ये जो ऋषि-धाम मखौड़ा है, वहीं से मनोरमा नदी निकलती है. ये उत्तर की तरफ है. इसके दक्षिण बहती है सरयू नदी. यानी वही घाघरा. ये जो दोनों नदियों के बीच का इलाका पड़ता है, यहां कोई चना नहीं बोता. यहां के बच्चे बहुत समय तक इस अनाज से अपरिचित रहते हैं. इसी इलाके में एक मार्ग है, राम जानकी मार्ग. जनकपुर से अयोध्या आते हुए सीता-राम इसी रास्ते से आए. ससुराल से मायके तक पहुंची हुई राह.

कभी बस्ती में चना बहुत उगाया जाता था. इसी रास्ते पर सीताजी की पालकी आ रही थी. कहारों के पैर चने की लोनाई से खुजलाने लगे थे. सीता ने अपने पांव नीचे किए, तो यही असर उनके भी पांवों पर पड़ा. उन्हें बहुत अखरा. उन्होंने श्राप दे दिया कि अब से जो भी यहां चना बोएगा, उसका बड़ा बेटा और दाहिना बैल नहीं बचेगा, उसका नाश हो जाएगा.

अजीब सी बात लगती है ये, लेकिन ये पूरी तरह सच है कि यहां लोग चना नहीं बोते. गांववाले कहते हैं, ‘भैया, हमका सबका चना बोउब नाहीं छाजत!’ (मतलब, चना बोना हमारे लिए अशुभ है.) पाहीमाफी गांव के एक बुजुर्ग ने बताया कि कुछ ही साल पहले एक मोहम्डन ने चना बोने का जोखिम उठाया था. उसने कहा कि हम हिंदू तो हैं नहीं, तो हम पर श्राप का असर नहीं होगा! लेकिन वो श्राप के प्रभाव से बच नहीं सका. उसके बैल खेत में ही मर गए. पूरा परिवार चौपट हो गया. हिंदू हो या कोई दूसरा मजहब मानने वाला, यहां कोई भी चना नहीं बोता. मीलों-मील तक.

बस्ती जिले के जिस इलाके की चर्चा हो रही है, वो गांवों का जाल है. पुराने रिवाजों को अब भी सहेजे हुए. इन्हीं गांवों में एक गांव कभी इतना वर्चस्व पा गया था कि वह ‘राज्य’ की स्थिति में आ गया था. बात बस्ती के अमोढ़ा राज्य की है. आप यहां जाइए, इसका स्वभाव अन्य राज्यों से अलग दिखेगा. ग्राम्य-राज्य की तरह.

zzalim

अमोढ़ा 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम का क्रांतिकारी साक्षी है. जब ‘नक्की, मानसिंह और सुदर्शन’ जैसे अवध के प्रजापालकों ने विश्वासघात करते हुए अंग्रेजों से मिलीमार कर ली थी, तब अमोढ़ा राज्य निडर होकर अंग्रेजों से जूझ भिड़ा था. यहां के राजा जालिम सिंह और राजकुमारी तलाश कुंवरि अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. तलाश कुंवरि को तो वहां के लोग अमोढ़ा की झांसी-रानी बो्लते हैं. दोनों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे. बहुत दिनों तक बस्ती में अमोढ़ा के पास अंग्रेजों की फौज की छावनी बनी रही. आज भी छावनी बाजार के रूप में ये जगह चर्चित है.

इसी अमोढ़ा राज का बसाया गांव था, ‘पाहीमाफी’. राज्य से कुछ कोस की दूरी पर. घाघरा नदी के किनारे. एक पुरोहित को बसाने के लिए ये गांव दे दिया था राजा ने. गांव जो पाही (अलग से) में मिला हो. इस गांव से लगान नहीं वसूला जाता था, इसलिए ‘पाहीमाफी’ नाम पड़ा. लगान माफ. लेकिन ये गांव 70-80 के दशक में धीरे-धीरे घाघरा की कटान से खत्म हो गया. उजड़ गया.

ghaghra

साहित्यकार आशाराम जागरथ अपने इसी गांव की गाथा लिख रहे हैं, अवधी में. कविता में. अनमोल रचना ‘पाहीमाफी’ में. ये आत्मकथात्मक है. दलित दृष्टि केंद्रित. अल्पायु में बिलाते हुए देखे-जिए अपने गांव का मर्मस्पर्शी बयान है यहां. बसे-बसाए गांव की याद को जिंदा रखता बस एक नीम का पेड़ बचा हुआ है. अब भी उसी तरह डटा हुआ. सबके हिस्से की चुनौती को अकेले स्वीकार किए. खुद-गवाही के साथ. यही नीम का पेड़ ग्रामगाथा का आवर्ती टेक है:

यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह,
बचा बा पाहीमाफी मा!

ये नीम का पेड़ सामान्य नहीं दीखता. हाहाहूती है ये. कई बिस्से में फैला. काली माई का देउथान भी इसी के नीचे है. पूछने पर कि ये कितना पुराना पेड़ है, गांव के बुजुर्ग ने बताया, ‘भैया, हमारे दादा के दादा ने भी इसे अपने बचपने में ऐसा ही, इतना ही छतनार देखा था.’ मैंने देखा कि गांव के लोग इस नीम के पेड़ का सम्मान करते हैं, इसे प्यार करते हैं, इससे डरते भी हैं. इसी नीम की एक डाल जो टूट गई थी, उसे दिखाते हुए बुजुर्ग ने कहा, ‘इसे गांव का कोई ले नहीं जाता. जब सालाना भंडारा होता है, तो ये लकड़ी उसी में काम आती है. जो ले जाएगा, उसे फलेगी नहीं ये लकड़ी.’

villagers

बड़का पुरनिया जानकर आशाराम जागरथ इस नीम के पेड़ से संवाद करते हैं, कुछ वैसा ही संवाद आप भी करेंगे, जब कभी यहां पहुंचेंगे-

सुख-दुःख-गम खाय के भयौ बड़ा
हे नीम! तू काहे हरा-भरा
केव न्याय करै, अन्याय करै
तोहरे बरदास्त कै पेट बड़ा
तोहरे संग्हरी कै साथी सब
मरि-उखरि परे या झुराय गए
जब काल कै गाल बनी नदिया
जड़-मूल समेत समाय गए
तबहूं तू हयो मुंह बांधें खड़ा
केतना कुछ घटा कहानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा….

नीम का वही पेड़
नीम का वही पेड़

जब कभी गांव जाएं, तो देखें कि जो चीजें बहुत चुपचाप हैं, वो बहुत बोल भी रही हैं. थोड़ी जहमत हमें उठानी होगी, कान लगाने की, ध्यान लगाने की. मसलन इस नीम के पेड़ को ही लीजिए. जाने कितनी बातें कहना चाहता है, खीसे-कहानियां. शांत मन से बैठने को कहता है. समय की टिक-टिक दिमाग में खलल पैदा करती है. लौटना होगा. ‘पेड़ पुरान’ से माफी मांगता हूं. निगाह निगाह से मिलती है. वही झलक फिर! ‘उजरनि बसी है हमारी अंखियानि देखो!’


पढ़िए देहातनामा की पिछली किस्तें:

नेताओ, किसानों और गांवों को समझना है, तो गांधीजी से सीखो

गांव का कनफटा जोगी, जो प्रेम सिखाने वाला जोगी है, नफरत सिखाने वाला योगी नहीं

जब लड़की पैदा होते ही ‘मदार’ का दूध पिलाकर मार डाला जाता था

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'द्रविड़ ने बहुत नाजुक शब्दों से मुझे धराशायी कर दिया था'

'द्रविड़ ने बहुत नाजुक शब्दों से मुझे धराशायी कर दिया था'

रामचंद्र गुहा की किताब 'क्रिकेट का कॉमनवेल्थ' के कुछ अंश.

पहले स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर की कहानी, जिनका सबसे हिट रोल उनके लिए शाप बन गया

पहले स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर की कहानी, जिनका सबसे हिट रोल उनके लिए शाप बन गया

शुद्ध और असली स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर करियर ग्राफ़ बाद में गिरता ही चला गया.

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.