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कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट से बचना है तो इन बातों पर ध्यान देना है जरूरी

अदालत की अवमानना. कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट. ये शब्द इन दिनों ख़ूब चर्चा में हैं. सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण को अवमानना केस में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी करार दिया है. उनके विवादित ट्वीट पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रशांत भूषण को कोर्ट की अवमानना का दोषी माना है. अब सजा पर सुनवाई 20 अगस्त को होगी. आइए गहराई से जानते हैं अदालत की अवमानना के इस कानून के बारे में.

लॉकडाउन की वजह से बंद रहने के बाद आजकल देश भर की अदालतें ज़रूरी मामलों पर सुनवाई ऑनलाइन कर रही हैं. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए हो रही इन सुनवाइयों में कई अजीब मामले भी सामने आए हैं. कहीं वकील बनियान में ही जिरह करते दिखे तो कहीं बहस के दौरान हुक्का गुड़गुड़ाते नजर आए. एक वकील साहब तो गुटखा खाकर ऑनलाइन जिरह करने लगे.

हाल में वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन का एक वीडियो वायरल हुआ था. इसमें राजस्थान हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान वह कथित रूप से हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे.बेहद सीनियर एडवोकेट धवन को धूम्रपान के खतरों को लेकर राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने सलाह भी दी थी.ये वीडियो क्लिप न्यायाधीश महेन्द्र कुमार गोयल की अदालत में सुनवाई के दौरान की है. धवन बहुजन समाज पार्टी के छह विधायकों की ओर से पेश हुए थे. इन विधायकों के राजस्थान में कांग्रेस में विलय को बसपा और भाजपा के एक विधायक ने चुनौती दी थी.

सुनवाई में शामिल राजीव धवन
सुनवाई के बीच राजीव धवन का ये विडियो वायरल रहा था.

 # क्या है कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट?

अदालत की अवमानना के संबंध में भारत में बाक़ायदा कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट 1971 बना हुआ है. इसमें विस्तार से बताया गया है कि अदालत कब किसी व्यक्ति, संस्था या समूह आदि पर अवमानना में कार्रवाई कर सकती हैं.

एक्ट में ‘किसी न्यायालय की गरिमा और उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करने’ को कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट माना गया है.

लेकिन ये कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट भी दो तरह का होता है. इसके बारे में हमने सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट के.बी उपाध्याय से बात की. उन्होंने बताया-

कोर्ट में कंटेम्प्ट दो तरह से माना जा सकता है जैसा एक्ट भी कहता है. पहला है, सिविल कोर्ट ऑफ़ कंटेम्प्ट. और दूसरा है क्रिमिनल कोर्ट ऑफ़ कंटेम्प्ट. सिविल कंटेम्प्ट में न्यायालय के निर्णय की अनदेखी, डिक्री, आदेश, रिट या अन्य कोई फ़ैसला, जिसका जानबूझकर उल्लंघन किया जाए या उसे मानने से इनकार किया जाए, ऐसे मामले आते हैं.

क्रिमिनल कंटेम्प्ट तब माना जाता है, जब न्यायालय से जुड़ी कोई बात लिखित, मौखिक, चिह्नित या चित्रित तरीके से इस तरह सामने लाई जाए, जिससे न्यायालय की गरिमा को ठेस लगे. जैसा वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के मामले में हुआ. उनके लिखे ट्वीट पर उन्हें कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट का दोषी माना गया है.

क्रिमिनल कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट में सज़ा का भी प्रावधान है. सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के तहत 6 महीने का साधारण कारावास या 2000 रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों दे सकती हैं. साल 1991 के सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के अनुसार, उसके पास ना केवल ख़ुद बल्कि पूरे देश में उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ न्यायालयों के कंटेम्प्ट मामलों में सज़ा सुनाने के अधिकार हैं. भारत का संविधान कोर्ट को ये शक्ति देता है. अनुच्छेद 129, 142 और 215 सर्वोच्च और उच्च न्यायालय को सज़ा सुनाने की पावर देते हैं.

# वकीलों के लिए क्यों ज़रूरी प्रोटोकॉल का पालन करना?

एडवोकेट के.बी उपाध्याय बताते हैं कि –

वकीलों से डेकोरम मेनटेन करने की अपेक्षा अधिक रहती है. वजह यह है कि कोर्ट हमें ‘ऑफिसर ऑफ़ लॉ’ मानकर चलती है. ये माना जाता है कि कोर्ट के प्रोटोकॉल का हमें पता होना चाहिए.

एक सामान्य व्यक्ति, जो अदालत में शायद पहली बार आया हो और एक वकील, जिसका रोज़ का काम अदालत में ही होता हो, इन दोनों के कंटेम्प्ट में आमतौर पर फ़र्क रहता है. कोर्ट एक सामान्य व्यक्ति को जिस ग़लती के लिए चेतावनी देकर छोड़ सकती है, उसी ग़लती के लिए वकील पर जुर्माना लगा सकती है क्योंकि उन्हें लीगल सिस्टम का एक्टिव पार्ट माना जाता है. हमारी ग़लती ‘जानबूझकर की गई ग़लती’ मानी जाएगी.

एडवोकेट एक्ट में है सब जानकारी.

एडवोकेट एक्ट में वकीलों से जुड़ी सब जानकारी होती है.

एडवोकेट उपाध्याय ने एक उदाहरण से समझाते हुए बताया कि –

अभी इसी महीने राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर बेंच में ऑनलाइन सुनवाई में एक वकील साहब मामले की पैरवी करने बनियान में ही आ गए. इस पर जज नाराज हो गए. बेहद ज़रूरी मामलों की ऑनलाइन सुनवाई में भी कोर्ट का डेकोरम बनाए रखने का स्पष्ट निर्देश है. इसके बावजूद राजस्थान हाई कोर्ट ने बार असोसिएशन से बाक़ायदा नोटिस जारी करवाया कि यूनिफ़ॉर्म में ही सुनवाई हुआ करेगी. वकील को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया. हालांकि जज चाहते तो इसे अदालत की अवमानना मान सकते थे और कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट के तहत सज़ा भी सुना सकते थे.

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच का फ़ैसला.
राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर बेंच का फ़ैसला.

# वकीलों पर अवमानना की दोहरी मार

इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट विकास बताते हैं कि-

अदालत में वकीलों के आचरण के लिए बाक़ायदा एडवोकेट एक्ट 1961 बना हुआ है. उसमें वकीलों के ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ का भी ज़िक्र है. आचरण संहिता के तहत ही ड्रेस का नियम भी आता है. दिल्ली में गर्मी की वजह से कोर्ट ने वकीलों को लबादे से मुक्त रखा है. लेकिन जहां ऐसा कोई आदेश नहीं है, वहां आप काले कोट, सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद नेक बैण्ड के साथ ही अदालत में आएंगे.

जहां तक ऑनलाइन सुनवाई की बात है, तो बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया पहले ही नोटिस जारी करके बता चुका है कि वर्चुअल सुनवाई में भी वकील उसी तरह पेश होंगे, जैसे कोर्ट में होते हैं. कोर्ट में खड़े होकर जिरह करने का नियम है. लेकिन ऑनलाइन सुनवाई में बैठकर जिरह करने की छूट है. हालांकि सुनवाई के दौरान कोई और काम नहीं कर सकते. जैसे खाना खाना या सब्ज़ी काटना इत्यादि. 

# इस कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की ज़रूरत क्या है?

कई बार ये सवाल भी उठा है कि भारतीय न्यायालयों में आपराधिक अवमानना के क़ानून और इसके तहत दी जाने वाली सज़ा की क्या और कितनी ज़रूरत है? भारत में ‘लॉ कमीशन’ की 2018 की रिपोर्ट में इसका जबाव दिया गया है. सिर्फ़ इसी क़ानून के लिए नहीं बल्कि भारत में सभी तरह के क़ानूनी सुधार लाने के लिए लॉ कमीशन बनाए जाते रहे हैं. भारत में लॉ कमीशन उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से ही बनने शुरू हो गए थे. आज़ादी के बाद समय-समय पर बनाए गए इन लॉ कमीशन ने सुझाव दिए कि संविधान बनने से भी पहले से चले आ रहे क़ानूनों में से किसे और मज़बूत करना है, कौन-से क़ानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं और उनमें क्या सुधार की ज़रूरत है.

2018 में जस्टिस बी.एस.चौहान की अध्यक्षता वाले लॉ कमीशन ने न्यायिक अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स) एक्ट, 1971 पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. रिपोर्ट में इस बात की पड़ताल की गई थी कि क्या कंटेम्प्ट की परिभाषा में सिविल कंटेम्प्ट और क्रिमिनल कंटेम्प्ट दोनों होने चाहिए? या सिर्फ़ सिविल कंटेम्प्ट को ही कंटेम्प्ट मानना चाहिए और क्रिमिनल कंटेम्प्ट को हटा देना चाहिए. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स) एक्ट, 1971 में संशोधन की कोई ज़रूरत नहीं है.

The Lallantop ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट विजयालक्ष्मी से बात की. उन्होंने बताया कि लॉ कमीशन क्यों इस एक्ट को जस का तस रखना चाहता था. एडवोकेट विजयालक्ष्मी कहती हैं कि-

भारत में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट 1971 ज़रूरी है, इसकी चार बड़ी वजहें हैं-

पहली, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट यानि सुपीरियर कोर्ट्स को कंटेम्प्ट से जुड़ी शक्ति और अधिकार संविधान से मिले हुए हैं. 1971 का एक्ट कंटेम्प्ट की जांच और सज़ा के संबंध में ज्युडिशियल प्रोसेस की बात करता है. एक्ट को ख़त्म करने से होगा ये कि सुपीरियर कोर्ट तो अपनी संवैधानिक शक्ति से कंटेम्प्ट मामलों में जांच और सज़ा का आदेश दे सकेंगी लेकिन छोटी अदालतों में हुए कंटेम्प्ट पर बात फंस जाएगी. सेशन कोर्ट जैसी अदालतों के पास ये एक्ट ही कंटेम्प्ट के मामले में सबसे बड़ी ताक़त है. अगर ये हटा तो सुपीरियर कोर्ट में जो कंटेम्प्ट नहीं हुआ, उन मामलों में सज़ा नहीं सुनाई जा सकेगी.

एडवोकेट विजया लक्ष्मी आगे बताती हैं कि-

दूसरी वजह, लॉ कमीशन की 2018 में आई रिपोर्ट कहती है कि भारत में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के सिविल और क्रिमिनल दोनों मामले लाखों की तादाद में पेंडिंग पड़े हैं. इन मामलों की मौजूदगी बताती है कि कोर्ट के आदेश को ना मानने की प्रवृत्ति अब भी भारतीय लोगों में काफ़ी ज़्यादा है. इससे भी ये एक्ट रेलिवेंट हो जाता है.

दुनिया भर में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की स्थिति समझाते हुए वह आगे बताती हैं कि –

तीसरी वजह, पूरी दुनिया को देखिए. कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट क़ानून सीधा-सीधा किसी भी देश के आम नागरिक में क़ानून के लिए आस्था से जुड़ा है. यूनाइटेड किंगडम समेत कई देशों में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के क़ानून को हटा दिया गया है. लेकिन ये भी देखिए कि यूके में कंटेम्प्ट का क्रिमिनल केस आख़िरी बार 1931 में हुआ था. ऐसा भारत में नहीं है. जब न्यायालयों की अवमानना के मामलों में हमारे यहां अभी तक कोई ख़ास कमी नहीं आई है तो इस क़ानून को हटाने का मतलब भारतीय अदालतों के हाथ से एक हथियार छीनने जैसा होगा.

आम इंसान को अदालतों में क्या इस क़ानून से बेवजह डरना चाहिए? इस सवाल के जवाब में एडवोकेट विजया चौथी और आख़िरी वजह बताती हैं कि-

चौथी वजह है अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स) एक्ट, 1971 में सेफगार्ड्स. मतलब आम जनता को डरने की ज़रूरत नहीं कि अगर उन्होंने अदालत में दोनों हाथ जेब में भी रख लिए तो जज को बुरा लगेगा और उन पर कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट लगाकर जेल भेज दिया जाएगा. इस एक्ट में कई प्रावधान हैं, जो इसे इस मामले में सुरक्षित बनाते हैं. कंटेम्प्ट के सभी मामलों में मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता. ज़्यादातर सिविल कंटेम्प्ट जैसे ‘जज के सामने असम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल वगैरह’ सिर्फ़ माफ़ी मांग लेने से ख़त्म हो जाते हैं. उनमें सज़ा नहीं होती. कई मामलों में नोटिस का संतोषजनक जवाब देने पर भी कंटेम्प्ट हटा लिया जाता है. लेकिन अगर भरी अदालत में किसी पर हाथ उठाने जैसा मामला हो तो क्रिमिनल कंटेम्प्ट बनेगा ही और उसकी सज़ा भी मिलेगी.

ये थी कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की वो सारी डिटेल्स, जो टीवी पर कोर्टरूम ड्रामा फ़िल्में देखकर समझना मुश्किल है. वैसे भी आमतौर पर लोग अदालतों में वकील को ‘तारीख़ पर तारीख़’ चिल्लाते हुए सनी देओल इमैजिन करते हैं. लेकिन असल अदालतें ‘दामिनी’ की स्क्रिप्ट से नहीं बल्कि क़ानून से चलती हैं.


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