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कहां हैं 'वागले की दुनिया' वाले अंजन श्रीवास्तव, जिनका एक्टिंग का सपना मरती हुई बहन ने पूरा किया

एक ऐसा एक्टर, जिसने फिल्मों में आने से पहले रंगमच की धूल को माथे से लगाया. बंबई में सरकारी नौकरी की और साथ ही थिएटर भी. ऐसी उम्र में मशहूर हुआ, जिस उम्र में हीरो डेब्यू करने से कतराते हैं. इतना डिस्क्रिप्शन पढ़कर अगर अमरीश पुरी की इमेज दिमाग में आने लगे तो आपकी कोई गलती नहीं. इनका करियर ग्राफ कुछ हद तक अमरीश पुरी से मिलता जुलता है.

हम बात कर रहे हैं अंजन श्रीवास्तव की. टीवी की दुनिया का वो कॉमन मैन, जिसे हम सब वागले के नाम से पहचानते हैं.  बताएंगे उनकी लाइफ और करियर से जुड़ी बातें.

Kaha Gaye Ye Log


# ‘बलराज साहनी, ये आपने क्या कर दिया?’

उत्तर प्रदेश का जिला है ग़ाज़ीपुर. वहां एक गांव है गहमर के नाम से. अंजन के पिता वहीं के रहने वाले थे. लेकिन जवानी में काम की तलाश में घर से निकलना पड़ा. ये तलाश उन्हें ले गई कलकत्ता. वो जगह जो अंजन का जन्मस्थान भी बनी. उनके पिता इलाहाबाद बैंक में कार्यरत थे. परिवार की माली हालत इतनी मजबूत नहीं थी. इसलिए छोटे-छोटे कमरों वाले घरों में रहते. बचपन से ही अंजन का पढ़ाई की ओर कोई खास रुझान नहीं था. मतलब गाड़ी चल रही थी जैसे-तैसे. इतना समझ आने लग गया था कि पढ़ाई से तो उनका कुछ नहीं होने वाला. अंजन अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. इसलिए पढ़ाई में उनकी ऐसी हालत उनके पिता के लिए भी चिंता का सबब थी.

फिर आया उनकी लाइफ का टर्निंग पॉइंट. जिसने उनका एक नई दुनिया से साक्षात्कार कराया. 11वीं कक्षा में थे. पता चला कि पास ही में किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है. सेट की ओर दौड़ पड़े. फिल्म का नाम था ‘चिमनी का धुआं’. पहुंचे तो देखा कि वहां बलराज साहनी, मोतीलाल और हेलेन जैसे एक्टर्स मौजूद थे. उनके साथ धूमल को भी होना था. लेकिन वो किसी कारणवश बंबई में ही रह गए. हुआ यूं कि बलराज साहनी के कुछ शॉट्स बचे थे. जिन्हें धूमल के ऐंगल से लिया जाना था. उनकी जगह किसी को उनका कोट पहना कर बिठाना था. इस काम के लिए भीड़ से अंजन को बुला लिया गया. उन्हें सख्त हिदायत दी गई कि कोट पहनो और सीधे बैठ जाओ. ज़रा सा भी इधर-उधर मत देखना.

बलराज
बलराज साहनी के सामने बैठना अंजन की पहली एक्टिंग मास्टर क्लास थी.

अंजन को बस अब बलराज साहनी के सामने चुपचाप बैठना था. इस वाकये को याद कर अंजन अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि वो सीन करने का उन्हें बहुत फायदा मिला. उन्हें बलराज साहब के हावभाव नोटिस करने का भरपूर समय मिला. वो जैसा कैमरा रोल करने से पहले थे, ठीक वैसा ही एक्शन बोलने के बाद थे. मतलब बिल्कुल नैचुरल. शूटिंग का काम खत्म. अंजन अपने घर लौट आए. लेकिन वो अनुभव उनके ज़हन से निकालने का नाम न ले. वो अब फिल्मों को लेकर कल्पना करने लगें. कि इस फिल्म में अगर फलां एक्टर की जगह वो होता, तो कैसा होता. और फिर वो कैसे डायलॉग बोलता. ऐसी कल्पनाएं कागज़ पर उतारते रहते.


# नाटक करने से लड़के को टीबी हो जाएगा

किसी भी तरह अंजन ने स्कूली पढ़ाई पूरी की. जिसके बाद उनके पिता ने उन्हें ‘बेटा साइंस ले लो, आगे ऐश है’ के जगतप्रसिद्ध नारे के तहत साइंस दिलवा दी. यहां चालू हुआ असली स्ट्रगल. प्रोफेसर जो पढ़ाते, सब सिर के ऊपर से जाता. किताबें डराने लगीं. जिसका नतीजा परीक्षा में भी दिखाई देने लगा. लगातार रिज़ल्ट नीचे ही जा रहा था. थक हारकर पिता ने ही कह दिया कि बेटा तुमसे न हो पाएगा. तुम करना क्या चाहते हो? बेटे के पास कोई जवाब नहीं. कहा कि जो आप कहेंगे, वही पढ़ लेंगे. साइंस के बाद पिता ने नंबर लगाया कॉमर्स का. और बेटा अब बी कॉम करने लगा. सोचा कि बी कॉम कर के कम से कम किसी बैंक में नौकरी करने लायक तो हो ही जाएगा.

नाटक का स्कोप सिकुड़ता जा रहा था
अपने एक नाटक के दौरान अभिनय करते अंजन.

बी कॉम पूरी हुई. जिसके बाद अंजन इलाहाबाद बैंक में काम करने लगे. फिर किसी जानकार ने उनके पिता को सलाह दी. कि बेटे को एलएलबी करा दीजिए. अंजन के अलावा इस पॉइंट पर पूरी दुनिया उनके एक्टिंग प्रेम से अनजान थी. वो छुपते-छुपाते कुछ नाटक भी कर चुके थे. लेकिन वो कामयाब नहीं हुए. एलएलबी वाले परामर्श पर उन्होंने सोचा कि ठीक ही है. अगर एक्टिंग में कुछ नहीं बना, तो कम से कम ऐफिडेविट वगैरह का काम कर गुज़ारा हो जाएगा. उन्होंने एलएलबी पढ़ना शुरू कर दिया. सुबह एलएलबी, दिन में बैंक और शाम का समय देते थिएटर को. वो बंगाल के अलग-अलग थिएटर ग्रुप्स के साथ जुड़कर काम करने लगे. एक्टिंग की बारीकियां सीखने लगे. ऐसे ही उन्हें एक बार रेडियो प्ले करने का ऑफर आया. घर पर भी बात पता चली. पिताजी बिगड़ गए. जाने उनके दिमाग में नाटक को लेकर क्या धारणा बनी हुई थी. कि अगर लड़का नाटक करेगा तो उसे टीबी हो जाएगा. उस समय टीबी का इलाज भी मुमकिन नहीं था. इसलिए जहां ऐसी बीमारी का नाम आया, दूर से ही प्रणाम. लेकिन अंजन की मां उनके सपोर्ट में थीं. कहा कि स्टेज पर कहां जा रहा है. रेडियो पर ही तो है. फिर एक-दो करीबी लोगों ने और समझाया. और उन्होंने अपनी हामी भर दी.

अंजन अब लगातार प्ले करने लगे. बैकस्टेज से लीड तक आ गए. संगीत कला मंदिर में उन्होंने करीब 10 साल तक नाटक किए.


# मरती हुई बहन ने अंजन का सबसे बड़ा सपना पूरा किया

अंजन को अपने थिएटर के दिनों में ही फिल्मों का चस्का लग गया था. वो समय निकालकर कोई न कोई हिंदी फिल्म देख ही डालते. बचपन में जो असर बलराज साहनी ने किया था, ठीक वैसा ही असर अब संजीव कुमार के काम से हो रहा था. वो ज्ञानेश मुखर्जी के साथ बंगाली नाटक भी करते. उन्हीं ज्ञानेश मुखर्जी ने उन्हें एक सलाह दी. कि अंजन, हीरो लीड में रहता है. नाचता, गाता है. लेकिन एक्टिंग का दारोमदार रहता है कैरक्टर आर्टिस्ट या चरित्र कलाकार पर. अंजन के दिमाग में बात बैठ गई. सोच लिया कि फिल्मों में जाएंगे तो कैरक्टर रोल्स ही करेंगे. लेकिन बंबई की दुनिया अभी भी उनके लिए बहुत दूर थी. और उसकी सबसे बडी वजह थी पिताजी.

बंबई भले ही दूर था. लेकिन फिर बंबई वाले उनके पास आ गए. हुआ यूं कि अंजन एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. डायरेक्ट कर रहे थे अजित लहरी. अंजन इससे पहले एक आसामी फिल्म भी कर चुके थे. ‘चमेली मेमसाब’ के नाम से. अजित वाली फिल्म की शूटिंग दार्जिलिंग में चल रही थी. मिथुन, टॉम ऑल्टर और आभा धूलिया फिल्म की कास्ट का हिस्सा थे. अंजन बॉम्बे जाकर थिएटर स्पेस को एक्सप्लोर करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने फिल्म के अपने साथी कलाकारों से बॉम्बे के थिएटर ग्रुप्स के बारे में पूछा. तो इपटा और सत्यदेव दुबे के थिएटर ग्रुप का नाम पता चला.

चमेली मेमसाब
‘चमेली मेमसाब’, अंजन की पहली फिल्म.

कलकत्ता में नाटक का स्कोप सिकुड़ता जा रहा था. जो बचे थे, उनमें भी हिंदी भाषी बेहद चुनिंदा थे. ये एक और बडी वजह थी अंजन के बॉम्बे जाने की. लेकिन दिक्कत तो पिताजी की थी. लेकिन पिता का भी दिल पसीजा. जब अंजन की छोटी बहन को फेफड़ों से संबंधित एक जानलेवा बीमारी हो गई. अपने अंत समय में उन्होंने पिता से दरख्वास्त की. कि भईया को बॉम्बे जाने दीजिए. उस दिन के बाद पिता ने फिर कभी ऐतराज़ नहीं जताया.


# राजेश खन्ना को सुपरस्टार बनाने वाले डायरेक्टर ने काम देना ज़रूरी नहीं समझा

अंजन हमेशा प्लान बी पर भरोसा करते थे. ऐसे ही बोरिया बिस्तर उठाकर चलने वालों में नहीं थे. इसलिए जब बॉम्बे आने की बात पुख्ता हो गई, उसके बाद भी उन्होंने अपने बैंक की नौकरी नहीं छोड़ी. वो बस अपना ट्रांसफर बॉम्बे करवाना चाहते थे. बैंक ने उनके सामने दो शर्तें रखी. पहला तो ये कि उनके ट्रांसफर में लंबा वक्त लग सकता है. और दूसरा कि वो अगले तीन सालों तक प्रोमोशन नहीं लेंगे. अंजन दोनों बातों पर मान गए. बॉम्बे आ गए. वहां जाकर इपटा से जुड़े. एक्टिंग करने का शौक था. मज़ा आता था. और कहीं मन नहीं लगता था. खुद की ऐसी बातों से वो पहले से अवगत थे. लेकिन इपटा आने के बाद समझ आया कि वो वाकई में सिर्फ एक्टिंग ही क्यों करना चाहते थे.

किसी भी बाहरी इंसान के बॉम्बे आने के बाद दिमाग में सबसे पहले एक ही बात आती है. कि खर्चा कैसे निकलेगा. अंजन इस चिंता का पुख्ता जुगाड़ कर के चले थे. लेकिन उनकी व्यवस्था डगमगा गई. जब पता चला कि बैंक की ब्रांच ट्रांसफर में छह महीने का वक्त लगेगा. यानी अगले छह महीनों तक उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलेगी. अंजन को डर था कि अगर घर पर ये बात बताई, तो अभी घर वापसी का आदेश मिलेगा. ऊपर से पिताजी की डांट भी. तो उन्होंने अपने एक दोस्त से पैसे मंगवाना शुरू कर दिया. ज़रूरत लायक ही पैसा मंगवाते, जिसमें खुले खर्च का कोई स्कोप ही नहीं था. उस दौरान वो एक्टिव तौर पर थिएटर भी करने लगे थे. इसलिए ज़रूरी था कि एक स्टैंडर्ड मेंटेन रहे. उनके घर से थोड़ी दूर एक मिसल पाव वाला था. देर रात उसके पास जाते और अपने खाने का जुगाड़ करते. ताकि कोई उन्हें देख न ले.

अंजन इपटा
अंजन मानते हैं कि इपटा ने उन्हें अपने अंदर के कलाकार से मिलाया.

घर छोड़ते वक्त अंजन अपने साथ दो चिट्ठियां लेकर चले थे. जो सिफारिश पत्र ही थे. पहला था ‘अमर प्रेम’ और ‘कटी पतंग’ जैसी फिल्में बना चुके डायरेक्टर शक्ति सामंत के नाम. जो उनके भाई ने लिखा था. कि अंजन अच्छा लड़का है, इसने इतना काम किया है और तुम अपनी किसी फिल्म में मौका दो जैसी बातें लिखी थी. अंजन के पिता शक्ति के भाई को जानते थे. उन्होंने ही शक्ति वाली चिट्ठी अरेंज करवाई थी. अंजन वो चिट्ठी लेकर शक्ति के पास पहुंचे. लेकिन उन्होंने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. ‘हां, हम्म’ कर के अंजन को टाल दिया.

अंजन के पास दूसरी चिट्ठी थी कॉमन मैन का सिनेमा बनाने वाले ऋषिकेश मुखर्जी के नाम. ऋषि दा वाली चिट्ठी उनके बंगाल थिएटर की साथी कलाकार ने लिखवाकर दी थी. जिसे लेकर वो ऋषि दा के पास पहुंचे. ऋषि दा ने उन्हें काम नहीं दिया. हालांकि, निराश भी नहीं किया. अंदर बुलाकर खाना खिलाया. उनके बैकग्राउंड के बारे में पूछा. ऋषि दा ने उस समय भले ही अंजन को काम नहीं दिया. लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने बंगाल से आए इस लड़के को बुला भेजा. जब वो ‘गोलमाल’ पर काम कर रहे थे. ‘गोल माल’ का क्लाइमैक्स याद कीजिए. जब केश्टो मुखर्जी के किरदार को पकड़कर थाने लाया जाता है. तब उसके सामने खड़ा पुलिस इंस्पेक्टर अंजन ही थे.

पुलिस इंस्पेक्टर
‘गोलमाल’ के क्लाइमैक्स सीन में अंजन.

अंजन सिर्फ ‘गोलमाल’ पर ही नहीं रुके. उन्होंने इसके बाद ‘कालिया’, ‘बेमिसाल’ और ‘आगमन’ जैसी फिल्में भी की.


# ‘रामायण’ की तरह कर्फ्यू लगा देने वाला शो

कोई भी एक्टर चाहे दर्जनों फिल्में या शोज़ कर ले, लेकिन एक नाम ऐसा होता है जो उसकी पहचान बनकर रह जाता है. जिसकी छवि के नीचे उसका पूरा काम दब जाता है. अंजन श्रीवास्तव के करियर में वो नाम था ‘वागले की दुनिया’. आर के लक्ष्मण के ‘कॉमन मैन’ पर आधारित था श्रीनिवास वागले का किरदार. एक सेल्स क्लर्क, रोजमर्रा के सिरदर्द का मारा. शो ने कल्ट स्टेटस हासिल कर लिया. अंजन के वागले को लोगों ने खूब पसंद किया. वजह थी कि उन्हें वागले की दुनिया में अपनी दुनिया नज़र आती थी. सब अंजन के काम से खुश थे. सिवाय शो के क्रिएटर आर के लक्ष्मण के. लक्ष्मण को लगता था कि अंजन बहुत लाउड हैं. उन्हें अपनी एक्टिंग में सटल होने की ज़रूरत है. वो अपनी बात पर अड़ गए. कि या तो मेरी बात मानो वरना करो ही मत. लक्ष्मण शो में इतना इनवॉल्व होकर काम करते कि एक्टर्स को किरदार समझाने के लिए नैरेट नहीं करते. बल्कि खुद एक्टिंग कर के दिखाते.

अंजन ने लक्ष्मण की सलाह पर काम किया और नतीजा सबके सामने है. अंजन का शो पर ट्रैक सिर्फ एक एपिसोड का होना था. लेकिन उनका किरदार इतना पसंद किया गया कि एपिसोड बढ़ते चले गए. शो को पहले ‘आर के लक्ष्मण की दुनिया’ के टाइटल से बनाने की बात चल रही थी. फिर अचानक से वागले ने एंट्री कहां से मारी. इसका भी किस्सा है. शो को प्रड्यूस किया था एक्ट्रेस दुर्गा खोटे ने. उनकी जान-पहचान में कोई मिस्टर वागले थे. एक दिन वो उन्हीं मिस्टर वागले से कॉल पर बात कर रही थीं. बार-बार उनका नाम ले रही थीं. लक्ष्मण भी वहां मौजूद थे. उन्होंने तपाक से नाम पकड़ लिया. कहा कि शो का नाम वागले के नाम पर होना चाहिए. ये धर्म और जाति जैसी चीज़ों से परे है. एक कॉमन इंडियन जैसा है.

शो में मराठी रंगमच की अदाकारा भारती अचरेकर ने वागले की पत्नी का किरदार निभाया. शो का क्या क्रेज़ था. उसको लेकर उन्होंने एक किस्सा साझा किया. जब एक पार्टी में वो प्रभुदेवा के पास फोटो खिंचवाने गईं. लेकिन प्रभुदेवा खुद उनकी ओर आ रहे थे. प्रभु ने बताया कि वो बचपन से ‘वागले की दुनिया’ देख रहे हैं. और उनके बहुत बड़े फैन हैं. ये था शो का क्रेज़. जब नॉर्थ से लेकर साउथ तक, हर घर में एक साथ देखा जाता था.

शाह रुख वागले की दुनिया 1
‘वागले की दुनिया’ के एक एपिसोड में शाहरुख.

अंजन ने कैरक्टर रोल्स कायम रखते हुए फिल्मों में हीरोज़ के पिता वाले रोल किए. उन्हीं में से एक फिल्म थी ‘कभी हां कभी ना’. जहां उन्होंने शाहरुख के स्ट्रिक्ट पिता का रोल निभाया. लेकिन शाहरुख और अंजन ‘वागले की दुनिया’ पर भी साथ आ चुके थे. एक एपिसोड के लिए. लेकिन असलियत में वहां शाहरुख नहीं होने वाले थे. ‘वागले की दुनिया’ के एक एपिसोड में एक सुंदर से लड़के की ज़रूरत थी. अविनाश वाधवान को अप्रोच किया गया. उन्होंने मना कर दिया. ये कहकर कि रोल छोटा है, ऊपर से सीरियल. मैं नहीं करूंगा. कास्टिंग की बात शाहरुख तक भी पहुंची. उन्होंने आगे से ये रोल करने की इच्छा जताई. शो के डायरेक्टर कुंदन शाह को भी शाहरुख से कोई दिक्कत नहीं थी. और इस तरह शाहरुख शो में दिखाई दिए.


# आजकल कहां हैं Aanjjan Srivastav?

अपने करियर में अंजन अब तक करीब 100 से ज्यादा फिल्में दे चुके हैं. भ्रष्ट नेता, ईमानदार पुलिसवाले से लेकर तमाम तरह के चरित्र किरदार निभा चुके हैं. ‘ये जो है ज़िंदगी’ और ‘नुक्कड़’ से शुरू हुआ उनका टीवी का सफर भी आजतक जारी है. 2012 में ‘वागले की दुनिया’ फिर टीवी पर लौटा था. जिसके कुछ समय बाद अंजन ने कहा कि वो टीवी से दूर होना चाहते हैं. गैर हिंदी सिनेमा में हो रहे कमाल के काम पर ध्यान देना चाहते हैं. उनके गैर हिंदी प्रोजेक्ट्स में कौन सी फिल्में और सीरीज़ शामिल होंगी, ये देखने लायक होगा. बाकी 2021 में ‘वागले की दुनिया’ को फिर से रिबूट किया गया है. जहां कहानी अब ओरिजिनल किरदारों के आगे वाली जनरेशन पर फोकस करती है.


वीडियो: जब ‘मुन्नाभाई MBBS’ के डॉक्टर रुस्तम पावरी को शाहरुख की दोस्ती काम नहीं आई

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