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आगरा का नाम बदलाया तो नरेंद्र मोदी से आगे निकल जाएंगे योगी

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ख़बर मिली कि यूपी में एक शहर का नाम बदलने वाला है. एक सेकेंड को लगा, शायद एकाध साल पुरानी ख़बर हो, किसी ने फेसबुक मेमोरीज में देखकर शेयर कर दी हो. पर पता लगा, नहीं! सूत्र बताए हैं. कह रहे हैं डॉ. अंबेडकर यूनिवर्सिटी वालों को शोध और साक्ष्य खोजने में लगाया जाएगा.

पहले इंसान सूत्रों की बात सुन सोचता था, अफवाह होगी. खंडन हो जाएगा. लेकिन अब वो बात नहीं है. इस बीच मेरा सूत्रों पर भरोसा बढ़ा है. एक्सपर्टों के व्यवसाय में आर्थिक सुस्ती आई है और सूत्र सही निकल जाते हैं. झूठ क्या कहूं, मैंने तो देखा है व्हाट्सऐप फॉरवर्ड में आ रही लिस्ट के हिसाब से सरकार फैसले ले लेती है. समझ नहीं आता, सरकारी फैसले लीक हो रहे हैं या सरकार भी व्हाट्सऐप वाला मैसेज पढ़कर डिसीजन लेने लग गई है. किसी रोज़ ऐसा होगा कि मैं व्हाट्सऐप पर मैसेज घुमाऊंगा कि कॉलेज चौराहा में सरकार बाईं की बजाय दाईं तरफ से खुदाई शुरू कराने वाली है और एकाध दिन बाद नरक निगम को ऊपर से वैसा ही आदेश भी आ जाएगा.

खैर, विरोध करने वालों को क्या कहें, वो तो ये भी गिना देते हैं कि नोटबंदी जैसे पुनीत काम का कोई फायदा नहीं हुआ. ऐसे ही लोग इस बार भी एक्टिव हुए. कहने लगे ‘नाम बदलने से क्या होगा.’ हमने भी टीवी डिबेट के एंकरों वाला सस्ता पंच मारा, ‘कुछ नहीं होगा तो तुम्हारा पेट काहे पिरा रहा है. हें हें हें.’ विरोधकर्ताओं को भले इस काम में भी बुराई नज़र आ रही हो. लेकिन इस मास्टरस्ट्रोक के फायदे ही फायदे हैं.

1. सरकार पहले तो नाम में कन्फ्यूज़ कर देगी. लोग तय ही नहीं कर पा रहे, नाम बदलकर क्या होने की बात चल रही है? अग्रवन है, अग्रवान है, अग्रावन है, आग्रावान या आगरावन है. ऐसे में नागरिकों का सर्वांगीण विकास होता है. दिमाग चुस्त रहता है. ये मेंटल हेल्थ की बड़ी बात चल रही है आजकल. सरकार ऐसी कवायद से दिमाग को दौड़ाकर स्वस्थ रखने में लगी है. ऐसे में फायदा ये भी होगा कि उधर किसी ने कहा नाम बदलकर अग्रवन मत कीजिए, इधर सरकार कहेगी, ठीक. न आपका न मेरा बहन जी. आगरावन कर लेते हैं. इससे कम में नहीं होगा.

अब किसका नाम बदलूं, ऐसा कुछ बिलकुल नहीं सोचते योगी आदित्यनाथ
अब किसका नाम बदलूं, ऐसा कुछ बिलकुल नहीं सोचते योगी आदित्यनाथ

2. ये कदम दिखाता है कि सरकार अपडेट हुई है. अगर वो अग्रवन जैसे नाम रख रही है यानी उसने ‘देश के नंबर वन आरजे’, ‘देश के नंबर वन रेडियो चैनल’ और ‘देश के नंबर वन टीवी चैनल’ होने का दावा करने वालों से बहुत कुछ सीखा है. अब वो शहर के आगे वन लगा देगी. जो पन होगा.

3. सरकार के इस फैसले से आगे भी नाम बदलने में आसानी रहेगी. अभी आगरा-वन बनेगा, फिर आगरा-टू, आगरा-थ्री जैसे नाम रखने में भी सहूलियत होगी. इसके अलावा सरकार ईको-फ्रेंडली भी कहलाएगी. वो कह सकेगी, हमने ‘वनों’ को बढ़ावा दिया. हें हें हें (यहां पर हंसना है!)

4. इससे रोज़गार भी बढ़ेगा. शुरुआत होगी पकौड़े के ठेलों से. मतलब पकौड़े के ठेले पर रोज़गार नहीं बढ़ेंगे. पकौड़ों के ठेले पर लिखा शहर का नाम बदलाएगा. रंगाई-पुताई वालों को काम मिलेगा. वो बस स्टेशन, सरकारी दफ्तर, रेलवे स्टेशन, पते वाले बोर्ड्स पर, दुकानों के नाम, नए शहर के साथ लिखेंगे इस तरह ये रोज़गार बढ़ाने के मामले में मास्टरस्ट्रोक साबित हो जाएगा. देश की आर्थिक मंदी सॉरी आर्थिक सुस्ती भी पुतर जाएगी. इस तरह इस एक ही कदम से योगी आदित्यनाथ, मंदी के इलाज के मामले में मोदी से आगे निकल जाएंगे.

आगे निकल आए हम वो पीछे रह गए
आगे निकल आए हम वो पीछे रह गए

 

पकौड़े की बात चली तो एक फन फैक्ट याद आया, जिस जगह से पकौड़े से रोज़गार वाली बात पहली बार चली, वो खुद के ऑफिस के आसपास कोई ठेला लगने ही नहीं देते. पुलिस को ट्वीट कर देते हैं. मैं नहीं कह रहा, मेरे सूत्र ने व्हाट्सऐप पर मैसेज किया था.

5. इस कदम से देश में टूरिज्म बढ़ेगा. अभी आगरा का नाम बदलाएगा, फिर अपना कोई भाई आएगा कि लगे हाथ ताज महल को भी तेजोमहालय कर देते हैं. इससे विदेशी मुद्रा का संचार होगा. विदेश में भी हैशटैग वांडरलस्ट के मारे बैठे हैं. उन्हें पता लगेगा, भारत में कोई अग्रवन नाम की जगह है, जहां तेजोमहालय नाम का बड़ा प्राचीन मंदिर है, तो वो भागे-भागे निर्वाना की खोज में मटर माला और कैप्री पहन यहां आएंगे. आने पर पता चलेगा, ये नई जगह नहीं है, बस F5 दबा के पेज ही रीफ्रेश हुआ है. लेकिन तब तक बड़ी देर हो चुकी होगी. डॉलर अपनी मुट्ठी में होंगे. विदेशियों में जहाजों से आ-आकर हमें लूटा है. योगी सरकार के इस फैसले के बाद हम बदला लेने की स्थिति में आ जाएंगे. बुला के लूटेंगे.

खुद परवेज़ मुशर्रफ दोबारा आगरा आएं तो हो सकते हैं कन्फ्यूज
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6. एक फायदा यूनिवर्सिटियों का भी है. अभी बेचारी सरकार पर यूनिवर्सिटियों विरोधी होने के इल्ज़ाम लगते हैं. यही इल्ज़ाम अबोध पुलिस वालों पर भी लगते हैं. हमने देखा कि मासूम पुलिस वाले कैसे वकीलों के समय पर ‘अम्मा देखि ले ई हमका गभुआर का मारत हां’ वाले मोड में थे. फिर हमने ये भी देखा कि कैसे जेएनयू के बच्चे जाकर खुद सिर मार-मारकर पुलिस वालों के हाथों-बूटों चोटिल हो रहे थे, साथ ही पुलिस वालों को आतंकित भी कर रहे थे. अब सरकार नाम बदलने के मामले में यूनिवर्सिटी से मदद मांग रही है. इनका सिर्फ सोंटा सोट का रिश्ता था. वो शोध के रिश्ते में बदल रहा है. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से डेढ़ जीबी इंटरनेट के सहारे चिपधारी प्रोफ़ेसर के सानिध्य में पीएचडी करता छात्र भी ये देख पा रहा है कि सारी यूनिवर्सिटीज में टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले नहीं हैं, कुछ ऐसे भी हैं. जो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ने में यकीन रखते हैं.

और मान लीजिए, सूत्र गलत निकले, ख़बर में दम नहीं निकला. सरकार का ऐसा प्लान न हुआ तो. तो हम सरकार से कहेंगे कि इत्ते फायदे हैं. देश का इत्ता भला है. आप नाम बदलेंगे कैसे नहीं, देशद्रोही हैं क्या? भेजें पड़ोसी देश अभी.

वैसे जाते-जाते एक बात और भी याद आई, ये शहर के नाम का जो होगा, सो. ये आगरा के मशहूर पंछी पेठे पर भी सरकार कोई फैसला लेगी क्या? नहीं. इसलिए पूछ रहे हैं कि इत्ते सारे पंछी पेठे खुल गए हैं कि असली कौन है समझ ही नहीं आता. लगे हाथ सरकार उसका भी कुछ नाम-वाम बदलवा दे.

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