स्मार्टफोन शब्द पढ़ते ही आमतौर पर हमारे दिमाग में चंद नाम कुलबुलाते हैं. उदाहरण के लिए Apple, Samsung, Google, Vivo, Xiaomi या कुछ और नाम. मोटा-माटी उतने ही नाम याद आते हैं जो उंगली पर गिने जा सकें. मगर हकीकत इसके एकदम उलट है. मार्केट में तकरीबन 40 स्मार्टफोन मेकर्स डेरा डाले हुए हैं. महीने तो दूर हर हफ्ते नए फोन लॉन्च होते हैं. कई बार तो एक दिन में कई कंपनियों के डिवाइस बाजार का दरवाजा खटखटाते हैं. नतीजा, गला फाड़ प्रतिस्पर्धा. इसी चक्कर में होते हैं कई दावे और वादे (fake smartphone features) जो आगे चलकर कभी पूरे नहीं होते.
स्मार्टफोन के ये फेक फीचर्स जान लिए तो कंपनियों की टोपी उन्हीं को पहना आएंगे
आज स्मार्टफोन कंपनियों के ऐसे फीचर्स की बात जिनके बारे में ढिंढोरा पीट-पीट कर बताया जाता है. इंडस्ट्री फर्स्ट, सेगमेंट फर्स्ट जैसे नाम का सहारा लेकर इन फीचर्स की बात की जाती है. बातों का झुनझुना पकड़ाया जाता है जो कभी बजता नहीं. मेकर्स तो लॉन्च करके निकल लेते हैं मगर जेब आपकी कटती है.

आज स्मार्टफोन कंपनियों के ऐसे ही फीचर्स की बात जिनके बारे में ढिंढोरा पीटकर बताया जाता है. इंडस्ट्री फर्स्ट, सेगमेंट फर्स्ट जैसे नाम का सहारा लेकर इन फीचर्स की बात की जाती है. बातों का झुनझुना पकड़ाया जाता है जो कभी बजता नहीं. मेकर्स तो लॉन्च करके निकल लेते हैं, मगर जेब आपकी कटती है. इसलिए इनके बारे में जान लीजिए और फिर समझकर निर्णय लीजिए.
रैम और वर्चुअल रैममिडरेंज स्मार्टफोन और यहां तक कि अपर मिडरेज सेगमेंट में डबल रैम वाला झुनझुना अक्सर ही देखने को मिलता है. 12 जीबी + 12 जीबी रैम जिसमें बाद वाले 12 जीबी के आगे वर्चुअल रैम लिखा होता है. अरे भाई रैम एक प्रोडक्ट है असल का. इसमें वर्चुअल मतलब आभासी का क्या काम. यही वो टोपी है जो हमें पहनाई जाती है. ये जो वर्चुअल रैम है वो और कुछ नहीं बल्कि स्टोरेज का हिस्सा है. स्टोरेज में से 12 जीबी लपक लिया और कह दिया कि 24 जीबी हो गया. इससे फोन की परफ़ॉर्मेंस में कोई फर्क नहीं पड़ता. पड़ोसी से खाट उधार लेने से अच्छी नींद नहीं आने वाली.
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Smartphones में आजकल Peak Brightness को खूब बढ़ाकर बेचा जा रहा है. लेकिन क्या असल में जितना दावा किया जाता है उतनी ब्राइटनेस वाकई में मिलती भी है? फ़्लैगशिप डिवाइस से लेकर मिडरेंज तक इस फीचर के बारे में खूब बोला जाता है. पिछले कुछ महीनों में जितने भी नए स्मार्टफोन लॉन्च हुए हैं, सभी ने इस फीचर को खूब हाईलाइट किया है. 2,000 nits, 2,500 nits, और 4,500 nits. इसको मापते हैं nits में. किसी भी प्रोडक्ट, जिसमें स्क्रीन लगी है मसलन स्मार्टफोन, टीवी, लैपटॉप या कोई और प्रोडक्ट, उसका डिस्प्ले कितना चमकदार होगा ये nits में मापा जाता है. ये जितना ज्यादा होगा डिस्प्ले उतना ब्राइट होगा.
आसान गणित के लिए एक मोमबत्ती जितने स्क्वायर मीटर एरिया में चमक बिखेरी, उसको 1 nits कहेंगे. मतलब, अगर स्मार्टफोन 1000 nits का दावा करता है तो 1000 मोमबत्ती जितनी रोशनी. लेकिन स्मार्टफोन में इसके साथ जोड़ा जाता है एक शब्द- Peak. यही है वो झुनझुना. एकदम वैसे ही जैसे सेल के लिए कंपनियां लिख देती हैं UPTO. मतलब UPTO 50% ऑफ या UPTO 80% ऑफ.
अब ये हम सभी को पता है कि ऐसा लिखने का मतलब है कि 80 फीसदी तक छूट है, लेकिन कितने प्रोडक्ट्स पर वो साफ नहीं होता. जो आप पूछने लगे तो कोई एक प्रोडक्ट दिखा दिया जाएगा जिसमें 80 फीसदी की छूट होगी. लेकिन वो एक से ज्यादा शायद ही नजर आए.

अभी हाल ही में एक फोन लॉन्च हुआ है. जिसमें पीक ब्राइटनेस का नगाड़ा कुछ ज्यादा ही बजाया गया. लेकिन जब कई एक्सपर्ट ने इसको मीटर लेकर चेक किया तो ब्राइटनेस 1600 nits से ज्यादा नहीं आई. हालांकि, दावा इससे दोगुने से भी ज्यादा का था.
ऑपरेटिंग सिस्टम 'नो' अपडेटइस मामले में स्मार्टफोन मेकर्स जो कर रहे हैं वो एक किस्म से ठगी है. लॉन्च के समय तीन साल, चार साल के सॉफ्टवेयर अपडेट का वादा करती हैं मगर अगले साल का अपडेट भी मिल जाए तो बड़ी बात है. गूगल और सैमसंग जैसी कंपनियां 7 साल का अपडेट देने की बात कर रहीं और दे भी रहीं. एक कंपनी जो भारतीय बाजार में कई सालों तक नंबर वन पर काबिज रही, उसका हाल तो बहुत ही बुरा है. अपने स्मार्टफोन में अभी तक एंड्रॉयड 14 नहीं दे पाई है जो पिछले साल अगस्त में आ गया था. हालत ये है कि एंड्रॉयड 15 अगले महीने तक दस्तक दे चुका होगा. स्टॉक एंड्रॉयड का दंभ भरने वाली एक और कंपनी तो इस मामले में कुछ ज्यादा ही बदनाम है.
फोन कोई सब्जी तरकारी तो है नहीं जो आज बनाई और खाई. लोग डिवाइस लंबे समय तक इस्तेमाल करते हैं. अच्छा खासा पैसा लगता है. ऐसे में उसके लंबे समय तक चलने के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट बेहद जरूरी है. कमाल की बात ये है कि एंड्रॉयड बनाने वाला गूगल इसमें कोई झोल नहीं करता.
वैसे तो काम नहीं आने वाले, बहुत कम काम आने वाले, निखट्टे फीचर्स की लिस्ट बहुत लंबी है, मगर ये तीन का बीन कंपनियां खूब बजाती हैं.
आपने इनकी धुन पर नहीं नाचना है.
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