पिछले कुछ दिनों से QR कोड (QR Code) बहुत चर्चा में है. हालांकि UPI के जमाने में इसका इस्तेमाल हम दिनभर ही करते हैं मगर चर्चा नहीं. लेकिन UPSC की 301वीं और 113वीं रैंक (upsc 301 rank controversy) ने और CBSE के मैथ्स पेपर ने इसे चर्चा में ला दिया. UPSC की 301वीं रैंक को लेकर आकांक्षा सिंह नाम की दो कैंडिडेट्स ने दावा किया था. दोनों ने ही अपने एडमिट कार्ड में क्यूआर कोड का जिक्र किया था. CBSE की परीक्षा के प्रश्नपत्र में भी एक क्यूआर कोड है, जिसे स्कैन करेंगे तो सीधे यूट्यूब पर पहुंच जाएंगे. इस क्यूआर कोड को स्कैन करने से रिक एस्टली के गाने 'नेवर गोना गिव यू अप' का म्यूजिक वीडियो खुल जा रहा है.
QR Code कैसे बनता है? इसमें जानकारी कैसे डाली जाती है? घर बैठे आप भी बना सकते हैं
QR Code खूब चर्चा में है. कभी यूपीएससी की 301वीं और 113वीं रैंक को लेकर तो कभी CBSC के पेपर में यूट्यूब ओपन हो जाने को लेकर. ऐसे में जानना जरूरी है कि आखिर क्यूआर कोड के अंदर जानकारी जाती कैसे है. क्या इस जानकारी से छेड़छाड़ संभव है.


ऐसे में एक सवाल हमारे दिमाग में भी स्कैन हुआ. आखिर क्यूआर कोड के अंदर जानकारी जाती कैसे है. क्या इस जानकारी से छेड़छाड़ संभव है. पता करते हैं लेकिन पहले जरा ये जान लेते हैं कि क्यूआर कोड बना कैसे.
QR कोड बना कैसेसाल 1994 में DENSO WAVE नाम की कंपनी ने सबसे पहले क्यूआर कोड का इस्तेमाल करना चालू किया. DENSO WAVE मशहूर जापानी कार निर्माता टोयोटा की एक सहायक कंपनी है. हालांकि पहले-पहल क्यूआर कोड का टोयोटा से कोई सीधा कनेक्शन नहीं था, लेकिन आगे चलकर ये कनेक्शन जुड़ा और क्यूआर कोड को लोकप्रिय बनाने में इसका अहम रोल रहा. पहले कोड की कहानी जानते हैं.
क्यूआर कोड मतलब कंप्यूटरी भाषा में लिखे गए Machine Readable Label. इनके अंदर बहुत सारी जानकारी डाली जा सकती है और इनको स्कैन करने के लिए किसी विशेष मशीन की भी जरूरत नहीं होती. ये सब हुआ साल 1994 में. लेकिन DENSO WAVE काफी पहले से ही बार कोड बना रही थी. बार कोड काम का तो था लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत सीमित था. एक तो उसको स्कैन करने के लिए एकदम सटीक एंगल की जरूरत पड़ती थी, दूसरा बार कोड सिर्फ 20 अल्फान्यूमेरिक कैरेक्टर (जानकारी) स्टोर कर सकता था. ऐसे में पब्लिक डिमांड पर कंपनी के डेवलपमेंट हेड Masahiro Hara ने क्यूआर कोड बनाया. असल में कहें तो रिसर्च करके बार कोड में बदलाव किए.

जहां बार कोड सिर्फ एक डायरेक्शन (One D) में काम करता था वहीं क्यूआर कोड दो डायरेक्शन (2D) में काम कर सकता था. कोड को बहुत जल्दी पढ़ने के लिए इसमें तीन कोनों पर जरूरी जानकारी डाली गई. कोड में ब्लैक और व्हाइट डॉटस के बैलेंस को एकदम सटीक रखने के लिए 1:1:3:1:1 का अनुपात चुना गया. ऐसा करने से कोड को लगभग 360 डिग्री का एरिया कवर करने के लिए मिला. इसके साथ इसमें 20 की जगह 7 हजार जानकारियां भी एक साथ स्टोर हो सकती थीं.
कोड की डिजाइन की वजह से तीनों कोनों पर मौजूद स्क्वेर, स्कैन करने वाली डिवाइस को संकेत देते हैं कि कोड सीधा किधर से है भले डिवाइस आड़ा-तिरछा क्यों ना हो. आज तो तकनीक इतनी आगे आ चुकी है कि क्यूआर कोड भी कई किस्म के हो गए हैं जैसे माइक्रो क्यूआर, फ्रेम क्यूआर, आदि. लेकिन बेसिक आज भी वही है.
इसके लिए आपको मार्केट में कई सारे ऐप्स और वेबसाइट उपलब्ध हैं. ज्यादातर मुफ़्त हैं और काम भी करते हैं. जैसे Adobe का क्यूआर कोड जनरेटर. हमने अपने टेक्नॉलिजी पेज का यूआरएल यहां पेस्ट किया और तैयार हो गया क्यूआर कोड. आप इसको अपने हिसाब से एडिट भी कर सकते हैं. ना-ना वैसा वाला एडिट नहीं जैसा आप समझ रहे. यहां एडिट से मतलब पहली बार क्यूआर कोड बनाने से है.

अगर बने हुए क्यूआर कोड से कोई छेड़छाड़ की तो वो खराब हो जाएगा. आप कहोगे तो कैसे पिछले दिनों असली क्यूआर की जगह नकली क्यूआर कोड लगाकर फ्रॉड हुए थे. दरअसल उसमें पुराने कोड के ऊपर नया चिपकाया गया था. क्यूआर कोड से छेड़छाड़ नहीं होती. वो यूनिक होता है. तभी तो हर किसी के पास अलग-अलग मिलता है.
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