'वो एक जबरदस्त, यादगार दौरा था. मैं पहली बार इसी टूर पर वसीम अकरम से मिला था, जो मेरे आइडल थे. क्रिकेट में मेरे दो आइडल थे- कपिल देव और वसीम अकरम. कपिल देव, ऑलराउंडर. बेस्ट लीडर और गज़ब की स्विंग कराते थे. इंडिया में खेलना आसान नहीं था. देखिए पाकिस्तान में फिर भी आपके पास कूकाबूरा बॉल रहती है. एसजी का बॉल इतना तेज नहीं निकलता था. अभी अलग बात है, इसकी सीम बढ़ गई है, तो पेस बोलर्स की मदद करती है. लेकिन पहले ऐसा नहीं था. उस जमाने में कपिल पाजी ने अपना जो नाम बनाया, वो काबिलेतारीफ है. उनको मैं काफी फॉलो करता था. फिर वसीम अकरम भी थे. वहां उनसे मिला, तो बहुत खुश था मैं. बहुत सी पॉजिटिव बातें भी की. ऑस्ट्रेलिया का टूर बड़ा टफ रहता है.दादा के बारे में बात करते हुए इरफान ने टूर के आखिरी दिनों को याद किया. उन्होंने कहा,
दादा ने टूर के लास्ट दिनों में कहा था कि यार इरफान तुझे शायद नहीं पता होगा, लेकिन मैं ये तुझे बोलना चाहता हूं- इरफान, मैं नहीं चाहता था कि इस टूर पर तू आए. सेलेक्शन में मैंने मना कर दिया था. इसलिए नहीं कि मैंने तेरी बोलिंग देखी थी. बल्कि इसलिए क्योंकि मैं ऑस्ट्रेलिया के एक मुश्किल दौरे पर एक ऐसे खिलाड़ी को नहीं लाना चाहता था, जो 19 साल का हो. ऑस्ट्रेलिया का दौरा बड़ा मुश्किल है. लेकिन जब मैंने तुझे देखा, तो मैं एकदम श्योर था कि तू अच्छा करेगा. इसीलिए मैंने तुझे इतना सपोर्ट किया.'
इस टूर की बात करें, तो इरफान ने दो टेस्ट मैचों में चार विकेट निकाले थे. लेकिन असली कमाल उन्होंने त्रिकोणीय वनडे सीरीज में किया. यहां इरफान ने 10 मैचों में 16 विकेट लिए. वह इस सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले बोलर थे.'इसके बाद दादा ने खूब सपोर्ट किया. दादा की एक बात बड़ी अच्छी थी कि अगर कोई लड़का उनको अच्छा लगता था, तो वो खूब सपोर्ट करते थे. उन्हें किसी और बात से फर्क नहीं पड़ता था. अगर उन्हें लगे कि लड़का टीम के लिए जान लगा रहा हो, तो वह उसे फुल सपोर्ट करते थे. दादा को फिर इससे फर्क नहीं पड़ता था कि ये कौन है या कहां से है.'
चहल और कुलदीप के लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल करना युवराज को भारी पड़ गया
























