एक नया नया बॉलर आया था अपनी टीम में. उसका पहला मैच देख रहा था. पाकिस्तान के खिलाफ़. पहला ही ओवर फेंकने को मिला. अपने रन-अप पे खड़ा हुआ तो लगा कुम्बले के रन-अप की नक़ल उतारना चाह रहा है. फ़ास्ट बॉलर जो गेंद फेंकने से पहले आधा घंटे लम्बा रन-अप न ले तो बॉलर काहे का? फिर उसने गेंद फेंकनी शुरू करीं. वाह! ऑफ स्टम्प से थोड़ा सा बाहर या सीधे स्टम्प पे ही. एक के बाद एक. हल्की सी स्विंग मिलती हुई. बाहर की ओर. एक गेंद पिच पे पड़ के स्किड भी हुई. छः गेंदों में एक भी रन नहीं. पहला ओवर मेडेन. दुनिया के सबसे ऊंचे लेवल पर क्रिकेट खेलते हुए जीवन का पहला ओवर मेडेन. किसी बॉलर को और क्या चाहिए? ये था प्रवीण कुमार. मालूम चला मेरठ का है. पहलवानों के घर से आता है. घर में सब अखाड़े में कूदते थे. ये मैदान में कूद पड़ा. घरवालों की मर्जी के खिलाफ़. खूब खेला. इंडिया की टीम के लिए. अपने पहले मैच के छः महीनों के भीतर उसे सबसे तगड़ी परीक्षा के लिए भेजा जाता है. अभी तक उसने खुद को एक स्विंग बॉलर के रूप में स्थापित कर लिया था. लेकिन आगे ऑस्ट्रेलिया का टूर मुंह बाए खड़ा था. टूर कठिन था. ऑस्ट्रेलिया का टूर कभी आसन भी नहीं होता. वहां आपको तेज़ पिचें मिलती हैं. गेंद बल्ले पे आती है. प्रवीण कुमार में ब्रेट ली जितनी तेज़ी कभी थी ही नहीं. लेकिन उनमें स्विंग थी. और एक ही जगह गेंद खिलाने की आदत. स्विंग उनका मुख्य हथियार था. लेकिन टूर पे स्विंग नहीं मिल रही थी. प्रवीण कुमार ने कहा कि उन्हें नयी गेंद मिले तो स्विंग भी वापस आ जाएगी. इंडिया फाइनल में पहुंची. पहले फाइनल में नयी गेंद थमाई गयी. पहले ही स्पेल में गिलक्रिस्ट और पोंटिंग. ऑस्ट्रेलियन बैटिंग के दो बड़े खम्भे ढहाए जा चुके थे. ऑस्ट्रेलिया जो 300 के स्कोर को टारगेट कर रहा था, मात्र 239 बना सका. इंडिया पहला फाइनल जीत गया. दो ही दिन बाद दूसरे फाइनल में फिर से गिलक्रिस्ट और पोंटिंग प्रवीण कुमार के ही हत्थे चढ़े. इस बार दो शिकार और - माइकल क्लार्क और ब्रेट ली. यानी खम्भे भी उखाड़े और छत भी गिरा दी. इंडिया दूसरा फाइनल भी जीता. दोनों ही मैचों में सितारा बन चमके सचिन. 117 और 91 का स्कोर बनाया. लेकिन प्रवीण कुमार अपनी छाप छोड़ चुका था. धोनी की आंखों में चढ़ चुका था.

अब नयी गेंद का मतलब होने लगा प्रवीण कुमार. और प्रवीण कुमार का मतलब होने लगा था नयी गेंद के साथ स्विंग. प्रवीण कुमार को लोग अब जानने लगे थे. आईपीएल में उसकी हनक चलती थी. बड़े-बड़े प्लेयर्स से ऐसे ही भिड़ जाता था. खैर, फ़ास्ट बॉलर्स की ये आदत ही होती है. ऐसा न हो तो काहे का फ़ास्ट बॉलर. अग्रेशन तो मांगता है बॉस! लेकिन उसी वक़्त दिमाग में आता है कि ये कैसा अग्रेशन कि आप मैदान पर अम्पायर से ही भिड़ पड़ें? सिर्फ़ इसलिए क्यूंकि उसने आपके मन मुताबिक़ डिसीज़न नहीं दिया था. 2011 में ट्रेंट ब्रिज में खेले गए टेस्ट मैच में प्रवीण कुमार पर 20% फाइन लगा. अम्पायर से ही भिड़ पड़े. एक एलबीडब्लू के लिए. इसके बाद इसी टेस्ट सीरीज़ में प्रवीण कुमार बाहर हो जाते हैं. इंजरी. अगले ऑस्ट्रेलियन टूर के लिए भी इंजर्ड. इंजरी से बाहर आने के बाद भी उसे टीम में नहीं लिया जाता है. प्रवीण कुमार अब फ्रस्ट्रेट हो रहा था. बहुत कुछ ऐसा था जो उसकी चाहत के मुताबिक़ नहीं हो रहा था. टीम इंडिया के लिए न खेल पाना जिसमें मुख्य वजह थी. इसी बीच ओएनजीसी के लिए कॉर्पोरेट ट्रॉफी में खेलते हुए इन्कम टैक्स की ओर से खेलने वाले एक बैट्समैन को उन्होंने मैदान पर ही गालियां देनी शुरू कर दीं. यहां प्रवीण कुमार पर एक बड़ी मार पड़ी. उसे न सिर्फ सस्पेंशन मिला बल्कि साथ ही इंडिया के लिए कमबैक की एकमात्र राह भी बंद हो गयी. साथ ही मैच रेफ़री की रिपोर्ट के मुताबिक़ 'प्रवीण कुमार प्रोफ़ेशनल क्रिकेट खेलने के लिए अनफिट थे'. ये किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी मार कही जा सकती है. इसका मतलब साफ़ था. प्रवीण कुमार अब क्रिकेट के मैदान पर नहीं दिखेगा. कब तक? जब तक वो वाला प्रवीण कुमार वापस नहीं आ जाता जिसपर धोनी ने भरोसा करके ऑस्ट्रेलिया में नयी गेंद सौंप दी थी. मेरठ की सड़कों पर एक डॉक्टर से खुलेआम हाथापाई करने वाले प्रवीण कुमार की क्रिकेट के मैदान पर कोई ज़रुरत नहीं थी. प्रवीण कुमार की परफॉरमेंस एक साइन वेव जैसी मालूम देती है. उन्होंने शुरुआत एक श्रृंग के साथ की मगर पहुंच चले गर्त पर. हाल फिलहाल में वो रोड टु रिडेम्पशन पर हैं. उन्हें इस सिलसिले में पहली बार सहारा मिला रोहित शर्मा का. मुंबई इंडियन्स में ज़हीर खान की इंजरी के बाद प्रवीण कुमार को बुलाया गया. प्रवीण ने मुंबई से मात्र तीन मैच खेले. लेकिन उसने बहुत हद तक एक बुझते दिए में कुछ चम्मच तेल उड़ेल दिया था. अभी उनके खेवनहार बने हैं सुरेश रैना. पिछले साल प्रवीण कुमार ने आईपीएल में 12 मैचों में सात विकेट लिए. ऐवरेज 47 का. इकॉनमी 9.13 की. पिछले साल वो पंजाब से खेल रहे थे. इस साल प्रवीण को गुजरात ने 50 लाख में खरीदा. कुछ तो होगा ही जो ऐसे पास्ट को अपने कन्धों पर लेकर घूम रहा प्लेयर 3.5 लाख की बेस वैल्यू से 50 लाख की कीमत में बिका. यहां पर रैना आते हैं. 2015-16 के सीज़न में सैयद मुश्ताक़ अली ट्रॉफी में रैना खेल रहे थे. वो ऑस्ट्रेलिया के अपने टूर से पहले पूरी तरह तैयार हो जाना चाहते थे. उनके साथ खेल रहे थे प्रवीण कुमार. यहीं से उन्होंने गुजरात फ्रेंचाइज़ी के लिए प्लेयर्स को पिक किया.

2016 आईपीएल में पहले सात मैचों में प्रवीण कुमार एक भी विकेट नहीं ले पाते हैं. लेकिन उन्हें रैना फिर भी खिलाते हैं. दिल्ली के खिलाफ़ क्रिस मॉरिस के कहर से जब गुजरात हारने के कगार पे थे तो मैच का सेकण्ड लास्ट ओवर रैना देते हैं प्रवीण कुमार को. जीतने के लिए दो ओवर में 18 रन चाहिए थे. मॉरिस के फ्लो को देखते हुए लग रहा था कि वो एक ही ओवर में मैच की नैया पार लगा देंगे. लेकिन प्रवीण कुमार उन्नीसवें ओवर में मात्र 4 रन देते हैं. ऐसे क्लोज़ मैचों में उन्नीसवां ओवर रिज़ल्ट के लिए सबसे ज़्यादा ख़ास होता है. प्रवीण ने उसी ओवर में मौके पर चौका मारा. स्पेल खत्म होने पर उनके फिगर थे चार ओवर में 13 रन. कलकत्ता की टीम के खिलाफ़ ओपेनिंग स्पेल में 3 ओवर में मात्र 7 रन और 2 विकेट. इसमें एक ओवर मेडन. ये तीन ओवर बहुत थे मैच के रिज़ल्ट के कांटे को कलकत्ता के खेमे से गुजरात की ओर लाने के लिए. बकौल प्रवीण कुमार, रैना उनपर सिश्वास करते हैं और उनकी कमजोरियों और ताकत को जानते हैं. वो ये भी कहते हैं कि कुछ ऐसे दिन आएंगे जब उन्हें मार पड़ेगी और वो 40 रन खायेंगे. लेकिन कुछ दिन ऐसे भी होंगे जब वो सिर्फ 12 रन देंगे और अपनी टीम को मैच जिताएंगे. ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है. प्रेस कांफ्रेंस में उनसे किसी ने इंडियन टीम में कम-बैक के बारे में पूछा. उस सवाल के जवाब में आये रिएक्शन ने उनके प्रति मेरे पूरे नज़रिए को बदल दिया. मेरी नज़रों में एक सरफ़िरे गुंडे रुपी खिलाड़ी से वो खुद को दोबारा तराशते खिलाड़ी बन चुके थे. सवाल के जवाब में वो हल्का सा मुस्कुराते हैं, नीचे देखते हैं और फिर कहते हैं - "सही बात है." थोड़ा और मुस्कुराते हुए वो आगे बताते हैं - "मेरा हमेशा से एक सिंपल सा फंडा रहा है. मैं अपनी परफॉरमेंस पर ध्यान देता हूं. जो हो रहा है, जो नहीं हो रहा है, इसके बारे में लोग भी बात करते हैं. कि आप कम-बैक करोगे या नहीं. आपको करना चाहिए. अपना काम है मेहनत करना. विकेटें लेनी. टीम को जिताना. जो टीम जीते, उसमें मेरा योगदान रहे. बस मैं उसी चीज़ में खुश हूं. बाकी तो सब हो ही रहा है." बाकी सब के साथ ये भी हो रहा है कि प्रवीण कुमार वापस आ रहे हैं. वो इंडियन टीम में वापस आने से कितनी दूर हैं, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन ये ज़रूर कहा जा सकता है कि नयी बॉल के साथ स्विंग करते हुए प्रवीण को देखने में अब फिर से मज़ा आने लगा है. अब फिर से एक सरफ़िरे की बजाय एक कंजूस गेंदबाज गेंद फेंकने लगा है. बल्लेबाजों के दम पर मैच खेलती टी-20 टीमों को सिंगल के लिए तरसाने वाली अड्डे पर पड़ती गेंदों को देखना, एक नयी एनर्जी से भर रहा है.