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क्या भारत ओलंपिक मेजबानी के लिए तैयार है?

India Open Badminton में कई विदेशी प्लेयर्स एयर क्वालिटी और साफ-सफाई पर सवाल उठा चुके हैं. हालांकि, ये मेजबानी में दिखी नाकामी का एकमात्र उदाहरण नहीं है. यही कारण है कि ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या भारत ओलंपिक मेजबानी के लिए तैयार है?

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प्रणय और लोह के मैच के दौरान पक्षी की बीट को साफ करते मेंटेनेंस स्टाफ. (फोटो-PTI)

जनवरी में दिल्ली की क्या हालत होती है. ये किसी से छ‍िपी नहीं है. यहां रहने वाले हर इंसान को पता है ठंड के साथ ही दिल्ली में आता है प्रदूषण. बार-बार गले का सूखना, सूखी खांसी, सुबह की धुंध, जिसे हटने में समय लग जाता है और जरूरत से ज्यादा भारी हवा. यही कारण है कि इंडिया ओपन 2026 को लेकर उठ रहे सवालों को आरोप के तौर पर देखा जा रहा है. यहां बात सिर्फ बैडमिंटन की नहीं है. ये ओवरऑल इंडियन स्पोर्ट की कहानी है, जहां बार-बार जरूरत को प्लानिंग समझने की गलती की जाती है. इंडिया टुुुडेे की रिपोर्ट में इसी को लेकर सवाल उठाया गया है कि क्या हम ओलंपिक की मेजबानी के लिए तैयार हैं? 

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इंडिया ओपन से उठी पूरी बहस

15 जनवरी को एच एस प्रणय को हराने के बाद सिंगापुर के पूर्व वर्ल्ड चैंपियन लोह कीन यू ने इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में जिस तरह मीड‍िया से खुल कर बात की. वैसा अमूमन विदेशी एथलीट्स सोचते हैं, लेकिन कोई बोलता नहीं है. उनसे जब ये पूछा गया कि यहां की परिस्थि‍ति क्या उनके लिए समस्या थी? इस पर लोह ने संकोच नहीं किया. उन्होंने कहा,

हां, बिल्कुल. किसी के लिए भी यहां खेलना आसान नहीं है. मैं हैरान हूं कि आप (रिपोर्टर्स) ठीक हैं.

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इसके बाद उन्होंने एक ऐसी बात कही, जिसने सवाल उठाने पर घेरने वालों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने आगे कहा,

मैं कम सांस लेता हूं (हंसते हुए). मेरा मतलब है मैं जहां मास्क पहन सकता हूं. मैं पहनने की कोश‍िश करता हूं. इसके अलावा, मैं जितना हो सके अंदर रहने की कोश‍िश करता हूं. इसे लेकर मैं इतना ही कर सकता हूं.

एक ऐसा स्पोर्ट, जो प्लेयर्स को ये स‍िखाता है कि चेहरे पर कैसे इमोशन नहीं आने देना है. लोह ने अपनी बात को दोहराया. उनसे जब ये पूछा गया कि सीजन की शुरुआत में उन्हें कैसा लग रहा था? लोह ने कहा,

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मलेश‍ि‍या में मैं बिल्कुल ठीक था. लेकिन, यहां आने के बाद लग रहा है कि मौसम अच्छा नहीं है.

यानी उनके कहने के तात्पर्य को समझने के लिए किसी डिकोडिंग की जरूरत नहीं है. आप एंड्योरेंस के लिए ट्रेनिंग कर सकते हैं, रिकवरी मैनेज कर सकते हैं और डाइट को अच्छा कर सकते हैं. लेकिन, आप अपने लंग्स को खतरनाक हवा को एक न्यूट्रल चीज़ मानने के लिए तैयार नहीं कर सकते.

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मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए भी चिंता बहुत साफ है. मुंबई के पी. डी. हिंदुजा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर में कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट और एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. लैंसलॉट पिंटो कहते हैं कि ऐसी परिस्थिति में एथलीटों से हाई-इंटेंसिटी वाले खेल में मुकाबला करने के लिए कहना बिल्कुल गलत है. डॉ. पिंटो ने कहा,

इंटेंस स्पोर्ट्स में गहरी सांस लेनी पड़ती है और अक्सर इससे एथलीट हाइपरवेंटिलेट करने लगते हैं. इन दोनों कामों से हवा में मौजूद दूषित पदार्थों के संपर्क में आने का खतरा काफी बढ़ जाता है. इसके शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म दोनों तरह के असर हो सकते हैं. एलीट एथलीट अपनी सेहत बनाए रखने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, और उन्हें खतरनाक हवा की क्वालिटी जैसे बेवजह के जोखिमों में डालना गलत है.

उन्होंने आगे कहा कि इस थ्रेशहोल्ड पर तो बहस भी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने बताया,

मुझे लगता है कि हवा की क्वालिटी को उससे बेहतर बनाने की कोशिश करने की ज़रूरत नहीं है, जो आम लोगों के लिए रेकमेंड की गई है. 50 से कम AQI कम से कम टारगेट होना चाहिए, जो स्वीकार्य होगा.

डेनमार्क के एंडर्स एंटनसन ने दो दिन पहले ही दिल्ली के प्रदूषण का हवाला देते हुए इंडिया ओपन से नाम वापस ले लिया था. उन्होंने दिल्ली के AQI का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया था. इसके बाद उन्हें बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की तरफ से 5000 डॉलर का फाइन भी लगाया गया. लेकिन, टूर्नामेंट से उनका नाम वापस लेना सिर्फ एक ड्रामा नहीं था. इसके बाद डेनमार्क की एक और प्लेयर मिया ब्ल‍िचफेल्ट ने भी वेन्यू की साफ सफाई पर सवाल उठा दिया था. उन्होंने एयर क्वालिटी के साथ-साथ सफाई और फैसिलिटी पर भी सवाल उठाए थे.

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हद तो तब हो गई, जब पक्ष‍ियों की बीट के कारण खेल रोकना पड़ गया. साथ ही दर्शक दीर्घा में भी एक बंदर की तस्वीर काफी वायरल हुई थी. इन घटनाक्रमों ने सब कुछ ठीक है वाले नैरेटिव की भी पोल खोल दी है. सबसे बड़ी बात ये है कि ये सब एक ऐसे वेन्यू पर हुआ, जो अगस्त में वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनश‍िप्स को होस्ट करने वाला है.

BAI का जवाब भी इसे लेकर आ गया है. लेकिन, इसमें होस्टिंग से जुड़ी चिंताओं, खासकर एयर क्वालिटी के बारे में बात करने की जगह बचाव वाला लहजा अपनाया गया है. इंडिया टुडे से बातचीत के दौरान BAI के जेनरल सेक्रेटरी संजय मिश्रा ने कहा,

सफाई की कोई समस्या नहीं है. हम एथलीट्स की चिंताओं को समझते हैं. हम जरूर इसमें सुधार करेंगे. इसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया गया है.

इसी सप्ताह मिश्रा ने विदेश में बैठकर भारत की आलोचना करने वालों को सपोर्ट न करने की चेतावनी दी थी. ये एंटनसन पर उनका सीधा निशाना था. खास बात यह है कि जिन भारतीय खिलाड़ियों ने सार्वजनिक तौर पर बात की. उन्होंने हालात की आलोचना करने से परहेज किया. चिंताओं को कम करके बताया और ज़ोर देकर कहा कि वे उनके लिए "मैनेजेबल" हैं.

BWF ने अपनी तरफ से साफ-सफाई, हाइजीन और जानवरों को कंट्रोल करने से जुड़ी समस्याओं को माना. लेकिन, वेन्यू को 'अपग्रेड' बताते हुए उसका बचाव भी किया. साथ ही ये कन्फर्म किया कि दिल्ली के पास वर्ल्ड चैंपियनशिप की मेज़बानी के अधिकार बने रहेंगे. यही कारण है कि ये अब इंडिया ओपन बैडमिंटन की कहानी नहीं, बल्कि होस्टिंग की कहानी बन गई है.

ऐसे बनेंगे ग्लोबल स्पोर्ट्स पावरहाउस?

भारत के सपने छोटे नहीं हैं. प्लान जाना-पहचाना है: एक ग्लोबल स्पोर्ट्स पावरहाउस बनना. 2036 में ओलंपिक में एक मज़बूत दावेदार बनना. अहमदाबाद को इसके लिए मुख्य शहर के तौर पर पेश किया गया है. देश को 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी के अधिकार भी आधिकारिक तौर पर मिल गए हैं. हालांकि, वो बात अलग है कि दो दशक पहले 2010 में इसके आयोजन से ज्यादा चर्चा घोटालों की हुई थी.

क्या तब से चीजें बदली हैं? जवाब है- हां और न. इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ है. स्टेडियम्स बड़े हो गए हैं. ये चमकदार हो गए हैं. इसकी संख्या भी बढ़ गई है. लेकिन, सिर्फ ‘वर्ल्ड क्लास’ बोल देने से ये वैसे नहीं हो जाएंगे. वर्ल्ड क्लास होस्टिंग के लिए  असल में जरूरत होती है रखरखाव की. साफ-सफाई की. फैन एक्सपीरियंस मायने रखता है. पब्लिक सेफ्टी जरूरी होती है. कॉन्ट्रैक्टिंग पारदर्शी करना होता है. सबसे जरूरी होता है कि आलोचना को राष्ट्रवाद से जोड़े बिना इसे स्वीकार करने की समझदारी होनी चाहिए.

क्या इंडिया ओपन एकमात्र नाकामी है?

अगर इंडिया ओपन एकमात्र ऐसी घटना हो, तब इसे बैड लक कहकर इग्नोर भी किया जा सकता. लेकिन, सच बहुत कड़वा है. पिछले दो सालों में इंडियन स्पोर्ट को लगातार होस्टिंग फेल्यर का सामना करना पड़ा है. ये खेल और शहर से कहीं परे है. ये कोई संयोग नहीं है. ये एक एड‍मिनिस्ट्रेट‍िव क्लचर की समस्या है, जहां सम्मान को तैयारी से ऊपर रखा जाता है.

पिछले सप्ताह ही, ग्रेटर नोएडा में हुए नेशनल बॉक्स‍िंग चैंपियनश‍िप में देरी हो गई थी. क्योंकि रिंग समय से तैयार नहीं हो सके थे. कुछ दिनों के बाद अलग-अलग राज्यों से आए प्लेयर्स को समय से पहले होटल खाली करना पड़ा. इसके कारण नेशनल फाइनल्स की तैयारी कर रहे मुक्केबाजों को 6 डिग्री ठंड में घंटों बाहर खड़ा रहना पड़ा.  

वहीं, दिसंबर 2025 में फुटबॉलर लियोनल मेसी का कोलकाता के सॉल्ट लेक स्टेड‍ियम में कार्यक्रम 20 मिनट ही चल सका. टिकट खरीद कर उन्हें देखने पहुंचे फैन्स ठगा हुआ महसूस करने लगे. गुस्से में उन्होंने सीट फाड़ दी. सामान फेंके. पिच पर घुस गए. इस पूरे घटनाक्रम के बाद मुख्य आयोजक को हिरासत में लिया गया. मुख्यमंत्री ने माफी मांगी. लेकिन, तब तक भारत ग्लोबल पंचलाइन बन चुका था.

सेलिब्रिटी के चकाचौंध को हटा भी दें तो सबक साफ है. भीड़ को मैनेज करना, सच्ची बातचीत और पैसे देकर देखने वाले दर्शकों का सम्मान करना कोई ऑप्शनल चीज़ें नहीं हैं. यही तो इवेंट हैं. आपको पिछले साल RCB के IPL विक्ट्री सेलिब्रेशन में मची भगदड़ याद ही होगी. बेंगलुरु में हुई ये घटना इसका प्रमाण है कि जब बिना प्लानिंग और कंट्रोल के आयोजन होते हैं तो उसका क्या हो सकता है.

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इसमें एक और पहलू है. वो है सुरक्षा. 2025 वीमेंस क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान दो ऑस्ट्रेलियन क्रिकेटर्स को इंदौर में पहले किसी ने बाइक पर फॉलो किया. फिर गलत तरीके से हाथ लगाया. आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन, इस घटना ने इंटरनेशनल एथलीट्स को दिए गए सुरक्षा घेरे में कमी को भी उजागर कर दिया.  

और हवा तो है ही. 2017 में श्रीलंकाई प्लेयर्स ने दिल्ली में सांस लेने में दिक्कत की श‍िकातय की थी. कुछ ने मास्क पहने थे. कुछ को कथित तौर पर उल्टी हुई थी. अब 8 साल बाद भी, ज़्यादा कुछ नहीं बदला है. नवंबर 2025 में, लखनऊ में भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच चौथा T20I मैच घने कोहरे और खतरनाक हवा की क्वालिटी के कारण टॉस के बिना ही रद्द कर दिया गया था.

यानी खेल अलग हों. शहर अलग हों. नाकामी वही है.

इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, ये है मूूल समस्या 

एक चीज जो लोगों के नजर में शायद ही आती हो. वह है खेल शुरू होने से पहले क्या होता है? एक खेल राष्ट्र की असली परीक्षा तैयारी के उन घंटों में होती है, जो टीवी पर नहीं दिखाया जाता. अबु धाबी जूजित्सू प्रो (AJP) के इंडिया हेड सिद्धार्थ सिंह के मामले को ही देख लीजिए. 2024 में उन्होंने दिल्ली के केडी जाधव स्टेडियम में इंटरनशेनल इवेंट कराया था. लेकिन, उन्हें जिस परिस्थ‍िति का सामना करना पड़ा, उसे वह संस्थागत अराजकता बताते हैं.

परमिशन महीनों पहले ले ली गई थी. वेन्यू की कीमत भी अदा कर दी गई थी. लेकिन, इवेंट से कुछ दिन पहले, अचानक 2 लाख रुपये का बिजली का "सिक्योरिटी डिपॉज़िट" सामने आ गया. एंट्री महज 24 घंटे के लिए मिली. सेटअप टीम जब आधी रात को पहुंची, तो पिछले इवेंट का सामान हटाया नहीं गया था. वहां सिर्फ दो स्टाफ मौजूद थे.

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इसके बाद मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया : फ़र्नीचर के बारे में नए नियम. जबरदस्ती कारपेट किराए पर लेना. प्राइवेट क्लीनर होने के बावजूद गंदे वॉशरूम. खराब लाइटिंग और AC. एयर कंडीशनिंग के लिए 2 लाख रुपये की दूसरी मांग. म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की तरफ से रिश्वत लेने की कोशिश. इवेंट के बीच में वॉशरूम बंद कर देना. वेंडर को परेशान करना. बाहर निकलने का रास्ता रोकना. और सिक्योरिटी डिपॉजिट, जो कभी वापस नहीं मिला. सिंह ने बताया,

इस अनुभव के बाद मैंने तय किया कि कभी सरकारी स्टेडियम में कोई इवेंट होस्ट नहीं कराऊंगा.

समस्या का उनका आकलन बिल्कुल सटीक था. उनके अनुसार,

इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत बढ़िया है. स्टेडियम अच्छी जगह पर है. साइज भी अच्छा है. देखने में इंटरनेशनल स्टेडियम जैसा है. लेकिन, दिक्कत एग्जीक्यूशन में है. यह ऐसा है जैसे स्विमिंग पूल बुक करके आपसे कहा जाए कि अपना पानी खुद लाओ. दिक्कत स्टेडियम में नहीं है. दिक्कत मैनेजमेंट में है.

भारत ने अच्छी मेजबानी भी की है

क्या यह एक अंतहीन लिस्ट जैसा लगता है? इसका मतलब यह नहीं है कि भारत बिल्कुल भी अच्छी मेज़बानी नहीं करता है. उदाहरण के लिए, पिछले साल गुवाहाटी में हुई जूनियर वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप देख लीजिए. BWF प्रमुख ने इसकी तारीफ की थी.

सवाल यह नहीं है कि भारत अच्छी तरह से होस्ट कर सकता है या नहीं? सवाल यह है कि क्या भारत बिना किसी संकट के बेसिक प्रोफेशनलिज़्म दिखाकर अलग-अलग जगहों और ब्यूरोक्रेसी में लगातार अच्छी तरह से होस्ट कर सकता है? यही अनियमितता दर्शकों के अनुभव को भी दिखाती है.

फैंस की तो कोई परवाह ही नहीं  

इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर गुनालन पनीर, जिन्होंने मेलबर्न में करीब दस साल बिताए हैं, इस अंतर को स्ट्रक्चरल मानते हैं. उन्होंने कहा,

मेलबर्न में, छोटे वेन्यू भी वर्ल्ड-क्लास लगते हैं. साफ़, ऑर्गनाइज़्ड, और फ़ैन को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किए गए. खाना सस्ता है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट काम करता है और लोग जानते हैं कि जगह कैसे शेयर करनी है. भारत में अक्सर दर्शकों का बाद में सोचा जाता है.

खराब एक्सेस. कन्फ्यूजिंग एंट्री पॉइंट. गंदे टॉयलेट. ज़्यादा कीमत वाला खाना. ये लग्ज़री नहीं हैं. ये तय करते हैं कि लाइव स्पोर्ट लोगों की आदत बनेगा या परेशानी. सिविक बिहेवियर, जिसे अक्सर कल्चरल नाकामी के तौर पर देखा जाता है. उसे सिस्टम की लापरवाही के तौर पर बेहतर समझा जा सकता है.

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बड़े इंवेट्स की होस्टिंग में क्या है समस्या?

क्या भारत बड़े आयोजनों के होस्टिंग के लिए तैयार नहीं है? ईमानदारी से कहें तो इसका जवाब थोड़ा चिंताजनक है. भारत तैयार है, लेकिन सिर्फ कुछ पहलुओं में. सिस्टम के तौर पर अभी तैयार नहीं है.

बड़े मल्टी-स्पोर्ट इवेंट्स की मेजबानी के लिए संस्थागत परिपक्वता की ज़रूरत होती है.  कॉन्ट्रैक्ट पूरे किए जाएं. डिपॉज़िट वापस किए जाएं. सुविधाओं का रखरखाव हो. सुरक्षा के प्रबंध अच्छे हों. शेड्यूल पर्यावरण की असलियत के हिसाब से हों. सबसे जरूरी ये कि आलोचना को अपमान के बजाय फीडबैक के तौर पर लिया जाए.

यही वजह है कि इंडिया ओपन को लेकर उठ रहे सवाल मायने रखते हैं. क्योंकि ओलंपिक होस्ट करने की चाहत रखने वाला देश एथलीटों की भलाई को पब्लिक-रिलेशंस की परेशानी के तौर पर नहीं देख सकता.

गौरव यू गुल्लैया, जो न्यूक्लियर इंजीनियर से स्पोर्ट्स पॉलिसी प्रोफेशनल बने हैं. उनका कहना है कि सुधार मिलकर किए जाने चाहिए. उन्होंने कहा,

एथलीट्स को सिर्फ मैट पर अपनी लड़ाई पर ध्यान देना चाहिए. न कि खराब टॉयलेट, टपकती छतों या असुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर से जूझने पर. हमें किफायती, अच्छी तरह से मेंटेन किए गए वेन्यू चाहिए. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में प्राइवेट भागीदारी असली होनी चाहिए. इसमें ऐसे इंसेंटिव हों जो सस्टेनेबिलिटी को संभव बनाएं.

भारत को घोषणाओं से सिस्टम की ओर बढ़ने की जरूरत है. इवेंट की तैयारी का ऑडिट होना चाहिए, महज दावा नहीं. पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को शेड्यूलिंग का आधार बनना चाहिए, न कि बहस का मुद्दा. फैन-फर्स्ट ऑपरेशंस को औपचारिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाना चाहिए. सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए.

कमियों को स्वीकार करना सीखना होगा

भारत ओलंपिक की मेज़बानी कर सकता है. लेकिन, इंडिया ओपन ने एक बार फिर दिखाया है कि महत्वाकांक्षा और तैयारी के बीच की दूरी स्टेडियम की क्षमता से नहीं मापी जाती. इसे इस बात से मापा जाता है कि क्या एडमिनिस्ट्रेटर अनुमानित समस्याओं का सामना कर सकते हैं और उन्हें हल कर सकते हैं. ये नहीं कि जो लोग उन समस्याओं को बताते हैं, उन्हें चुप करा दिया जाए.

लोह कीन यू ने जब कहा, ‘मैं हैरान हूं कि आप ठीक हो’. ये दिल्ली की हवा के बारे में नहीं था. ये उस स्पोर्टिंंग क्लचर को आईना दिखाना था, जो जवाबदेही आने पर घुटन महसूस करने लगते हैं. अगर भारत को 2036 ओलंपिक की मेजबानी करनी है, तो हमें अपनी कमियों को स्वीकारना सीखना होगा. उसे ठीक करना होगा और तैयारी को गर्व से जोड़ना छोड़ना होगा.

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