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एक कविता रोज: मंगलेश डबराल की 'मां की तस्वीर'

"जब भी तस्वीर खिंचवाने का मौक़ा आता है मां घर में खोई हुई किसी चीज़ को ढूंढ रही होती है"

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फोटो - thelallantop
मंगलेश जी की पहली कविता स्कूल में पढ़ी थी. सीबीएसई की किताब में हुआ करती थी 'संगतकार'. तब पता नहीं था ये अभी जिंदा हैं. स्कूल में तो यही पता था हर कवि मरा हुआ होता है. 5 साल बाद स्टेज पर पढ़ते हुए सुना. पहले 'संगतकार', फिर 'मां की तस्वीर'. सम्मोहित होता हुआ महसूस हुआ. ऑडियंस को सम्मोहित होते हुए देखा. हॉल की चुप्पी में मंगलेश पढ़ते जाते थे. वही 'मां की तस्वीर' आज हम पढ़ा रहे हैं आपको.
 

घर में मां की कोई तस्वीर नहीं जब भी तस्वीर खिंचवाने का मौक़ा आता है मां घर में खोई हुई किसी चीज़ को ढूंढ रही होती है या लकड़ी घास और पानी लेने गई होती है जंगल में उसे एक बार बाघ भी मिला पर वह डरी नहीं उसने बाघ को भगाया घास काटी घर आकर आग जलाई और सबके लिए खाना पकाया

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मैं कभी घास या लकड़ी लाने जंगल नहीं गया कभी आग नहीं जलाई मैं अक्सर एक ज़माने से चली आ रही पुरानी नक़्क़ाशीदार कुर्सी पर बैठा रहा जिस पर बैठकर तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं मां के चहरे पर मुझे दिखाई देती है एक जंगल की तस्वीर लकड़ी घास और पानी की तस्वीर खोई हुई एक चीज़ की तस्वीर

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