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एक कविता रोज: राजेंद्र धोड़पकर की कविताएं

'मैंने तुमसे इस कदर प्रेम किया कि इज्जत की भी कोई परवाह नहीं की'

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फोटो - thelallantop
डॉक्टर राजेंद्र धोड़पकर एक कार्टूनिस्ट, पत्रकार और व्यंग्यकार के रूप में पहचाने जाते हैं. लेकिन इन तीनों के पहले, वो एक कवि रहे हैं. आज की कविताएं इनके कविता संग्रह 'दो बारिशों के बीच' से ली गई हैं.

1. पूर्वजन्म

पूर्वजन्म की अब कोई स्मृति बाकी नहीं है पूर्वजन्म की सारी चीजों से धुंध की तरह लिपटी मेरी स्मृतियाँ गायब हो गईं तो सारी चीजें तेज धूप में साफ़ चमक रही हैं मैं याद करता हूं मैं कोई योद्धा था या कवि या गडरिया किसी लड़की से प्रेम की वजह से मारा गया या मैं मरा प्लेग से या मैं निकल गया था यात्रा पर, फिर मेरा कुछ अता-पता नहीं चला कितने अकाल देखे मैंने, कितने युद्ध कितने वायदों, कितनी मौतों, कितनी बोगदों और पुलों से गुजर मैं मुझे कुछ याद नहीं है कितना भयानक है यह आसपास साफ़-साफ़ चमकती सारी दुनिया है छाया पूर्वजन्म की और दिन चढ़ते पूर्वजन्म की कोई स्मृति बाकी नहीं है

2. तुम्हारा नाम

तुम्हारे नाम का एक-एक अक्षर आता है मुझ तक एक-एक लहर पर सवार यह विस्मृति का समुद्र है लगातार बारिश के दिनों में जब लगातार एक धूसर अँधेरे में मृतकों और जीवितों के बीच फर्क मिटने लगता है बहुत पहले झरे हुए फूल फिर से पौधों पर खिलने लगते हैं मैं अपने को पाता हूं एक लगातार बरसते धुंधले समुद्र तट पर स्मृति-विस्मृति की सीमा पर वहां सिर्फ तुम्हारा नाम मुझ तक लौट-लौट कर आता है.

3. प्रेम कथा का अंत

मैंने तुमसे इस कदर प्रेम किया कि इज्जत की भी कोई परवाह नहीं की लौटते हुए बची-खुची इज्जत चौराहे पर बेच दी और दो सिगरेटें खरीदीं घर आकर लंबी तान कर सो गया अगले दिन मैंने दोस्त से कहा सोचता हूं सिगरेट पीना छोड़ दूँ स्वास्थ्य भी खराब होता है और इज्जत का कचरा होता है सो अलग ठीक यही विचार प्रेम के बारे में भी मेरे मन में आया जब मैं दोस्त के साथ सड़क पर घूम रहा था हमने एक धर्मादा प्याऊ पर पानी पीया उधारी में दो सिगरेटें लीं उस साल बहुत ज्यादा गर्मी पड़ी थी बाद में मालूम हुआ गाँव में भारी अकाल पड़ा था ठीक यही विचार प्रेम के बारे में मेरे मन में आया मैंने उसे एक किताब में रख दिया और भूल गया, लाइब्रेरी की किताब थी, वापस कर आया तुम बहुत पहले शहर छोड़ कर चली गई थी मैं भटकता रहा अकेलेपन में फिर दोस्त मिला, भावुक होकर उसने कहा मैं तुम्हारी खातिर जान दे सकता हूं उसने कहा- ऐसा मत करना बचा ही क्या है तुम्हारे पास सिर्फ जान ही तो है, वह भी दे दोगे तो तुम्हारे पास कुछ नहीं रहेगा.
  (वाणी प्रकाशन से साभार) अगर आप भी कविता/कहानी लिखते हैं, और चाहते हैं हम उसे छापें, तो अपनी कविता/कहानी टाइप करिए, और फटाफट भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तो छापेंगे. और हां, और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने 'एक कविता रोज़' टैग पर क्लिक करिए.

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