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TMC को सत्ता में लाकर वहां से उखाड़ने वाले शुभेंदु अधिकारी की पूरी कहानी

बंगाल के नए मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लग गई है. पार्टी के पर्यवेक्षक और गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी के नाम का ऐलान किया है. कांग्रेस की पाठशाला से सियासत का ककहरा सीखने वाले शुभेंदु की राजनीति ममता बनर्जी के नेतृत्व में परवान चढ़ी और अब बीजेपी में उनको राज्य की सबसे बड़ी कुर्सी हासिल हुई है.

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गृह मंत्री अमित शाह ने शुभेंदु के नाम का ऐलान किया. (इंडिया टुडे)

19 दिसंबर, 2020. मेदिनीपुर के ग्राउंड में खचाखच उमड़ी भीड़. गृह मंत्री अमित शाह ने शुभेंदु अधिकारी के गले में बीजेपी का गमछा डाला. दोनों ने मिलकर पार्टी का झंडा लहराया. फिर शुभेंदु झुके और शाह के पैर छुए. इस तरह वे बीजेपी के 'मिशन बंगाल' के सारथी बन गए.

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कट टू 8 मई 2026. बीजेपी ने बंगाल का किला फतह कर लिया. अमित शाह बतौर पर्यवेक्षक कोलकाता आए. विश्व बांग्ला कन्वेंशन सेंटर में पार्टी के विधायक दल की बैठक हुई. बैठक के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री के तौर पर शुभेंदु के नाम का ऐलान किया.

ममता का साथ छोड़ बीजेपी के साथ आए शुभेंदु

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शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे की गुत्थी सुलझाते हैं फिर आगे बढ़ेंगे. 26 नवंबर 2020 को शुभेंदु ने हुगली नदी पुल आयोग (HRBC) के पद से इस्तीफा दिया. अगले दिन यानी 27 नवंबर को राज्य के परिवहन मंत्री का पद छोड़ दिया. विधानसभा चुनाव 2021 से लगभग पांच महीने पहले शुभेंदु का जाना टीएमसी के लिए बड़ा झटका था. डैमेज कंट्रोल की कोशिश हुई. 

1 दिसंबर 2020 की रात कोलकाता में अभिषेक बनर्जी और शुभेंदु के बीच बैठक हुई. बैठक में प्रशांत किशोर भी मौजूद रहे. प्रशांत TMC का चुनावी अभियान देख रहे थे. बैठक दो घंटे तक चली. इसमें पार्टी के सांसद सौगत रॉय और सुदीप बंदोपाध्याय भी शामिल थे. बैठक के बाद सौगत रॉय ने कहा, 

शुभेंदु अधिकारी बीजेपी में नहीं जा रहे हैं. विवादों को सुलझा लिया गया है. वे टीएमसी के साथ हैं. हम सब मिलकर ममता बनर्जी को जिताने के लिए मिलकर काम करेंगे.

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TMC नेताओं के हवाले से बताया गया कि बैठक के बीच में अभिषेक बनर्जी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से शुभेंदु की फोन पर बात कराई. ममता ने शुभेंदु से मिलकर काम करने की अपील की. माना गया कि मसला सुलझ गया है. लेकिन असल में मामला टला नहीं था. शुभेंदु अपनी गोटी सेट करने में जुटे थे. 16 दिसंबर को उन्होंने पार्टी की विधायकी भी छोड़ दी. 

इस बीच पूर्वी मेदिनीपुर में उनके दफ्तर पर भगवा रंग चढ़ गया. और उनको जेड प्लस सुरक्षा मिलने की खबर भी तैरनी लगी. यानी शुभेंदु अब पॉइंट ऑफ नौ रिटर्न तक पहुंच गए थे. 17 दिसंबर को शुभेंदु ने आधिकारिक तौर पर पार्टी की सदस्यता छोड़ दी. अगले ही दिन उनको जेड कैटेगरी की सिक्योरिटी मिल गई. फिर 19 दिसंबर 2020 को मंच सजा और शुभेंदु आधिकारिक तौर पर बीजेपी के हो गए.

शुभेंदु का शुरुआती राजनीतिक सफर

शुभेंदु का जन्म 15 दिसंबर 1970 को हुआ. परिवार आजादी की लड़ाई से जुड़ा था. दादा केनाराम अधिकारी फ्रीडम फाइटर थे. अंग्रेजों ने साल 1929, 1942 और 1943 में तीन बार उनका घर जलाया था. पिता सिसिर अधिकारी कांथी नगरपालिका के अध्यक्ष थे. मेदिनीपुर में उनका दबदबा था. उनकी मर्जी के बिना वहां कुछ भी नहीं होता था. साल 1982 में सिसिर अधिकारी को कांग्रेस ने कांथी दक्षिण विधानसभा से टिकट दिया. अधिकारी जीते और विधायक बने. तब शुभेंदु 12 साल के थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया, 

जब मैं 12 साल का था. पिता को विधायक बनते देखा था. उसी दिन तय कर लिया कि यही मेरा रास्ता है.

19 साल की उम्र में शुभेंदु स्टूडेंट पॉलिटिक्स में एक्टिव हो गए. कांथी के PK कॉलेज में वे कांग्रेस की स्टूडेंट विंग छात्र परिषद से जुड़े. तब यह कॉलेज CPI(M) की स्टूडेंट यूनियन SFI का गढ़ था. शुभेंदु को यहां से विरोधियों से लड़ने-भिड़ने और संगठन बनाने की ट्रेनिंग मिली. साल 1989 में शुभेंदु छात्र परिषद के प्रतिनिधि चुने गए.

साल 1995 में शुभेंदु अधिकारी कांग्रेस के टिकट पर कांथी नगरपालिका से पार्षद चुने गए. साल 1998 में ममता बनर्जी के रास्ते कांग्रेस से अलग हो गए. उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई. तृणमूल कांग्रेस (TMC). दो साल बाद यानी साल 2000 में शुभेंदु अपने पिता और भाइयों के साथ इसी पार्टी के साथ जुड़ गए.

शुभेंदु और उनके परिवार के आने से ममता बनर्जी को पूर्वी मेदिनीपुर जिले में CPI(M) के तंत्र से मुकाबला करने में मदद मिली. क्योंकि अधिकारी परिवार लंबे अरसे से इस इलाके में एक्टिव था. शुभेंदु ने अपने संगठन कौशल के दम पर पूर्वी मेदिनीपुर और आसपास के जिलों में TMC को मजबूती दी. तब CPI(M) के लक्ष्मण सेठ इलाके के सबसे ताकतवर नेता हुआ करते थे. शुभेंदु न उनके वर्चस्व को चुनौती दी.

साल 2006 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी मात्र 30 सीट जीत पाई. पहली बार चुनाव लड़ रहे शुभेंदु अधिकारी कांथी दक्षिण सीट से चुनाव जीतने में सफल रहे. इसके बाद साल 2009 में उन्होंने तमलुक लोकसभा सीट से CPI(M) के लक्ष्मण सेठ को चुनौती दी और उनका किला ढहा दिया. फिर साल 2014 के चुनाव में भी उन्होंने इस सीट पर कब्जा बनाए रखा. साल 2016 के विधानसभा चुनाव में TMC ने उनको नंदीग्राम सीट से लड़ाया. शुभेंदु ने यहां से जीत दर्ज की, जिसके बाद उनको ममता बनर्जी की मंत्रिमंडल में जगह मिली. उनको परिवहन मंत्री बनाया गया.

नंदीग्राम के आंदोलन ने दिलाई पहचान

दिसंबर 2006. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने नंदीग्राम केमिकल हब और स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने का फैसला किया. सरकार ने इसके लिए इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप के साथ समझौता किया. उनको 25,000 एकड़ जमीन देने पर बात बनी. जैसे ही ये खबर फैली, किसानों में नाराजगी फैल गई. उनका गुस्सा उबलने लगा.

नंदीग्राम में एक बड़े आंदोलन की आहट शुरू हुई. 2007 की जनवरी में एक अनाथालय में बैठक हुई. बैठक में भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी (BUPC) बनी. इसके कन्वेनर बने सिसिर अधिकारी और जमीन पर कमान संभाली शुभेंदु अधिकारी ने. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और गांववालों को संगठित करने का जिम्मा लिया. घर-घर जाकर लोगों को एकुजट किया. शुभेंदु ने पूरे  नंदीग्राम में उबाल ला दिया. सड़कें खोदी जाने लगीं. लकड़ी के पुल उड़ाए जाने लगे. खतरे की आहट होते ही गांवों में शंख बजाए जाते और मस्जिदों से ऐलान होने लगता. इन लोगों की लड़ाई CPI(M) के स्थानीय काडर और पुलिस दोनों से थी. खतरा भांपते ही हजारों लोग मानव श्रंखला बना कर आ जाते. 

बंगाल में जिनकी सत्ता होती है दीवारों पर उनका ही पोस्टर दिखता है. इसलिए शुभेंदु ने इस लड़ाई में 'व्हिस्पर कैंपेन' की मदद ली. यानी सीधे कानों कान लोगों तक अपनी बात पहुंचाना. उनके तरीके ने वाम मोर्चे की सरकार और काडर को हिला कर रख दिया. प्रतिक्रिया में 14 मार्च 2007 को पुलिस ने आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलियां बरसाईं. 14 ग्रामीण इसमें मारे गए. नंदीग्राम का विद्रोह पूरे राज्य में पसर गया. इसका खामियाजा लेफ्ट को सत्ता गंवा कर चुकाना पड़ा. 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, TMC से जुड़े लोगों ने बताया, 

गंवई बंगाली लहजे में संवाद और स्ट्रीट फाइटर की इमेज ने नंदीग्राम में शुभेंदु को एक बड़ा सपोर्ट बेस बनाने में मदद की. रणनीति बनाने में माहिर शुभेंदु ने नंदीग्राम आंदोलन को पार्टी और खुद अपने लिए एक लॉन्चपैड की तरह इस्तेमाल किया. जिससे इलाके में उनकी मजबूत पकड़ बनी.

नंदीग्राम की सफलता के बाद शुभेंदु का कद बढ़ा. ममता बनर्जी ने उनको जंगलमहल (पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिमी मेदिनीपुर) का इंचार्ज बनाया. यह इलाका तब रेड जोन के तौर पर जाना जाता था. लेफ्ट पार्टियों और माओवादियों का गढ़ था. शुभेंदु ने बूथ-दर-बूथ यहां TMC की पैठ बनाई. इसके बाद पार्टी ने उनको मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों का पर्यवेक्षक बनाया. शुभेंदु ने वहां कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को TMC से जोड़ा, जिसके चलते कई नगरपालिकाओं में पार्टी को जीत मिली.

साल 2011 के चुनाव में ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन का अंत किया. इस वक्त तक शुभेंदु उनके सबसे करीबी सहयोगियों में शुमार हो चुके थे. यूपीए-2 के दौरान ममता बनर्जी ने उनके पिता को केंद्र में मंत्री भी बनाया. वहीं साल 2016 में दोबारा सत्ता में आने पर शुभेंदु को अपनी सरकार में परिवहन मंत्री बनाया. इसके बाद से शुभेंदु ममता सरकार में नंबर दो के तौर पर देखे जाने लगे.

ममता बनर्जी से दूरी क्यों बढ़ी?

ममता सरकार में मंत्री बनने के एक साल के बाद ही चीजें बदलने लगीं. साल 2017 में पार्टी के महासचिव और ममता के करीबी मुकुल रॉय बीजेपी में चले गए. इसके बाद शुभेंदु को लगा कि उनका कद और बढ़ेगा. लेकिन इस बीच दीदी की निर्भरता अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी पर बढ़ने लगी. साल 2020 में शुभेंदु के पार्टी छोड़ने के बाद TMC के एक नेता ने बीबीसी को बताया,

शुभेंदु बीते कुछ महीनों से पार्टी में अपनी उपेक्षा से नाराज थे. पार्टी का शीर्ष नेतृ्त्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह पर चल रहा था. पूर्वी मेदिनीपुर जिले के मामलों में भी अधिकारी की राय नहीं ली जा रही थी. इसके साथ ही ममता बनर्जी जिस तरह अपने भतीजे को उत्तराधिकारी के तौर पर आगे कर रही थीं, उससे भी अधिकारी नाराज थे.

शुभेंदु की पहल पर पार्टी में शामिल होने वाले लोगों की उनसे ज्यादा सुनी जा रही थी. उनके करीबियों ने बताया कि पुराने नेताओं को नजरअंदाज करके जिस तरह से अभिषेक बनर्जी को आगे किया जा रहा था, उससे शुभेंदु नाराज थे. इससे इतर TMC के एक सीनियर नेता ने दावा किया कि शुभेंदु 2021 के विधानसभा चुनाव में अपने 50 से ज्यादा लोगों के लिए टिकट चाह रहे थे.

शारदा और नारदा स्कैम से नाम जुड़ा

साल 2013 में पश्चिम बंगाल में शारदा चिटफंड घोटाले का खुलासा हुआ. इसमें लाखों निवेशकों के 25,000 करोड़ से ज्यादा रुपये डूब गए. बंगाल सरकार मामले को रफादफा करना चाह रही थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर CBI ने जांच शुरू की. तब शुभेंदु अधिकारी सांसद थे. शारदा से जुड़े लोगों पर मीडिया के जरिए कई नेताओं से संबंध बनाने के आरोप लगे. शारदा ग्रुप के मालिक सुदीप्त सेन ने आरोप लगाया कि कुछ नेताओं ने उनको पैसे देने के लिए दबाव बनाया था. इनमें शुभेंदु का भी नाम था. CBI ने सितंबर 2014 में उनसे पूछताछ की. अभी तक इस मामले की जांच चल रही है.

नारदा स्टिंग ऑपरेशन 

साल 2014 में पत्रकार मैथ्यू सैमुअल ने एक अंडरकवर स्टिंग किया. इसे 2016 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इसे दिखाया गया. स्टिंग वीडियो में TMC के कई नेताओं को कथित तौर पर नकद लेते हुए दिखाया गया. जिन नेताओं के नाम आए उनमें शुभेंदु अधिकारी भी शामिल थे. CBI और ED ने मामले की जांच शुरू की. ED ने साल 2017 में शुभेंदु अधिकारी को पूछताछ के लिए बुलाया. साल 2018 में उनके स्टाफ और अकाउंटेंट से भी पूछताछ हुई.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, शुभेंदु ने दावा किया कि जो पैसा वीडियो में दिख रहा था वह इलेक्शन फंड का पैसा था. और वह रकम उनके स्टाफ ने ली थी. जांच चल ही रही थी कि दिसंबर 2020 में शुभेंदु बीजेपी में शामिल हो गए. उसके बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई धीमी पड़ गई है.  

इसी मामले में फिरहाद हकीम, सुब्रता मुखर्जी और मदन मित्रा जैसे नेताओं को गिरफ्तार किया गया. तब भी सवाल उठे कि आखिर शुभेंदु की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई. इस केस में भी अभी जांच चल रही है. विपक्षी तो आरोप लगाते हैं कि भ्रष्टाचार के कई मामलों में शामिल होने के चलते ही ईडी और सीबीआई के एक्शन से बचने के लिए शुभेंदु बीजेपी में गए.

साल 2021 में नंदीग्राम में ममता को हराया

शुभेंदु के बीजेपी में जाने से ममता बेहद नाराज हुईं. उन्होंने नंदीग्राम जाकर ऐलान किया कि इस बार वो नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगी. कुछ घंटों बाद शुभेंदु ने दावा किया, “मैं नंदीग्राम का भूमिपुत्र हूं. उनको अगर 50 हजार से कम वोट से हराया तो राजनीति छोड़ दूंगा.”

साल 2021 के चुनाव में बीजेपी सत्ता में आने में सफल नहीं रही. लेकिन पार्टी की सीटों का आंकड़ा 3 से बढ़कर 77 पहुंच गया. नंदीग्राम से बेहद करीबी मुकाबले में शुभेंदु ने ममता बनर्जी को 1956 वोटों से हरा दिया. बंगाल के इतिहास में ये पहला मौका था, जब कोई सिटिंग मुख्यमंत्री चुनाव हार गया. TMC को इस चुनाव में 213 सीटें मिलीं. दूसरी तरफ बीजेपी को मिले 77 सीटों में से 29 अकेले शुभेंदु के दबदबे वाले इलाके से आईं. बीजेपी राज्य में पहली बार मुख्य विपक्षी पार्टी बनी. पार्टी का वोट शेयर 10 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत तक पहुंच गया.

जमीन पर टिके रहे शुभेंदु 

साल 2026 में बीजेपी ने बंगाल का किला फतह कर लिया. अंग, बंग और कलिंग (बिहार, बंगाल और ओडिशा) पर काबिज होने का बीजेपी का सपना पूरा हुआ. पार्टी के इस सपने को पूरा करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तो जुटे ही थे. लेकिन जमीन पर शुभेंदु TMC से मोर्चा लेते रहे.

साल 2021 में चुनाव जीतने के बाद शुभेंदु को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. उसके बाद बीते पांच साल वो लगातार सरकार पर हमलावर रहे. तृणमूल के गढ़ में भी वे बीजेपी के लिए जमीन तैयार करते रहे. शुभेंदु ममता सरकार के कथित भ्रष्टाचार को लेकर मुखर रहे. वहीं बीजेपी के लिए हिंदुत्व की जमीन तैयार करने में भी जुटे रहे. इंडिया टुडे से जुड़े हिमांशु शेखर बताते हैं, 

2021 में बीजेपी की हार के बाद मुकल रॉय और अर्जुन सिंह समेत कई नेता दोबारा TMC में चले गए. क्योंकि उन पर लगातार अटैक हो रहे थे. अर्जुन सिंह का तो घर से निकलना मुश्किल कर दिया गया था. इस दौरान शुभेंदु पर भी हमले हुए. उनके खिलाफ कई FIR भी हुई. लेकिन वे मजबूती से डटे रहे. तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को पूरी आक्रमकता से जवाब देते रहे.

बंगाल में बने हिंदुत्व के पोस्टर बॉय

बंगाल के एक सीनियर पत्रकार प्रसून आचार्य ने बताया कि नंदीग्राम आंदोलन के दौरान शुभेंदु हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में काफी लोकप्रिय थे. मुसलमानों में उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि कई मुस्लिम बच्चों के नाम शुभेंदु के नाम पर रखे जाने लगे. यानी उनकी एक अच्छी सेक्युलर साख थी. यही शुभेंदु जब बीजेपी में आए तो हिंदुत्व के पोस्टर बॉय बन गए. पिछले पांच सालों में हिंदुत्व को लेकर उनके तमाम बयान चर्चित रहे, जिनमें बंगाल को ‘मिनी पाकिस्तान नहीं बनने’ देने जैसी स्पीच भी शामिल है. 

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा के दौरान उन्होंने कोलकाता स्थित उनके उप उच्चायोग को बंद करने की धमकी दी. इस दौरान उन्होंने ममता बनर्जी की तुलना मोहम्मद युनूस से कर दी. यही नहीं, भवानीपुर में ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव जीतने के बाद उन्होंने दावा किया, “15 हजार से ज्यादा मुसलमानों ने ममता बनर्जी को वोट दिया. मुझे हिंदू, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध लोगों ने आशीर्वाद देकर जिताया. ये हिंदुत्व की जीत है.”

अमित शाह का भरोसा जीता

अमित शाह की मौजूदगी में ही शुभेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल हुए. साल 2021 में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराकर उन्होंने अमित शाह के भरोसे का मान रखा. उन्होंने गृह मंत्री को आश्वस्त किया कि वे ममता बनर्जी की शैली में उनका मुकाबला कर सकते हैं. शुभेंदु पर शाह के भरोसे की एक बानगी देखिए. बंगाल चुनाव के दौरान भवानीपुर की एक रैली में अमित शाह ने कहा, 

शुभेंदु दा इस बार केवल नंदीग्राम से चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन मैंने उनको कहा कि इस बार आपको भवानीपुर से ममता बनर्जी को हराकर TMC की सत्ता को उखाड़ फेंकना है. 

लल्लनटॉप के पॉलिटिकिल एडिटर पंकज झा बताते हैं,

2 अप्रैल को शुभेंदु भवानीपुर से नॉमिनेशन के लिए जा रहे थे. इस दौरान TMC के 7 से 8 लोग उनके खिलाफ नारेबाजी करने लगे. और उनकी ओर बढ़ने लगे. लेकिन वो शुभेंदु के करीब आते इससे पहले ही वहां मौजूद आम जनता ने उन लोगों को पकड़ लिया. यही वो मोमेंट है, जब अमित शाह को लग गया कि शुभेंदु इस बार ममता बनर्जी को मात दे सकते हैं.

इसके अलावा शुभेंदु थिएट्रिक्स में माहिर हैं. लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की अदा में उनको नंदीग्राम के आंदोलन के दिनों से ही महारत है. साथ ही वे एक अच्छे चुनावी मैनेजर भी हैं. खुद के लिए और पार्टी के लिए संसाधन जुटाने में भी उनकी महारत है. इसलिए वो कई बार विवादों में भी पड़े हैं.

बंगाल से दिल्ली तक पार्टी के स्टार कैंपेनर

शुभेंदु अधिकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के बाद पार्टी के सबसे बड़े स्टार कैंपेनर थे. खुद तो वे दो सीटों से चुनाव लड़ ही रहे थे, साथ ही लगातार पार्टी के दूसरे प्रत्याशियों के लिए भी कैंपेन कर रहे थे. यही नहीं, चुनाव से पांच-छह महीने पहले से वे बंगाल से बाहर रह रहे बंगालियों के बीच भी अपनी पहुंच बना रहे थे. हिमांशु शेखर बताते हैं कि शुभेंदु ने दिल्ली में रह रहे बंगालियों के बीच 30 से 40 छोटी-छोटी बैठकें की थीं. इसके साथ ही उन्होंने डोर टू डोर कैंपन भी चलाया. इसका असर चुनाव में देखने को भी मिला.

शुभेंदु के सामने क्या चुनौतियां होंगी?

शुभेंदु अधिकारी 9 मई को राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे. सरकार में आने के बाद उनकी सबसे बड़ी चुनौती राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर की तबीयत दुरुस्त करने की होगी. साथ में राज्य में कानून व्यवस्था को दुरुस्त करना और राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को खत्म करने की चुनौती भी होगी.

इसके अलावा उन पर बीजेपी के चुनावी वादों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी होगी. इसमें महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को 3,000 रुपये का मासिक भत्ता देना शामिल है. बीजेपी ने राज्य में उद्योग लाने और अगले पांच साल में 1 करोड़ रोजगार देने का वादा भी किया है.

शुभेंदु पर यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने और बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ से निपटने की भी जिम्मेदारी होगी, जोकि उनके चुनावी कैंपेन का अहम हिस्सा था. इसके साथ ही बीजेपी ने 45 दिनों के भीतर कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और पेंडिंग महंगाई भत्ता (DA) देने का वादा किया है. इससे खजाने पर 42,000 करोड़ का अतिरिक्त खर्च आएगा.

बंगाल में बीजेपी का वनवास तो खत्म हुआ. लेकिन अब शुभेंदु पर सच में रामराज्य स्थापित करने की चुनौती होगी. बंगाल में सत्ता बदलने की गति धीमी ही रही है. लेफ्ट और ममता बनर्जी को जनता ने काफी लंबा समय दिया. शायद शुभेंदु या बीजेपी के साथ भी ऐसा ही हो. लेकिन उसकी जमीन उनको अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही तैयार करना होगी.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला एक्शन क्या होगा?

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