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गुजारा भत्ता पत्नी की पढ़ाई-कमाई से नहीं पति की आर्थिक स्थिति से तय हो: HC

Allahabad High Court Maintenance: याचिका दायर करने वाली महिला की शादी अगस्त 2024 में अहमदाबाद में हुई थी. लेकिन शादी के एक महीने के अंदर ही अपने मायके वापस आ गई. उसने आरोप लगाया कि दहेज की मांग को लेकर उसे ससुराल से निकाल दिया गया था. तब से वो अपने पति से बिना किसी आर्थिक मदद के अलग रह रही है.

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महिला के पास MBA की डिग्री है. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर भरण-पोषण की रकम निर्धारित की जानी चाहिए और मामला पुनर्विचार के लिए फैमिली कोर्ट भेजा।
  • याचिकाकर्ता महिला ने दहेज की मांग को लेकर ससुराल द्वारा निष्कासन और आर्थिक सहायता की कमी के चलते गुजारा भत्ता बढ़ाने हेतु इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था क्योंकि पति विदेश में उच्च आय करता है।
  • फैसले के बाद मामले को फैमिली कोर्ट में लौटाकर छह महीने के भीतर गुजारा भत्ता की नई राशि तय करने का निर्देश दिया गया है, जिससे याची महिला की वित्तीय स्थिति का पुनः मूल्यांकन होगा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें एक महिला को मेंटेनेंस के तौर पर 15 हजार रुपये दिए जाने की बात कही गई थी. जस्टिस गरिमा प्रसाद ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भरण-पोषण का आकलन पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर किया जाना चाहिए, न कि ये देखकर कि पत्नी कितना पढ़ी है और अतीत में कितना कमाती थी.

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याचिका दायर करने वाली महिला की शादी अगस्त 2024 में अहमदाबाद में हुई थी. लेकिन शादी के एक महीने के अंदर ही अपने मायके वापस आ गई. उसने आरोप लगाया कि दहेज की मांग को लेकर उसे ससुराल से निकाल दिया गया था. तब से वो अपने पति से बिना किसी आर्थिक मदद के अलग रह रही है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के पास MBA की डिग्री है. शादी से पहले वो जॉब भी कर रही थी. लेकिन शादी के बाद से अपने पिता पर निर्भर है. ये ही दावा करते हुए उसने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां उसे गुजारा-भत्ता के लिए 15 हजार रुपये देने की बात हुई. मगर महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

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याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वो अभी बेरोजगार है. अपने पिता पर निर्भर है. अपना गुजारा खुद करने में असमर्थ है. जबकि उसका पति विदेश में शिक्षा से जुड़ी कंसल्टेंसी का कारोबार करता है. सालाना लगभग 5 करोड़ रुपये कमाता है और एक आलीशान जिंदगी जीता है.

इसलिए उसने अपना मेंटेनेंस 25 हजार रुपये करने की मांग की. और इसी को लेकर हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डाली. कोर्ट ने याचिका देखी और कहा, 

“पत्नी के भरण-पोषण का आकलन पति के सामाजिक और आर्थिक स्टेटस पर किया जाना चाहिए, ना कि पत्नी की पिछली कमाई या शैक्षणिक योग्यता के आधार पर.”

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ये कहते हुए अदालत ने मामले को वापस फैमिली कोर्ट में भेज दिया. ताकि छह महीने के अंदर गुजारा-भत्ता की रकम को नए सिरे से तय किया जा सके.

रिपोर्ट के मुताबिक, पति पक्ष ने दावा किया कि महिला का बर्ताव अनुचित था. वो शादी के लगभग 20 दिन बाद ही अपने घर चली गई थी. उसके पास MBA की डिग्री है. शादी से पहले वो 3 जगह जॉब कर चुकी है. वो उस समय 37 हजार रुपये कमाती थी. ये भी कहा कि उसकी पत्नी हर महीने 50 हजार रुपये कमा सकती है. जबकि वो खुद महीने का सिर्फ 15 हजार से 20 हजार रुपये कमाता है. उस पर परिवार की जिम्मेदारियों का भी बोझ है.

रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि पति ने कार्यवाही के दौरान अपनी पत्नी के साथ फिर से रहने की इच्छा जाहिर करने की कोशिश नहीं की. क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान भी इस तरह के किसी प्रस्ताव का न होना, दिखाता है कि पत्नी का अलग रहना उचित था. 

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