आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है. राघव चड्ढा की अगुआई में पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ दी है. ये राज्यसभा में AAP सांसदों की संख्या का दो तिहाई है. पार्टी के राज्यसभा में 10 सांसद हैं. इनमें सें तीन नेताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया है, जबकि बाकी 4 के भी उसी रास्ते जाने का दावा किया गया है. ऐसे में बड़ा सवाल है कि दल बदल विरोधी कानून के तहत इन सांसदों की सदस्यता बचेगी या नहीं?
राघव चड्ढा समेत AAP के सातों सांसदों की सदस्यता पर संविधान क्या कहता है?
आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 ने पार्टी छोड़ दी है. इनमें से राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक ने बीजेपी जॉइन कर ली है. बाकी बचे 4 सांसदों के भी कमल थामने की पूरी संभावना है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दल बदल विरोधी कानून के तहत इनकी सदस्यता जाएगी या फिर दो तिहाई बहुमत के साथ पार्टी छोड़ने के चलते इनकी सदस्यता बची रहेगी?


सबसे पहले दल बदल विरोधी कानून के बारे में जान लेते हैं. इसका जिक्र संविधान की दसवीं अनुसूची में हैं. साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन के तहत इसको लागू किया गया था. साल 2003 में 91वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत इसमें संशोधन भी हो चुका है.
किसी विधायक-सांसद को ‘दलबदलू’ तब माना जाता है, जब वह या तो अपनी पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है. या फिर सदन में मतदान के दौरान पार्टी निर्देशों का पालन नहीं करता. मतलब ये है कि यदि कोई विधायक या सांसद किसी भी मुद्दे पर पार्टी के 'व्हिप' का उल्लंघन करता है (यानी मतदान में हिस्सा नहीं लेता या उसके खिलाफ वोट देता है), तो सदन से उसकी सदस्यता जा सकती है. यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं, दोनों पर लागू होता है. लेकिन अगर दो तिहाई सांसद या विधायक एक साथ पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तब उनकी सदस्यता बची रहेगी.
संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल करने वाले सदस्यों की सदस्यता चली जाती है. लेकिन इस अनुसूची का पैराग्राफ 4 कुछ खास परिस्थितियों में सांसदों या विधायकों की सदस्यता रद्द होने से बचाता है. चूंकि राघव चड्ढा और छह अन्य सांसद एक समूह के रूप में साथ आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए वे संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के पैरा 4 के तहत संरक्षण लेने की कोशिश करेंगे.
उनका दावा मुख्यतः पैरा 4(1) पर आधारित होगा. इसके अनुसार यदि किसी सदस्य की मूल राजनीतिक पार्टी का किसी अन्य पार्टी में 'विलय' हो जाता है और वह सदस्य अन्य सदस्यों के साथ या तो (क) उस नई पार्टी का सदस्य बन जाता है या (ख) विलय स्वीकार न करके अलग समूह के रूप में काम करने का विकल्प चुनता है, तो उस पर पैरा 2(1) के तहत अयोग्यता लागू नहीं होती.
यहां ये सातों सांसद संभवतः विकल्प (क) अपनाते हुए यह कहेंगे कि आम आदमी पार्टी का किसी अन्य पार्टी में विलय हो गया है और वे अब उस नई पार्टी के सदस्य हैं. (संविधान में मूल पार्टी का जिक्र है. लेकिन दल-बदल के समय लेजिस्लेटिव पार्टी (विधायी दल) को काउंट किया जाता है. यानी विधायक दल या फिर संसद के किसी सदन के सांसदों का समूह.
लेकिन इस पूरी रणनीति का सबसे अहम आधार पैरा 4(2) है, जो एक स्पष्ट संख्या-आधारित शर्त निर्धारित करता है. इसके अनुसार, 'विलय' तभी माना जाएगा जब संबंधित विधायी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य इसके पक्ष में हों. यही वह कसौटी है जो इस पूरे मामले का परिणाम तय करेगी. यदि ये सात सांसद वास्तव में राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल सदस्यों के दो-तिहाई के बराबर हैं, तो कानून एक 'कल्पित स्थिति'(deeming fiction) के तहत इसे वैध विलय मान लेगा, चाहे पार्टी के संगठन स्तर पर कुछ भी हुआ हो.
इस दो-तिहाई शर्त को पूरा करने का सीधा प्रभाव पैरा 2(1)(a) पर पड़ता है, जो सामान्यतः उस सदस्य को अयोग्य ठहराता है जिसने स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दी हो. लेकिन जब पैरा 4(2) की शर्त पूरी हो जाती है, तो यह अयोग्यता लागू ही नहीं होती. फिर पैरा 4(1) के अनुसार, उस क्षण से नई पार्टी ही उस सदस्य की 'मूल पार्टी' मानी जाती है. यानी कानून उनकी राजनीतिक संबद्धता को वैध मान लेता है और इसे दोषपूर्ण दल-बदल नहीं मानता.
यदि इस कदम को चुनौती दी जाती है, तो मामला राज्यसभा के सभापति (उप राष्ट्रपति) के पास जाएगा, जिन्हें पैरा 6(1) के तहत ऐसे मामलों में निर्णय लेने का विशेष अधिकार है. उनका मुख्य काम यह देखना होगा कि क्या दो-तिहाई संख्या की शर्त वास्तव में पूरी हुई है या नहीं. अदालतें आम तौर पर ऐसे मामलों में सीमित हस्तक्षेप करती हैं और केवल प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि, दुर्भावना या स्पष्ट अवैधता के मामलों में ही दखल देती हैं.
अंततः, यदि पैरा 4(2) की संख्या संबंधी शर्त पूरी हो जाती है और सभापति इस पर संतुष्ट हो जाते हैं, तो ये सातों सांसद पैरा 2(1)(a) के तहत अयोग्यता से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे. कानून उनके इस कदम को दल-बदल नहीं बल्कि वैध विलय मानेगा, जिससे वे अपनी बदली हुई राजनीतिक स्थिति के बावजूद राज्यसभा की सदस्यता बनाए रख सकते हैं.
अगर AAP याचिका दायर करेगी तो क्या होगा?
अब सवाल उठता है कि यदि आम आदमी पार्टी इन सदस्यों को अयोग्य ठहराने के लिए कोर्ट जाती है तो क्या होगा? अभी राघव चड्ढा और उनके साथियों के पास संवैधानिक बढ़त है. क्योंकि उनके पास 10 में से 7 सांसदों के समर्थन का दावा है. इसलिए पार्टी से उनके इस्तीफे से सीट अपने आप खाली नहीं होगी.
इंडिया टुडे के इनपुट के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 191(2) के तहत विधानसभा/संसद के सदस्य को तभी अयोग्य ठहराया जा सकता है, जब वह दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जा चुका हो. वहीं अनुच्छेद 190 (3) यह तय करता है कि यदि कोई सांसद दसवीं अनुसूची के साथ 191 (2) के प्रावधानों के तहत अयोग्य ठहराया जाता है, तो उसकी सीट तत्काल प्रभाव से खाली मानी जाएगी. 191 (2) के मुताबिक, कोई भी सदस्य जिस राजनीतिक दल से चुना गया है, उसे अपनी मर्जी से छोड़ता है या पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है, तभी उसको अयोग्य ठहराया जा सकता है.
अनुच्छेद 190 (3) के तहत यदि किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 के खंड 1 या खंड 2 के तहत अयोग्य ठहराया जाता है या फिर 74 (b) अध्यक्ष या सभापति (राज्य या संसद के किसी सदन के हिसाब से) को खुद से पत्र लिखकर अपनी सीट से इस्तीफा देता है, और उसका इस्तीफा स्वीकार हो जाता है, तो उसकी सीट तुरंत प्रभाव से खाली मानी जाएगी.
शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कंफर्म किया था कि 'तत्काल' (thereupon) शब्द का अर्थ यह है कि सीट केवल उसी तारीख से खाली मानी जाएगी, जिस तारीख को अध्यक्ष अयोग्यता की याचिका पर फैसला करते हैं. किसी विधायक या सांसद को अयोग्य घोषित किए जाने तक उस सदन की कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: राघव चड्ढा के AAP छोड़ने की इनसाइड स्टोरी




















