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वीडी सतीशन: कांग्रेस का 'किताबी कीड़ा' जिसकी राजनीति पार्टी को जीतना सिखा सकती है

Kerala CM: मुख्यमंत्री के पद की रेस में कई बड़े नाम थे. केसी वेणुगोपाल, रमेश चेन्निथला, यहां तक कि शशि थरूर का नाम भी चर्चा में था. लेकिन कांग्रेस ने भरोसा उस नेता पर जताया, जिसने पिछले कुछ सालों में केरलम में पार्टी का सबसे आक्रामक चेहरा बनकर खुद को स्थापित किया.

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केरल के नए मुख्यमंत्री वीडी सतीशन वकालत भी कर चुके हैं. (फोटो-एक्स)

केरलम में कांग्रेस ने आखिरकार अपने मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगा दी है. लगातार कई दिनों तक चली बैठकों और सस्पेंस के बाद कांग्रेस हाईकमान ने वीडी सतीशन को विधायक दल का नेता चुन लिया है. यानी अब वीडी सतीशन केरलम के अगले मुख्यमंत्री होंगे. 

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इस रेस में कई बड़े नाम थे. केसी वेणुगोपाल, रमेश चेन्निथला, यहां तक कि शशि थरूर का नाम भी चर्चा में था. लेकिन कांग्रेस ने भरोसा उस नेता पर जताया, जिसने पिछले कुछ सालों में केरलम में पार्टी का सबसे आक्रामक चेहरा बनकर खुद को स्थापित किया.

केरलम में आमतौर पर LDF और कांग्रेस UDF के बीच सत्ता की अदला-बदली का चलन रहा है. एक दशक बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी है. वो भी भारी बहुमत के साथ. 140 में से 102 सीटें. इस जीत का असली आर्किटेक्ट वीडी सतीशन को बताया जा रहा है.

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वकालत भी कर चुके हैं वीडी सतीशन

केरलम के एर्नाकुलम जंक्शन से करीब 8 किलोमीटर दूर नेट्टूर शहर में 31 मई 1964 को वडस्सेरी दामोदरन का जन्म हुआ. ये वीडी सतीशन का पूरा नाम है. पिता का नाम के. दामोदरन मेनन और माता वी.पी. सरस्वती अम्मा. एक सामान्य परिवार से निकलकर वीडी सतीशन ने छात्र राजनीति के मैदान में कदम रखा. महाराजा कॉलेज और फिर गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में पढ़ाई के दौरान सतीशन छात्र राजनीति में काफी एक्टिव रहे. KSU यानी केरलम स्टू़डेंट्स यूनियन से जुड़ने के बाद NSUI के सचिव भी बने.

सतीशन लॉ की पढ़ाई कर चुके हैं. पॉलिटिक्स में एक्टिव होने से पहले उन्होंने वकालत भी की. यानी उन्होंने कानून पढ़ा, सिस्टम को समझा और फिर राजनीतिक में उतरे. यहां एक बात गौर करने वाली है कि जिस दौर में सतीशन छात्र राजनीति कर रहे थे उस वक्त केरलम के कैंपसों में लेफ्ट संगठनों का काफी दबदबा था. ऐसे माहौल में यहां किसी अन्य पार्टी के लिए सर्वाइव करना आसान नहीं था. इन चुनौतियों के बाद भी सतीशन धीरे-धीरे संगठन के भीतर जगह बनाते गए. 

परावुर से पहली बार लड़ा चुनाव

साल 1996 में सतीशन ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा. सीट थी परावुर. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक सतीशन यहां से करीब 1100 वोटों से चुनाव हार गए. परावुर को वामपंथियों का मजबूत इलाका माना जाता था. बहुत से नेता पहली हार के बाद पीछे हट जाते हैं, लेकिन सतीशन ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने इलाका नहीं छोड़ा. वहां काम जारी रखा. और फिर आया साल 2001. सतीशन ने शानदार जीत हासिल की. पहली बार विधायक बने और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. पिछले दो दशकों से भी ज्यादा वक्त हो गया है, लेकिन सतीशन की पकड़ इस सीट पर कमजोर नहीं हुई. वो लगातार यहां से जीतते आ रहे हैं.

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लेकिन सिर्फ चुनाव जीतना ही सतीशन की पहचान नहीं बना. उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी विधानसभा में उनकी शैली. केरलम विधानसभा में उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी, जो तैयारी करके बोलता है. फाइलों और आंकड़ों के साथ सरकार को घेरता है. पिनराई विजयन सरकार पर उनके हमले काफी चर्चा में रहे. 

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब कई कांग्रेस नेता हिंदू समुदाय के नेताओं द्वारा की गई विवादास्पद मुस्लिम विरोधी टिप्पणियों का सामना करने से कतरा रहे थे, तब सतीशन ने वेल्लापल्ली नटेसन और जी सुकुमारन नायर जैसे नेताओं से जुड़ी वोट बैंक की राजनीति को खुले तौर पर चुनौती दी. और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के समर्थक के रूप में अपनी छवि बनाई. ऐसी कई चुनौतियों के बाद भी सतीशन ने चैलेंज दिया कि अगर इस चुनाव में यूडीएफ को 100 से अधिक सीटें नहीं मिलीं तो वो अपना पॉलिटिकल करियर खुद खत्म कर देंगे. अब नतीजे हमारे सामने हैं.

हमें साल 2021 के चुनावी नतीजों को भी नहीं भूलना चाहिए. केरलम में कांग्रेस चुनाव हार गई थी. लेफ्ट ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल कर ली. ये केरलम की राजनीति में बड़ा बदलाव माना गया. क्योंकि यहां लंबे समय से सत्ता बदलने का पैटर्न चलता आया था. लेकिन इस हार के बाद सतीशन की राजनीति और मजबूत हुई. कांग्रेस ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया. और यहीं से सतीशन ने खुद को पूरी तरह से फ्रंटलाइन लीडर के तौर पर स्थापित किया. उन्होंने विपक्ष की राजनीति को ज्यादा आक्रामक बनाया. सरकार के खिलाफ लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस, विधानसभा में धारदार भाषण, यानी सदन से लेकर मीडिया तक हर जगह मजबूत मौजूदगी.

सतीशन को मिला पार्टी कार्यकर्ताओं का सपोर्ट

मौजूदा विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सत्ता में वापसी का मौका नहीं था. बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की लड़ाई भी थी. क्योंकि 2021 के बाद ऐसा लगने लगा था कि पिनराई विजयन ने केरलम की राजनीति में लेफ्ट की पकड़ और मजूबत कर दी है. लेकिन इस बार तस्वीर बदल गई. UDF ने शानदार प्रदर्शन किया और 140 में से 100 से ज्यादा सीटें जीत लीं. 

इस जीत के साथ केरलम में मुख्यमंत्री पद की चर्चा भी शुरू हो गई. और कांग्रेस के भीतरखाने सियासत भी चालू हुई. केरलम से लेकर दिल्ली तक बैठकें चलने लगीं. कई नेता एक्टिव हुए. केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के नाम मजबूत दावेदारों के तौर पर सामने आए. करीब 10 दिनों तक सस्पेंस बना रहा और आखिरकार कांग्रेस हाईकमान ने वीडी सतीशन के नाम पर सहमति बनाई. 

सतीशन को चुनने के पीछे सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है उनका ग्राउंड वर्क. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सतीशन को मुख्य रूप से पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं का समर्थन प्राप्त हुआ. पार्टी कार्यकर्ता सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे.

आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 8 मई को तिरूवनंतपुरम में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने सतीशन को सीएम बनाने की मांग को लेकर अपनी जान देने की कोशिश की थी. ऐसा इसलिए क्योंकि पार्टी कार्यकर्ताओं में यह आम राय थी कि चुनाव प्रचार का नेतृत्व करने वाले सतीशन को ही सरकार का नेतृत्व भी करना चाहिए. मुख्यमंत्री पद के लिए वेणुगोपाल की होड़ ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के कुछ वर्गों में बेचैनी पैदा कर दी, जबकि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनकी किसी भी पद पर नजर नहीं है.

चलते-चलते: वीडी सतीशन को ‘बुकवर्म’ यानी ‘किताबी कीड़ा’ की उपमा भी दी जाती है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक हाल ही में सतीशन ने 2025 में इंग्लिश और मलयालम दोनों भाषाओं की पढ़ी हुई 60 किताबों की लिस्ट भी जारी की थी.

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