लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल को लेकर चर्चा जारी है. सरकार के बिल पेश करने के बाद से ही विपक्ष ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया था. विपक्षी पार्टियों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन परिसीमन का विरोध करेंगी. चर्चा के दौरान कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने डीलिमिटेशन पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण जैसे ज़रूरी मुद्दे को परिसीमन जैसे जटिल मुद्दे के साथ नहीं उलझाना चाहिए.
'जिन्होंने जनसंख्या रोकी, उनके साथ अन्याय होगा', परिसीमन पर शशि थरूर ने भी सरकार को घेरा
Shashi Tharoor on Delimitation Bill: विपक्षी पार्टियों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन परिसीमन का विरोध करेंगी. चर्चा के दौरान कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने कहा कि महिला आरक्षण जैसे ज़रूरी मुद्दे को परिसीमन का बंधक नहीं बनाना चाहिए.


शशि थरूर का कहना है कि परिसीमन जैसे मुद्दे पर जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए. उन्होंने बताया कि महिला आरक्षण बिल से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन डीलिमिटेशन बिल एक चिंता का विषय है. उन्होंने सरकार पर तंज़ करते हुए कहा,
‘सरकार ने नोटबंदी के दौरान जिस तरह की जल्दबाजी दिखाई थी, वैसी ही जल्दबाजी परिसीमन की प्रक्रिया में भी दिखाई जा रही है. डीलिमिटेशन एक तरह का पॉलिटिकल डीमोनेटाइज़ेशन बनकर रह जाएगा. महिला आरक्षण बिल को परिसीमन की प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.’
उनका मानना है कि परिसीमन के लिए गहन विचार-विमर्श की जरूरत होती है. उन्होंने डीलिमिटेशन पर बात करते हुए तीन ज़रूरी मुद्दों पर धयान केंद्रित किया.
- पहला, छोटे और बड़े राज्यों के बीच संतुलन.
- दूसरा, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों के बीच संतुलन. जहां केरल और तमिलनाडु ने अपने यहां जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल किया है. ऐसे में केवल पुराने सेन्सस को आधार बनाकर सीटें बढ़ाना उन राज्यों के लिए पुरस्कार होगा, जिन्होंने इस लक्ष्य को पूरा नहीं किया है. और उनके साथ अन्याय जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य पूरा किया.
- तीसरा, उन राज्यों के बीच संतुलन जो हमारी अर्थव्यवस्था के इंजन रहे हैं और जो केंद्र सरकार से फंड पाने वालों में सबसे आगे रहे हैं.
उन्होंने आगे अपने बयान में कहा कि परिसीमन का मुद्दा भारत के फेडरल स्ट्रक्चर को बर्बाद कर सकता है. महिला आरक्षण बिल को तुरंत पास कर देना चाहिए क्योंकि परिसीमन जैसे जटिल मुद्दे पर लंबी बहस होनी चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि लोकसभा की सीट 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, लेकिन राज्यसभा के लिए कोई प्रस्ताव ही नहीं है. ऐसे में दोनों सदनों के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है.
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि अगर ये प्रस्ताव लागू हो जाते हैं, तो हिंदी भाषी राज्यों (हिंदी हार्टलैंड) की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगी. लेकिन साउथ के राज्यों की हिस्सेदारी घटकर 24.3% से 20.7% रह जाएगी.
हालांकि, अमित शाह का कहना है कि फिलहाल लोकसभा में 543 सीटों में दक्षिण से 129 सांसदों की भागीदारी है. परिसीमन के बाद 850 सीटों पर 195 सांसद दक्षिण से होंगे. यानी दक्षिण की हिस्सेदारी लोकसभा में 23.76 प्रतिशत से बढ़कर 23.97 हो जाएगी. गृहमंत्री ने पांचों राज्यों की सीटों का गणित भी समझाया है.
वीडियो: शशि थरूर के 'मैरिटल रेप को रोकने वाले बिल' की ज़रूरत क्यों हैं? भारत में मौजूदा कानून क्या है?






















