साल 2023 में संसद ने महिला आरक्षण बिल को मंजूरी दी थी. लेकिन साल 2026 में इस बिल में प्रस्तावित संशोधनों को मंजूरी नहीं मिल पाई. मंजूरी नहीं मिलने का कारण इसे परिसीमन से जोड़ना रहा. विपक्षी पार्टियों ने महिला आरक्षण पर तो सहमति जताई, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति की. इससे कम से कम ये तो साफ होता है कि राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी पर तो सबकी सहमति है लेकिन जब बारी टिकट देने की आती है तो ये कमिटमेंट कहां चली जाती है?
विपक्ष को 'नारी विरोधी' बता रही BJP ने खुद घटाए महिला कैंडिडेट्स, बाकी दल कहां खड़े?
बीजेपी महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन लेकर आई थी. पार्टी लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को आरक्षण दिलाने के लिए काफी मुखर भी दिखी. लेकिन साल 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद से किसी भी विधानसभा चुनाव में बीजेपी के महिला उम्मीदवारों की संख्या 20 फीसदी नहीं पहुंची है.


साल 2023 में महिलाओं के लिए लोकसभा में 33 फीसदी सीट रिजर्व करने का विधेयक पास हुआ था लेकिन अभी तक इसके हिसाब से आरक्षण मिलना शुरू नहीं हुआ है. साल 2023 में कानून पारित होने के बाद हुए चुनावों के आंकड़े देखें तो महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में बेहद मामूली बढ़ोतरी हुई है. अगर असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी चुनाव के आंकड़े देखें तो यहां अधिकतर पार्टियों ने महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाई है, लेकिन ये बढ़ोतरी 33 फीसदी या कहें कि सम्माजनक प्रतिनिधित्व से काफी दूर है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल में कांग्रेस ने 35 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है. साल 2021 में ये संख्या 7 थी. इस साल कांग्रेस सभी 291 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि 2021 में पार्टी ने CPI(M) के साथ गठबंधन में 92 सीटों पर उम्मीदवार दिया था. 2021 के मुकाबले 2026 में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 7.6 फीसदी से बढ़कर 11.9 फीसदी हो गई है.
बंगाल को महिला मुख्यमंत्री देने वाली तृणमूल कांग्रेस ने महिला उम्मीदवारों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी की है. साल 2021 में पार्टी ने 48 महिलाओं को टिकट दिया था. इस बार ये आंकड़ा 52 पहुंच गया है. यानी 16.55 फीसदी से बढ़कर 17.86 फीसदी.
महिला आरक्षण पास होने में रोड़ा बनने का आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी बीजेपी का हाल भी जान लीजिए. पार्टी ने बंगाल चुनाव में पिछली बार 38 महिला उम्मीदवारों पर भरोसा जताया था. इस बार ये आंकड़ा घटकर 33 हो गया. यानी बीजेपी ने इस बार 5 कम महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है. बाकी सभी पार्टियों में संख्या कम से कम बढ़ी तो है. बीजेपी ने तो घटा ही दिया.
तमिलनाडु का हालतमिलनाडु में सत्तारूढ़ DMK और विपक्षी AIADMK गठबंधन में आमने-सामने की भिड़ंत है. राज्य में 234 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं. DMK ने 176 और AIADMK ने 172 सीटों पर उम्मीदवार दिए हैं. दोनों पार्टियों ने एक बराबर 19 महिलाओं को टिकट दिया है. दोनों का प्रतिशत (11 परसेंट) लगभग एक बराबर है. साल 2021 में AIADMK ने 17 सीटों पर महिला कैंडिडेट उतारा था. वहीं DMK ने 13 महिलाओं को टिकट दिया था. इस बार दोनों ने महिला कैंडिडेट्स की संख्या बढ़ाई है.
केरलम में बीजेपी और कांग्रेस ने साल 2021 चुनाव के मुकाबले महिला उम्मीदवारों की संख्या में कटौती की है. वहीं लेफ्ट पार्टियां CPI और CPI(M) ने महिलाओं को टिकट देने में थोड़ी उदारता बरती है. बीजेपी ने पिछली बार के मुकाबले महिलाओं को कम टिकट दिया है लेकिन कम सीटों पर लड़ने के चलते महिला उम्मीदवारी का प्रतिशत 13.9 से बढ़कर 14.3 हो गया है. वहीं कांग्रेस का प्रतिशत 10.8 से घटकर 9.9 रह गया है.
लेफ्ट अलायंस की सबसे बड़ी पार्टनर CPI(M) ने महिला उम्मीदवारों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी की है. पिछले चुनाव में उन्होंने 14.7 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया था. इस बार ये आंकड़ा बढ़कर 15.6 हो गया है.
असम में कितनी महिलाओं को टिकटअसम चुनाव की बात करें तो साल 2021 में कांग्रेस ने 9 महिलाओं को टिकट दिया था. इस बार ये आंकड़ा बढ़कर 13 हो गया. वहीं साल 2021 में बीजेपी ने 7 महिला उम्मीदवारों पर भरोसा जताया था. इस बार ये संख्या घटकर 6 रह गई. महिलाओं के लिए कोटा फिक्स करने वाला विधेयक सितंबर 2023 में पारित हुआ था. इसके बाद से महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी में बेहद सीमित बढ़ोतरी हुई है. 16 अप्रैल को इस कानून को लागू करने को नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया. हालांकि इसके बावजूद संसद और राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं को तुरंत 33 फीसदी आरक्षण नहीं मिलेगा.
विधेयक पारित होने के बाद का हालविधेयक पारित होने के बाद केवल 6 ऐसे उदाहरण रहे हैं, जब पार्टियों ने 20 फीसदी से ज्यादा महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इसमें कांग्रेस सबसे आगे रही है. पार्टी ने 2024 के सिक्किम विधानसभा चुनाव में 12 उम्मीदवार दिए थे. इसमें 4 महिलाएं थीं. यानी 33.3 फीसदी. साल 2024 में ही हुए झारखंड चुनाव में 'ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन'(AJSU) पार्टी ने 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारा था, जिसमें 3 महिलाएं थीं. यानी 30 फीसदी.
वहीं इसी साल हुए ओडिशा चुनाव में बीजू जनता दल (बीजद) ने 23.8 फीसदी, झारखंड कांग्रेस ने 23.3 फीसदी, साल 2023 चुनाव में छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने 20 फीसदी और साल 2026 के केरल चुनाव में CPI ने 20.8 फीसदी महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था. इन सभी राज्यों में हुए पिछले चुनाव में इनमें से किसी भी पार्टी ने 20 फीसदी से ज्यादा महिलाओं को टिकट नहीं दिया था.
साल 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के पहले और बाद में हुए विधानसभा चुनावों की तुलना करें तो 38 मौकों पर पार्टियों ने महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई है. वहीं 24 मौकों पर महिला उम्मीदवारों की संख्या में गिरावट दर्ज हुई है. इसमें से केवल 10 मौके ही ऐसे रहे, जिनमें उम्मीदवारों की संख्या कम से कम 5 फीसदी बढ़ी है. महिला उम्मीदवारों के अनुपात में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी बीजू जनता दल ने की है. पार्टी ने साल 2019 में 146 सीटों में से 20 पर महिला उम्मीदवार उतारे थे. साल 2024 के चुनाव में ये आंकड़ा बढ़कर 30 हो गया.
बीजेपी और कांग्रेस का क्या हाल?
बीजेपी महिला आरक्षण को लेकर सबसे ज्यादा मुखर दिखी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधेयक से जुड़े संशोधनों को लागू कराने की लिए भावुक अपील भी की थी. विधेयक गिर जाने के बाद राष्ट्र के नाम संबोधन भी दिया. विपक्षी पार्टियों को जमकर कोसा भी. लेकिन साल 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद से महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में बीजेपी का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है.
बीजेपी ने साल 2023 के चुनाव में झारखंड में 17.6 और छत्तीसगढ़ में 16.7 फीसदी टिकट महिलाओं को दिया था. महिलाओं को टिकट देने में ये पार्टी का सबसे बेहतर प्रदर्शन था. महिला आरक्षण कानून पारित होने से पहले बीजेपी ने महिलाओं को सबसे ज्यादा हिस्सेदारी साल 2018 में हुए छत्तीसगढ़ और मिजोरम चुनाव में दिया था. छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 15.6 फीसदी और मिजोरम में 15.4 फीसदी टिकट दिया था. बीजेपी ने इस साल हुए पुडुचेरी चुनाव में कोई महिला उम्मीदवार नहीं उतारा. पार्टी ने इस मामले में साल 2021 का अपना ट्रैक रिकॉर्ड कायम रखा.
दूसरी ओर महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद से कांग्रेस ने सिक्किम में सबसे ज्यादा 33.3 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया. वहीं झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा रही. इसके अलावा पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश में 15.8 फीसदी टिकट महिलाओं को दिया. आरक्षण विधेयक पारित होने के पहले कांग्रेस ने झारखंड में सबसे ज्यादा 19.4 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया था. वहीं इसी साल सिक्किम में 16.7 फीसदी और साल 2020 में दिल्ली में 15.2 फीसदी महिलाओं पर भरोसा जताया था.
जिन राज्यों में पार्टियों ने महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर जैसी योजनाओं का ऑफर दिया, वहां महिला उम्मीदवारों की संख्या भी आमतौर पर बढ़ी है. उदाहरण के तौर पर साल 2023 के मध्य प्रदेश, 2024 के महाराष्ट्र और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में अधिकतर पार्टियों ने महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाई. हालांकि ये बढ़त मामूली ही रही. हालांकि बिहार में महिलाओं के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना लाने वाले नीतीश कुमार की जदयू ने महिला उम्मीदवारों को टिकट देने में कंजूसी बरती. उन्होंने पिछले चुनाव के मुकाबले महिलाओं के टिकट में कटौती कर दी.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: संसद में राहुल-शाह के बीच किस बात पर बहस हो गई?




















