एक तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC लागू करने पर उतारू हैं. दूसरी तरफ, उनके ही गठबंधन सहयोगी उनसे इत्तेफाक नहीं रख रहे. अमित शाह 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले 'नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस' (NDA) शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य बता रहे हैं. लेकिन, NDA के अंदर ही इस मुद्दे पर सहयोगी दलों के सुर अलग-अलग हैं.
'NDA शासित राज्यों में लागू होगा UCC', अमित शाह के ऐलान पर सहयोगी ही नहीं राजी, अब क्या करेंगे?
UCC को लेकर बीजेपी का रुख स्पष्ट रहा है कि इसे देश भर में लागू किया जाएगा. गृहमंत्री अमित शाह ने भी इस बारे में कहा है कि सभी NDA शासित राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होगा. हालांकि, बीजेपी के लिए मुश्किल अपने सहयोगियों को मनाने की भी है.

TDP कह रही है कि UCC पर आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन पहले ड्राफ्ट और अलग-अलग स्टेहोल्डर्स से बातचीत जरूरी है. लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) (LJP-RV) भी जल्दबाजी के खिलाफ है और डिटेल्ड डिसक्शन की मांग कर रही है. जनता दल यूनाइटेड यानी JD(U) ने तो साफ कर दिया है कि बिहार में फिलहाल UCC लागू करने के लिए तैयार नहीं है.
यानी BJP के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ UCC लागू करने का नहीं, बल्कि अपने ही सहयोगियों को साथ लेकर चलने का है. तो आखिर NDA के अंदर UCC पर ये अलग-अलग राय क्यों हैं? JD(U) बिहार में इसका विरोध क्यों कर रही है? और क्या UCC का मुद्दा NDA के भीतर नई राजनीतिक खींचतान पैदा कर सकता है? इन सभी सवालों के जवाब एक-एक कर समझते हैं.
पहले UCC को आसान भाषा में समझ लीजिए. UCC यानी Uniform Civil Code का मतलब है कि धर्म के आधार पर अलग-अलग पर्सनल लॉ की व्यवस्था खत्म कर दी जाए. शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने और ऐसे दूसरे सिविल मैटर्स में एक समान कानूनी व्यवस्था हो. संविधान के Article 44 में भी राज्य को नागरिकों के लिए Uniform Civil Code सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है.
अब आते हैं उस बयान पर, जिसने पूरी बहस फिर गर्म कर दिया है. तो हुआ ये कि 13 सितंबर को मुंबई में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA की सरकार वाले सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा. उन्होंने कहा कि कई राज्यों में UCC पहले ही लागू किया जा चुका है और बाकी NDA शासित राज्यों में भी इसे लागू किया जाएगा.
TDP का क्या रुख है?अमित शाह के इस बयान के अगले ही दिन NDA के अंदर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगीं. सबसे पहले बात करते हैं तेलुगु देशम पार्टी (TDP) की. आंध्र प्रदेश में TDP की सरकार है, और BJP उसकी सहयोगी है. NDA में TDP की स्थिति बेहद अहम मानी जाती है.
TDP के लोकसभा नेता लावू श्रीकृष्ण देवरायालु ने कहा कि अभी पार्टी के भीतर UCC को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है. लेकिन जब जरूरत होगी, पार्टी इस पर विचार करेगी और इसे अपनाने से पहले अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स को भी बातचीत में शामिल किया जाएगा.
यानी TDP ने UCC को खारिज नहीं किया है, लेकिन अमित शाह के 2029 वाले बयान पर तत्काल हां भी नहीं कहा है. TDP का रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी केंद्र की NDA सरकार में BJP की एक महत्वपूर्ण सहयोगी है. इसलिए UCC जैसे BJP के बड़े वैचारिक मुद्दे पर TDP का रुख केंद्र के लिए मायने रखता है.
बिहार में JD(U) का अलग मतअब आते हैं बिहार पर, जहां मामला थोड़ा ज्यादा दिलचस्प है. यहां BJP की सहयोगी JD(U) ने UCC पर अपनी अलग लाइन रखी है. 14 सितंबर को JD(U) के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने कहा कि पार्टी संसद में UCC बिल का समर्थन करती है, लेकिन बिहार में इसके इम्प्लीमेंटेशन का विरोध करेगी.
इस बयान के बाद JD(U) ने बातचीत का रास्ता भी खुला रखा है. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा है कि वो जल्द केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर UCC के मुद्दे पर चर्चा करेंगे. यानी JD(U) की तरफ से केंद्र के साथ बातचीत से इनकार नहीं है, लेकिन बिहार में इसे लागू करने को लेकर पार्टी की आपत्ति साफ दिखाई दे रही है.
JD(U) ऐसा क्यों कर रही है?इसका जवाब बिहार की राजनीति और JD(U) के पुराने रुख में छिपा है. नीतीश कुमार और JD(U) पहले भी UCC पर यह कहते रहे हैं कि अगर ऐसा कानून आता है तो सभी समुदायों को साथ लेकर आम राय बनना चाहिए. यानी पार्टी का जोर सिर्फ कानून बनाने पर नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति पर रहा है.
बिहार सामाजिक और धार्मिक तौर पर बेहद डायवर्स स्टेट है. ऐसे में JD(U) के लिए UCC का मुद्दा सिर्फ कानून का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का भी सवाल है. यही वजह है कि पार्टी फिलहाल बिहार में इसके इम्प्लीमेंटेशन पर खुलकर हामी भरने से बच रही है.
LJP (राम विलास) की भी सुनिएNDA में सिर्फ JD(U) ही सावधानी बरतने वाली पार्टी नहीं है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने भी UCC पर अभी अपना अंतिम रुख नहीं बताया है. चिराग पासवान ने कहा कि भारत का सोशल फैब्रिक डायवर्स है और अलग-अलग समुदायों की अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज हैं.
उन्होंने संविधान के पांचवे और छठे शेड्यूल, आर्टिकल 371A और आर्टिकल 371G और अनुसूचित जनजाति को मिलने वाली छूट का भी जिक्र किया. चिराग ने कहा कि पहले UCC का ड्राफ्ट सामने आना चाहिए, फिर सभी स्टेकहोल्डर्स के हितों का आकलन और डिटेल्ड डिस्कशन होना चाहिए. इसके बाद ही उनकी पार्टी अपना अंतिम फैसला बताएगी.
यानी LJP भी UCC के खिलाफ सीधे नहीं खड़ी हुई है, लेकिन पार्टी ने साफ कर दिया है कि ड्राफ्ट देखे बिना और डिटेल्ड डिस्कशन के बिना कोई अंतिम फैसला नहीं होगा. वहीं NDA की कुछ दूसरी सहयोगी पार्टियों ने UCC का समर्थन किया है. शिवसेना और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) यानी HAM (S) की तरफ से अमित शाह के बयान का समर्थन किया गया है.
यानी NDA की तस्वीर फिलहाल तीन हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है-
पहला- BJP और कुछ सहयोगी पार्टियां UCC को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं.
दूसरा- TDP और LJP जैसी पार्टियां कह रही हैं कि पहले ड्राफ्ट सामने आए, स्टेकहोल्डर्स से बात हो और उसके बाद फैसला लिया जाए.
तीसरा- JD(U) ने बिहार में इसके इम्प्लीमेंटेशन पर फिलहाल आपत्ति जता दी है.
UCC पर विपक्ष का रुखऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अमित शाह के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. ओवैसी ने आरोप लगाया कि BJP UCC के नाम पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना चाहती है. उनका कहना है कि UCC समानता की बात नहीं, बल्कि मुस्लिमों को टारगेट करने की कोशिश है. उन्होंने इसे बहुसंख्यकों के तौर-तरीकों को अल्पसंख्यकों पर थोपना बताया.
विपक्ष की तरफ से UCC को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी UCC को जल्दबाजी में लागू करने की कोशिश पर सवाल उठाया था और 21वें लॉ कमीशन की उस राय का हवाला दिया था, जिसमें उस समय UCC को न तो जरूरी माना गया था और न ही इसे लागू करने की भारी मांग की स्थिति थी.
हालांकि यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है, अभी 21 राज्यों में UCC लागू करने की बात एक साथ किसी एक सेंट्रल लॉ के जरिए नहीं कही गई है. BJP-NDA सरकारें इसे राज्य स्तर पर आगे बढ़ा रही हैं. उत्तराखंड पहले ही UCC लागू कर चुका है, जबकि कुछ अन्य राज्यों ने भी कानून पास किया है.
यही वजह है कि अब सवाल ये भी है कि बाकी NDA शासित राज्यों में इसका मॉडल क्या होगा, किन समुदायों और परंपराओं को छूट मिलेंगी और क्या सभी राज्यों में एक जैसा कानून होगा या अलग-अलग राज्यों के कानूनों में कुछ अंतर रहेगा.
यही सवाल NDA के अंदर भी चर्चा का कारण बन रहे हैं. क्योंकि BJP के लिए UCC लंबे समय से एक बड़ा वैचारिक मुद्दा रहा है. लेकिन NDA सिर्फ BJP का गठबंधन नहीं है. इसमें ऐसी पार्टियां भी हैं जिनकी अपनी रीजनल पॉलिटिक्स, अपना वोटर बेस और अलग सामाजिक समीकरण हैं.
TDP को आंध्र प्रदेश में अपने राजनीतिक समीकरण देखने हैं. JD(U) को बिहार के सामाजिक समीकरण. LJP (रामविलास) भी बिहार के अपने आधार और अलग-अलग समुदायों के बीच संतुलन को ध्यान में रखकर चल रही है.
इसलिए अमित शाह ने 2029 की डेडलाइन भले ही बता दी हो, लेकिन जमीन पर UCC लागू करने की राह हर NDA राज्य में एक जैसी नहीं होने वाली. JD(U) का मामला फिलहाल सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है.
क्योंकि एक तरफ पार्टी केंद्र में UCC को लेकर बातचीत के लिए तैयार है, वहीं दूसरी तरफ उसके नेता बिहार में इसके इम्प्लीमेंटशन का विरोध कर रहे हैं. अब संजय झा की अमित शाह से होने वाली मुलाकात में ये साफ होगा कि दोनों पार्टियों के बीच इस मुद्दे पर कोई कॉमन ग्राउंड निकलता है या नहीं. फिलहाल UCC पर NDA की तस्वीर यही है.
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BJP 2029 से पहले 21 NDA शासित राज्यों में इसे लागू करने का लक्ष्य बता रही है, लेकिन उसके सहयोगी दलों में कोई पूरी तरह साथ है, कोई ड्राफ्ट और कनक्लूजन का इंतजार कर रहा है और JD(U) ने बिहार को लेकर अपनी आपत्ति सामने रख दी है. अब देखना यही होगा कि BJP अपने सबसे बड़े वैचारिक मुद्दों में से एक UCC पर सहयोगियों को साथ कैसे लाती है और क्या बिहार में JD(U) के साथ कोई रास्ता निकलता है.
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