आज का दिन अच्छी और बुरी ख़बरों के साथ आया. जहां एक ओर भारत अपने 72वां गणतंत्र दिवस मनाया. तमाम सेलिब्रेशन और झांकियों के साथ. वहीं दूसरी ओर किसानों की ट्रैक्टर रैली हिंसक हो उठी. हिंसा से जुड़ी तमाम ख़बरें आपतक ज़रूर पहुंची होंगी. तय समय के पहले ही किसानों का एक बड़ा ग्रुप दिल्ली में घुसा. सिंघु बॉर्डर से किसान ITO और प्रगति मैदान तक पहुंचे. पुलिस की बैरीकेडिंग गिराई. एक बस पलट दी. तलवारें निकाल लीं. पत्थर फेंके. लाल किले पर तक चढ़ गए. एक प्रोटेस्टर का वीडियो दिखा जिसमें वो जानबूझकर एक पुलिस वाले पर ट्रेक्टर चढ़ाने की कोशिश कर रहा था. क्या सचमुच हमारे किसान ऐसे ही दिखते हैं?
किसान आंदोलन में एक्टिव औरतें गणतंत्र दिवस पर हुई ट्रैक्टर रैली और हिंसा के वक़्त कहां थीं?
इस हिंसा का महिला किसानों पर क्या असर होगा?


बचपन में हिंदी की किताबों में तस्वीरें बनी होती थीं. किसान की. कुरता-धोती पहने, सर पर गमछा बांधे. लहलहाती फसल के बीच खड़ा. जब किसानों के लिए बनी सरकारी स्कीमों और योजनाओं के अखबारों में इश्तेहार निकलते हैं तो ठीक वैसे ही किसान उनमें भी दिखते हैं. हमारी सोच के दायरे ने हमारी कल्पनाओं को शुरुआत से ही इतना सीमित रखा कि किसान शब्द सुनकर हम महिलाओं की कल्पना ही नहीं कर पाते. पत्रकार प्रीता नायर आउटलुक मैगज़ीन के ताज़ा अंक में महिला किसानों के बारे में लिखती हैं. कि एक क्रांतिकारी कहावत है कि महिलाओं ने आधा आकाश अपने हाथों से संभाल रखा है. जबकि सच तो ये हैं कि महिलाओं ने आधी धरती की कोख से अन्न निकालने का ज़िम्मा भी उठा रखा है.

हम अक्सर किसान की इस तरह की तस्वीर को इमेजिन करते हैं. (फोटो- PTI)
किसान आंदोलन जबसे शुरू हुआ, उसमें महिलाएं दिखीं. ढेर सारी औरतें इस बात को मजबूती से कहती नज़र आईं कि वे भी किसान हैं. वे घंटों खेतों में काम करती हैं. और इस आंदोलन में अपने हक़ के लिए बैठी हैं. हफ्ते भर पहले से ख़बरें आईं कि ये महिला किसान गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर चलाएंगी. सैकड़ों महिलाओं ने ट्रेनिंग भी ली. ऐसा सुनने में आया. दुर्भाग्यवश, आज ये महिलाएं मीडिया रिपोर्ट्स में कहीं दिखी नहीं. तो कहां थीं महिलाएं?
मुंबई का आज़ाद मैदान. 25 जनवरी के दिन हजारों की संख्या में किसान नाशिक, दहानु, पालघर, धुले, और नंदरबार जैसे शहरों से मुंबई पहुंचे. महिलाएं घर से रोटियां और कपड़े पैक करके निकलीं कि इस साल गणतंत्र दिवस अलग तरीके से मनेगा. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि आज़ाद मैदान में बैठी इन महिलाओं में कोई पांच बच्चों की मां है. तो कोई अपने बच्चों को दादा-दादी के पास छोड़कर आई है.

लाल किले में किसान आंदोलन में शामिल एक आदमी झंडा फहराते हुए. (फोटो- PTI)
एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?
महिलाओं का बड़े आंदोलन में दब जाना उतना ही आम है. जितना महिला किसानों का सरकारी कागजों में अदृश्य होना. द पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे 2018 के मुताबिक़ लगभग तीन-चौथाई ग्रामीण महिलाएं खेतों में काम करती हैं. मगर जब बात ज़मीन की आती है, तो खेती की ज़मीन के मालिकों में कुल 13 फीसद ही औरतें हैं. यानी आधे के आधे का आधा. ऑक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, महज़ 100 में से 8 महिला किसान ऐसी होती हैं जो असल में वो कमाई जेब में रख पाती हैं जिसकी वो हकदार होती हैं. अब चूंकि हम इस मसले पर आ चुके हैं. आंदोलन से अलग चलते हैं. सुनते हैं खाद्य और कृषि विशेषज्ञ देवेंदर शर्मा की बात. जिसमें वो कृषि क्षेत्र में गहरे पैठे भेदभाव पर बात कर रहे हैं. न सिर्फ कमाई के स्तर पर. बल्कि रिसर्च के लेवल पर भी. उनका कहना है,
"जहां तक भारत का सवाल है, दुनिया के भी एग्रीकल्चर का सवाल है, तो मेरा मानना है कि वहां भी हालत कुछ ज्यादा अलग नहीं है. सच्चाई ये है कि हमने महिला किसान को एक अदृश्य किसान माना है आज तक. और इसका हमारे दिमाग में बहुत इम्प्रेशन है कि जब भी हम किसान की बात करते हैं, तो हमारे ज़हन में जो इमेज आती है वो एक मेल फार्मर की आती है. ये भी हम जानते हैं कि तकरीबन 70 फीसद जो वर्क फोर्स है, उसमें महिलाओं का रोल है. महिलाओं का शेयर है. तो इस हालत में महिला किसान के ऊपर जो फोकस होना चाहिए, वो हमारी जो पूरी पॉलिसी प्लानिंग की या डेवलपमेंट का पूरा प्रोसेस है उसमें वो कहीं दर्शाता नहीं है. आप देखिए एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटीज़ के रिसर्च के प्रोग्राम देख लीजिए, उनकी जो मशीनरी बनती हैं, उसे देख लीजिए. उसमें जो मशीनरी बनती हैं, वो अधिकतर मशीन पुरुष किसान की ज़रूरत के हिसाब से बनी हैं, न कि फीमेल फार्मर्स के. यही सोच डेवलपमेंट प्लान्स में भी देखेंगे कि हमने कभी फीमेल फार्मर को उतनी जगह नहीं दी, अहमियत नहीं दी है, जितनी हमें देनी चाहिए."
ये देश का दुर्भाग्य है कि हर साल हजारों किसान आत्महत्या करते हैं. और नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो का आंकड़ा बन जाते हैं. उनकी पत्नियां उनके जाने के बाद उनके हिस्से का क़र्ज़ भरती हैं. जिनके पति गाँव छोड़कर शहरों में छोटी नौकरियां पकड़े हुए हैं. उनकी पत्नियां खेतों में A टू Z पूरा काम करती हैं. मगर ऐसा कम ही होता है कि पति के जाने के बाद उसके हिस्से की ज़मीन पत्नी के हिस्से आ जाए. नतीजतन सरकारी योजनाएं भी पुरुष किसान तक ही पहुंचती हैं.

हैदराबाद में रैली करतीं महिला किसान. (फोटो- सीमा कुलकर्णी)
भारत का किसान एक ऐसा तबका है जो क़र्ज़ के दुश्चक्र से निकलने के हरसंभव प्रयास में लगा है. एक ऐसे दबे हुए तबके में महिला होना मुश्किल है. दलित महिला हैं तो और भी मुश्किल. घरों से कपड़े और खाना बंधकर विरोध प्रदर्शन के लिए निकली ये महिलाएं हिंसा के लिए नहीं आई थीं. मगर इस हिंसा के दुष्प्रभाव सहने पर मजबूर ज़रूर होंगी. कैसे. ये समझने के लिए हमने बात की सीमा कुलकर्णी से. जो महिला किसान अधिकार मंच से जुड़ी हैं. और मानती हैं कि देश के एक हिस्से में एक गुट द्वारा की गई हिंसा से पूरी आन्दोलन की तस्वीर नहीं रंगनी चाहिए. उनका कहना है,
"एक ही तरह की पिक्चर नहीं है. अलग-अलग चीज़ें घट रही हैं. और मुझे लगता है कि वो इंस्पिरेशनल वीडियो भी दिखाने ज़रूरी हैं. वो विज़ुअल्स भी पहुंचना ज़रूरी है कि सब जगह पर इतनी मायूसी नहीं है. मुझे लगता है कि ये भी ज़रूरी है. एक जगह पर हिंसा होती है और वही प्रोजेक्ट होता है तो निश्चित रूप से उसके निगेटिव परिणाम होंगे. सायकोलॉजिकली भी होंगे. प्रत्यक्ष, फिज़िकल पार्टिसिपेशन में भी होंगे. जो लोग कमिटेड हैं, हर पक्ष के फैक्ट्स प्रोवाइड करने के लिए, मुझे लगता है कि वो विज़ुअल्स भी ज़रूर दें. और मैं एग्री करती हूं कि हिंसा कोई समाधान नहीं है. लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि इस हिंसा से सभी कमज़ोर लोग हैं, महिलाएं भी इनमें आती हैं, तो निश्चित रूप से इससे प्रभावित होंगे."
ये बात थी महिला किसानों की. जो किसी भी दिन की जा सकती थी. लेकिन आज की गई. क्योंकि आज हमारा गणतंत्र 72 साल का हो गया है.











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