ट्रांसमैन, ट्रांसवुमन या ट्रांसजेंडर मल्लब क्या?
हिजड़ा, छक्का, मीठा, नरम. कितनी सहजता से ये शब्द आप इस्तेमाल करते हैं. कोई पुरुष कोई ऐसी हरकत करे जो औरतों वाली मानी जाती है, तो इनमें से कोई एक शब्द बिना सोचे समझे आपके मुंह से सरक आएगा बाहर.मोटे तौर पर आप ट्रांसमैन या ट्रांसवुमन या ट्रांसजेंडर शब्द को कैसे समझते हैं. ऐसे कि आप सिग्नल पर अपनी गाड़ी में या ऑटो में या कैब में बैठे होंगे और एक व्यक्ति आपसे पैसे मांगने आएगा, जो आपकी नज़र में न औरत दिखता होगा, न पुरुष. या फिर आपके घर में बच्चा होगा और शगुन लेने के नाम पर गाजे बाजे के साथ एक किन्नरों का ग्रुप आएगा जो आपसे हजारों रुपये ऐंठकर ले जाएगा.
मगर क्या आपने कभी सोचा कि स्कूल में आपकी टीचर एक ट्रांसवुमन हो. या आप जिस डॉक्टर को दिखाने जाएं वो ट्रांसजेंडर हो. या दफ्तर में आपका बॉस ट्रांसजेंडर हो. नहीं सोचा न. इसलिए नहीं सोचा क्योंकि ट्रांस समुदाय को उनकी सेक्स चॉइस की वजह से हमेशा समाज के लिए एक शाप, एक खतरा, एक बुरा इन्फ्लुएंस माना जाता रहा. और इसी वजह से ट्रांसजेंडर समुदाय भी सिग्नल पर पैसे मांगने वाले दुश्चक्र से बाहर निकलने का प्रयास करता रहा है.

फोटो क्रेडिट - 'चंडीगढ़ करे आशिक़ी' ट्रेलर
खैर, हम लौटते हैं एक बार फिर फिल्म के ट्रेलर पर. फिल्म में वाणी कपूर यानी मानवी के किरदार को देखकर मनु यानी आयुष्मान को पता ही नहीं पड़ता कि मानवी ट्रांस हो सकती है. क्योंकि वो बिलकुल आम महिला सी दिखती है. वो प्रेम में पड़ जाते हैं और फिर शुरू होती है कॉमेडी. अब ये कॉमेडी क्या ट्रांस इशूज़ को सेंसिटिव तरीके से ट्रीट करेगी? ये फिल्म रिलीज़ होने के बाद ही पता चलेगा. लेकिन हमने खुद कुछ ट्रांसजेंडर्स से बात की. ताकि हम आपको बता सकें कि उनकी लाइफ असल में कोई कॉमेडी नहीं है. बल्कि कॉमेडी से बहुत, बहुत दूर है.
लोगों की आपबीती -
क्या होता है जब एक लड़का महसूस करता है कि अब वो और लड़का नहीं कहलाना चाहता? कैसा महसूस होता है उस यंग उम्र में. और फिर कितना मुश्किल होता है उस शरीर को छोड़ने का फैसला लेना. ये समझा हमने ज़ोया से. ज़ोया मुंबई में रहती हैं और एक फोटो-जर्नलिस्ट हैं."शरीर एक ही है, आत्मा भी एक ही है. बस भाव अलग है. और यही जो भाव हैं एक पुरुष से महिला में कन्वर्ट होने का, उसे समाज को स्वीकार करने में वक्त लगता है. मैं जब पांच साल की थी, सभी बच्चों की तरह मैं सारे खिलौनों से खेलती थी. लेकिन कुछ बच्चे होते हैं न, जो थोड़ा गर्ली खेल खेलते हैं, लड़कियों के साथ ज़्यादा खेलते हैं. उनका बोलने का लहजा थोड़ा गर्ली हो जाता है. अब ऐसे बच्चों के साथ सबसे बड़ी समस्या ये है कि वो अपने आप को स्वीकार नहीं कर पाते. कभी 11 साल की उम्र में कर पाते हैं, कभी 15 और कभी तो 20 के पार.ट्रांसवुमन बनने के प्रोसेस में सेक्स री-असाइनमेंट सर्जरी से गुजरना पड़ता है. सेक्स चेंज का ये प्रोसेस कैसे अनुभव लेकर आता है, ये भी समझिए ट्रांसवुमन सोनाली से..
मुझे भी बहुत दिक्कत हुई अपने सच को स्वीकारने में. मुझे मेरी उम्र के लड़के बहुत चिढ़ाते थे, बुली करते थे. उस वक्त मेरी बड़ी बहन सबसे बड़ी स्पोर्ट रही. वो मेरे लिए उनसे लड़ती थी. फिर 11 साल की उम्र में मैंने ये स्वीकार किया कि मैं लड़कों के प्रति ज़्यादा आकर्षित हूं. मुझे मेकअप करना अच्छा लगता है."
सबसे पहले तो हम ये कहना चाहते हैं कि हम किसी गलत शरीर में नहीं फंसे थे. हम एक गलत समाज में फंसे हैं, जो अंग्रेज़ों ने हम पर थोपा था. मेरे अंदर से हमेशा हमें लगता था कि हम एक औरत हैं और एक औरत बनना चाहते हैं. तो जैसे कहते हैं न जो ईश्वर नहीं कर सकता, डॉक्टर कर सकता है. फिर हमने जेंडर री-असाइनमेंट सर्जरी करवाने का फैसला किया.ट्रांसपरसन होने के चलते और किस तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ता है, ये भी हमें ज़ोया ने बताया.
हम जब लड़कों के बीच जाते थे या लड़कियों के बीच जाते थे, तो हमारे साथ भेदभाव होता था. फिर जैसे जैसे हम बड़े हुए, हमें समझ आया है कि हम अलग हैं. समाज ने हमेशा हमें बताया था कि तुम लड़की नहीं हो, लड़का हो. लेकिन हमें हमेशा लगता था कि हम लड़की हैं.
सर्जरी के समय न समाज सपोर्ट करता है, न परिवार. फिर बहुत सारे ट्रांसजेंडर, ख़ास कर ट्रांसवुमन, किसी किसी तरह पैसे जुटाती हैं. भीख मांगती हैं, सेक्स वर्क करती हैं.
"परिवार का बिलकुल सपोर्ट नहीं मिलता. ज़्यादातर, ट्रांसजेंडर्स को घर से निकाल दिया जाता है. परिवार वालों को हमारी आइडेंटिटी की वजह से शर्मिंदगी महसूस होती है. इस वजह से ट्रांसजेंडर्स को न प्रॉपर एजुकेशन मिलती है, न माहौल. परिवार का अपनापन भी नहीं मिलता, जैसे परिवार के अन्य बच्चों को मिलता है.तो उम्मीद है कि म्याऊं का ये एपिसोड आपके लिए कुछ नॉलेज लेकर आया होगा. कुछ पॉज़िटिव महसूस करवा पाया होगा. और आपको ट्रांस समुदाय के प्रति कुछ और सेंसिटिव बना पाया होगा. तो इस फिल्म का ट्रेलर देखकर अपनी राय दीजिये. और ट्रांस पर्सन्स के लिए हम सोशल और लीगल स्तर पर क्या बदलाव ला सकते हैं, ये भी सुझाइए. हमें आपके रिस्पॉन्स का इंतजार रहेगा.
अब जैसे हम कहीं रह रहे हैं या कहीं गए और वहां एक कॉमन टॉयलेट है. अब हम अपने आप को पूरी तरह से वुमन ही रिकग्नाइज़ करते हैं, स्वाभाविक है कि हम फीमेल टॉयलेट में जाएंगे. लेकिन अगर कोई औरत बाहर आ कर खटखटाए और हम बोल दें कि हम अंदर हैं, तो हमारी बोल्ड आवाज़ की वजह से वो भड़क जाती है.
अब जैसे हम किसी पब्लिक प्लेस पर जाते हैं, किसी रेस्त्रां में जाते हैं तो हमें स्वीकार नहीं किया जाता. गेट से ही निकाल दिया जाता है. लोगों की नज़र में आज भी यही है कि ट्रांस केवल नाच गाना करते हैं, ट्रैफिक सिग्नल पर पैसे मांगने जाते हैं. आखिर, हम भी इंसान है. हमारी भी इच्छाएं हैं. हमने भी मेहनत कर के पैसे कमाए हैं. हमें भी सामान्य तौर पर देखा जाना चाहिए."










