मैनिफेस्टो में महिलाओं के लिए कई सारे वादे किए गए. जैसे-
# टिकट बंटवारे में 40 प्रतिशत आरक्षण # आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को 10000 का मानदेय # छात्राओं को स्मार्ट फोन और स्कूटी, # फ्री बस सेवा # औरतों को हर साल तीन घरेलू सिलिंडर मुफ्त.
पहली बात. टाइम्स नाउ के एक कार्यक्रम में जब स्मृति से प्रियंका गांधी के कैम्पेन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'वो शायद कह रही हैं कि घर पर लड़का है, लड़ नहीं सकता है.' वैसे तो उनका इशारा राहुल गांधी की तरफ था. पर राहुल गांधी पर हमला करने की कोशिश में स्मृति ने तमाम औरतों को, उनके संघर्ष को डिसक्रेटिड कर दिया. क्या घर में लड़के के होने का मतलब ये है कि लड़ने का, पढ़ने का, आगे बढ़ने का पहला हक उसका ही है. क्या इसका मतलब ये है कि लड़का नकारा निकले तो लड़की को घर से निकलना पड़ता है. औरत के आगे बढ़ने के लिए पुरुष का इनकम्पिटेंट होना ज़रूरी नहीं है. ये बात कम से कम देश की महिला एवं बाल विकास मंत्री को तो पता होनी ही चाहिए.
प्रियंका गांधी के स्लोगन पर स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रियंका के कहने का मतलब है कि 'घर पर लड़का है, लड़ नहीं सकता.'दूसरी बात. स्मृति ने ये कहा कि 30 प्रतिशत आरक्षण का मतलब ये है कि प्रियंका 70 प्रतिशत सीटों पर औरतों को खड़ा नहीं करना चाहती हैं. वैसे कांग्रेस 40 प्रतिशत आरक्षण की बात की है. हम यहां कोई पार्टी नहीं बन रहे, लेकिन आरक्षण का मतलब होता है कि कम से कम उतनी सीटें एक वर्ग विशेष के लिए आरक्षित होंगी. कम से कम. असल बंटवारे में 40 प्रतिशत से ज्यादा सीटें भी दी जा सकती हैं. कितना अच्छा होता अगर प्रियंका के आरक्षण वाली बात के जवाब में स्मृति उससे ज्यादा नहीं तो कम से कम ये वादा करतीं कि 2024 के चुनाव से पहले उनकी पार्टी महिला रिज़र्वेशन बिल पास करवा देगी. या ये बता देतीं कि उनकी पार्टी राजनीति में औरतों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में क्या-क्या कर रही है. पर वो ये बोलती रहीं कि कैसे कोई सिस्टम एक लिंग या एक समुदाय के लिए जिम्मेदार नहीं है. जबकि सिस्टम को हर एक लिंग, हर एक समुदाय और हर एक व्यक्ति और उसके विकास प्रति जिम्मेदार होना होगा. उसके प्रति तो खासकर जो थोड़ा पीछे रह गया है.
स्मृति ने एक अच्छी बात कही कि जब कोई जन प्रतिनिधि चुना जाता है तो उसकी जिम्मेदारी केवल अपने लिंग के लोगों के लिए काम करने की नहीं होती. वो सबके लिए जिम्मेदार है. उसे सबके लिए काम करना चाहिए. लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी औरतों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगी, तो उस पर वो उस दौर का किस्सा बताने लगीं जब अरुण जेटली विपक्ष के नेता हुआ करते थे. कि तब प्रतिबद्धता दिखाते हुए उनकी पार्टी रिजर्वेशन बिल पास कराने पर अडिग थी, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने ऐसा होने नहीं दिया. सवाल ये है कि ये माना जा सकता है कि जब आप विपक्ष में थे तब सत्ता पक्ष की अनिच्छा के चलते बिल पास नहीं हो पाया. लेकिन अब तो आपकी सरकार है, पूर्ण बहूमत वाली. तो फिर सरकार वो प्रतिबद्धता बीते सात सालों में क्यों नहीं दिखाई दी?
देश की महिला और बाल विकास मंत्री एक चैनल पर महिला आरक्षण के खिलाफ बोलती हैं तो मन खट्टा हो जाता है. लगता है कि इनसे नहीं तो किससे उम्मीद करेंगे?











