किसान एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही हमारे दिमाग में एक पुरुष की छवि आती है. इसके चलते किसान आंदोलन का जब जिक्र आता है तो उसमें पुरुषों का जिक्र, पुरुषों के बयान ज्यादा सामने आते हैं. लेकिन ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत के खेतों में फुल टाइम काम करने वाले लोगों में 75 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है. यानी ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि देश की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ महिलाएं हैं.
दिल्ली में एक साल से चल रहे किसान आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाओं ने हिस्सा लिया. औरतें घर से नहीं निकलतीं, औरतें घर संभालती हैं वाले स्टीरियोटाइप को तोड़ते हुए. आंदोलन में इस बात का ध्यान रखा गया कि महिलाओं की भूमिका केवल रसोई संभालने तक सीमित न रहे.कुछ महिला किसान नेताओं ने ये सुनिश्चित किया कि किसान आंदोलन में औरतों का प्रतिनिधित्व बना रहे. कौन रहीं वो महिलाएं. उन्हीं के बारे में बात करेंगे. हरिंदर कौर बिंदू
हरिंदर कौर बिंदू.भारतीय किसान यूनियन एकता- उगराहां के महिला विंग को लीड करती हैं. पंजाब की रहने वाली हैं. उनके पिता की 1991 में खालिस्तान समर्थकों ने हत्या कर दी थी. न्यूज़ लॉन्ड्री से बातचीत में हरिंदर ने कहा था कि एक्टिविस्म उनके अंदर उनके परिवार से ही आया है. उन्होंने बताया था कि 10 की उम्र से ही वो अपने पिता के साथ प्रदर्शनों में हिस्सा लेती रही हैं. उनके पिता नौजवान भारत सभा के नेता थे. 1991 में जब वो 13 साल की थीं तब खालिस्तान समर्थकों ने उनकी हत्या कर दी थी. इसके बाद स्कूल-कॉलेज के दिनों में हरिंदर कई प्रोटेस्ट्स में शामिल हुईं. साल 2002 में वो बीकेयू से जुड़ीं. हरिंदर तब से ही किसानों से जुड़े मुद्दों पर काम कर रही हैं. सुभाषिनी अली
सुभाषिनी अली.ऑल इंडिया डेमोक्रैटिक विमेन्स असोसिएशन की वाइस प्रेसिडेंट हैं. सीपीएम नेता हैं और कानपुर से सांसद भी रही हैं. इस साल जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसान संसद हुआ था. पार्लियामेंट के मानसून सत्र के साथ-साथ ये किसान संसद चल रहा था. इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुई थीं. इस संसद को सुभाषिनी ने मॉडरेट किया था. सुभाषिनी मानती हैं कि खेत और घर के साथ-साथ देश भी चला सकती हैं. इस किसान संसद में दो रिसॉल्यूशन भी पास किए गए थे. पहला ये कि महिलाएं किसानी में भरपूर योगदान देती हैं लेकिन उसके बदले उन्हें वो सम्मान और पहचान नहीं मिलती जो वो डिजर्व करती हैं. किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका और उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए ज़रूरी कदम उठाने की बात इस संसद में हुई थी. इसके साथ ही ये रिसॉल्यूशन भी पास हुआ था कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए. जसबीर कौर नत्त
जसबीर कौर नत्तपंजाब किसान यूनियन की स्टेट कमिटी मेंबर हैं. 65 साल की हैं और तीन दशकों से किसानों और मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं. किसान प्रोटेस्ट में जसबीर अपने पूरे परिवार के साथ शामिल हुई थीं. इस साल फरवरी में द क्विंट से उन्होंने कहा था,
"लोगों को लगता है कि महिलाएं कोई सामान हैं जिन्हें प्रोटेस्ट में जबरन लाया गया है. जैसे वो खुद से कुछ सोच-समझ नहीं सकती हैं. मैं 1986 से किसानों के लिए लड़ रही हूं. इसके चलते मुझे जेल भी जाना पड़ा, कई बार कोर्ट केस हुए मुझ पर. हमें पता है कि हम किस चीज़ के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे हैं."नवकिरण नत्त
नवकिरण नत्तनवकिरण नत्त AISA की सदस्य हैं. वो नवंबर 2020 से प्रोटेस्ट में शामिल रहीं. टिकरी बॉर्डर पर मोर्चा संभाला. नवकिरण और उनके दोस्तों ने मिलकर ट्रॉली टाइम्स नाम का मैग्ज़ीन शुरू किया था. इस मैग्ज़ीन में प्रोटेस्ट में कहां क्या हो रहा है, प्रोटेस्ट को लेकर किसने क्या कहा, किसान नेताओं ने क्या कहा... जैसी चीज़ें कवर होती थीं. नवकिरण और उनके दोस्त पूरी दिल्ली में जहां-जहां पर प्रोटेस्ट चल रहा था, वहां पर ये मैग्ज़ीन डिस्ट्रीब्यूट करते हैं.
ये थीं वो महिलाएं जिन्होंने किसान आंदोलन को अलग-अलग फ्रंट पर लीड किया. लेकिन किसान आंदोलन की सफलता में महिलाओं की भूमिका महज़ कुछ चेहरों तक सीमित नहीं है.










