बुल्ली बाई वाले केस में कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं. जिनमें एक लड़की भी शामिल है. सुबह-सुबह ट्विटर स्क्रोल कर रही थी तो कुछ ट्वीट दिखे. जो कह रहे थे कि ये बड़ी शर्मिंदगी की बात है कि एक औरत ने ऐसा किया. जब भी किसी क्राइम में औरत आरोपी बनती है. या कोई औरत सोशल मीडिया पर किसी को पीटते, बदतमीजी करते या कोई क्रिमिनल चीज करते हुए वायरल वीडियो में दिखती है. लोग अक्सर पूछते हैं कि यही है फेमिनिजम? यही है नारीवाद? अब कहां चली गईं सारी फेमिनिस्ट? भई फेमिनिस्ट यहीं हैं. बिलकुल यहीं हैं. लेकिन इन फेमिनिस्ट्स की ऐसे सवालों पर कोई जवाबदेही नहीं है. क्योंकि फेमिनिस्ट्स ये नहीं कहतीं कि औरतें क्रिमिनल नहीं होतीं.
बुल्ली बाई केस में अबतक क्या क्या हुआ?
बुल्ली बाई (Bulli Bai) केस सामने आया 1 जनवरी को. इस दिन कई मुस्लिम महिलाओं ने पाया कि बुल्ली बाई नाम के एक ऐप पर उनकी नीलामी हो रही है. इसमें उनकी तस्वीरें अभद्र तरीके से इस्तेमाल हो रही हैं. कई तस्वीरों को एडिट कर अश्लील बनाया गया था. ऐसा एक बार बीते साल भी हुआ था. जब इसी तरह का एक ऐप सुल्ली डील्स (Sulli Deals) सामने आया था. बुल्ली बाई लगभग वही चीज थी. ये ऐप गिटहब (Github) नाम का प्लेटफॉर्म होस्ट कर रहा था. तमाम शिकायतों के बाद दिल्ली और मुंबई पुलिस ने मामले में जांच शुरू की. जांच के बाद से तीन गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. 21 साल का विशाल कुमार झा, 18 साल कि श्वेता सिंह और 21 साल का मयंक रावल. यूं तो गिरफ्तारियां तीन हुई हैं. लेकिन लोगों की सुई एक पर ही अटकी है. जो लड़की है. एक यूजर ने लिखा- '
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मैं लड़की हूं लड़ सकती हूं, इन सभी कैंपेन्स का नतीजा देखिए.'

एक ने बताया कि किस तरह फेमिनिस्ट्स में इस केस के बाद चुप्पी छाई है.

ट्रोल किट नाम के यूजर मजे लेते हुए पूछ रहे हैं, '
श्वेता सिंह के साथ फेमिनिस्ट्स क्यों नहीं खड़ी हैं?' 
और एक जनाब तो यहां तक कह रहे हैं - '
फेमिनिस्ट को बुल्ली बाई मसले में पीड़ित औरतों से ज्यादा उस औरत की फ़िक्र है जो इसमें क्रिमिनल है.'
फेमिनिस्ट्स का काम हर औरत को डिफेंड करना है?
तो भाई, जिन्हें लगता है कि फेमिनिस्ट्स का काम हर औरत को डिफेंड करना है. वो इसी वक़्त अपने दिमाग कि स्लेट को पोंछ लें. और आज ताज़ा ज्ञान लें. फेमिनिस्ट्स औरतों के अधिकारों में विश्वास रखने और उनके लिए बोलने वाले लोग हैं. ये फेमिनिस्ट पुरुष भी हो सकते हैं और महिलाएं भी. फेमिनिस्ट्स की लड़ाई इस बात की है कि पुरुष और स्त्री बराबर हैं. दोनों को बराबर के अधिकार होने चाहिए. न कि इस बात की है कि महिलाओं के गलत को सही साबित कर उन्हें सबके ऊपर रख दो. कुछ लोग ये लिख रहे हैं कि श्वेता सिंह ने लड़की होकर ऐसा कैसे किया. ये लोग भोले हैं. अगर आप इस तरह के सवाल पूछ रहे हैं तो ये साबित करता है कि आपके मन में औरतों की छवि दूध सी सफ़ेद है. आपको लगता है कि क्रिमिनल औरतें तो हो नहीं सकतीं. इसलिए जब औरतों के क्राइम बाहर आते हैं तो आप चौंक जाते हैं. तो आज आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि औरतें भी घृणित हो सकती हैं. औरतें क्रिमिनल हो सकती हैं. औरतें भी समाज के लिए खतरा हो सकती हैं. अब सुनिए! ये औरतें घृणित हैं क्योंकि ये क्रिमिनल हैं. इसलिए नहीं कि वो औरतें हैं. यही बात आपकी फेमिनिजम बताता है. फेमिनिजम कभी ये नहीं कहता कि कोई लड़की कानून तोड़े तो उसे सजा न दो. फेमिनिजम बस ये कहता है कि उसे उतनी ही सजा दो जितनी एक पुरुष को दोगे. फेमिनिजम ये नहीं कहता है कि लड़की अगर पब्लिक प्रॉपर्टी को ख़राब करती है या मारपीट करती है तो भी वो अच्छी है. फेमिनिज़म ये कहता है कि इस लड़की को उतनी सजा दो जितनी कानूनन मिलनी चाहिए. न कि उसे रेप थ्रेट देने लगो.
श्वेता सिंह को विलेन नहीं बनाना चाहिए?
ये तो फेमिनिजम के बेसिक्स हैं. अब लौटते हैं बुल्ली बाई आरोपी श्वेता सिंह पर. श्वेता 18 साल की लड़की है. इंटरनेट पर एक धड़ा इस ओपिनियन का है कि हमें श्वेता के प्रति सॉफ्ट रहना चाहिए. जबसे श्वेता की स्टोरी बाहर आई है, कई लोगों का कहना है कि उसे विलेन नहीं बनाना चाहिए. BJP से जुड़ी प्रीति गांधी के एक ट्वीट पर बड़ा चर्चा है. वो कह रही हैं कि श्वेता जैसी 18 साल की लड़की, जिसने अपने माता-पिता को खो दिया है, अगर किसी गलत काम में पड़ गई है तो उसे समझाना चाहिए. वो कोई टेररिस्ट नहीं है. वो वापस आ सकती है.

ये सच है कि श्वेता ने बीते साल कोरोना में आने पिता को खोया और उसके पहले कैंसर की वजह से अपनी मां को. क्या हमें इस बात की वजह से उससे सहानुभूति रखनी चाहिए? बिलकुल रखनी चाहिए. किसी भी टीनएजर के लिए पेरेंट्स को खोना बहुत ट्रॉमेटिक हो सकता है. क्या उसे किसी ने ब्रेनवॉश किया होगा? बेशक किया होगा. लेकिन क्या प्रीति गांधी की सिंपथी श्वेता के पास्ट की वजह से है? लगता तो नहीं है. इंटरनेट पर लोगों ने उनका वो पुराना ट्वीट निकाला है जिसमें वो टूलकिट मसले की आरोपी दिशा रवि को देश के लिए खतरा बता रही हैं और कह रही हैं कि तो क्या हुआ अगर वो एक सिंगल मदर की बेटी है. प्रीति जी, आप अपनी पॉलिटिक्स कहीं और चमका सकती हैं. कम से कम लड़कियों के मसलों पर हाथ मत लगाइए क्योंकि ये हमारे नेताओं और उनके समर्थकों को सूट नहीं करता. यहां मेरा मकसद दिशा रवि को डिफेंड करना नहीं, बस ये दिखाना है कि एक ही मसले पर किसी के दो अलगव्यू कैसे हो जाते हैं. जब मामला राजनीति का हो.
आरोपियों की काउंसलिंग होनी चाहिए
ब्रेनवॉश तो वो लड़के भी हुए होंगे जो आरोपी हैं और महज 21 साल के हैं. पास्ट तो उसका भी होता है जो रेपिस्ट होता है. कई क्रिमिनल क्राइम की दुनिया में आते ही इसलिए हैं क्योंकि उनकी खुद की अब्यूज की हिस्ट्री रही होती है. क्या हम उनपर सॉफ्ट होते दिखते हैं? कहने का अर्थ ये बिलकुल नहीं है कि श्वेता सिंह जैसे आरोपियों की काउंसलिंग न हो. बस ये है कि इस पूरे प्रकरण में आरोपी को बचाने के लिए महिला कार्ड न खेला जाए. क्योंकि जो पीड़ित हैं, वो भी महिलाएं ही हैं. उन्होंने अपनी नग्न तस्वीरों पर जब बोली लगते हुए देखा होगा, उस ट्रॉमा की भरपाई कौन कर पाएगा? बुल्ली बाई एक और इंसिडेंट है जो बताता है कि महिला होना इस देश में सेफ नहीं. अगर आप किसी विशेष धर्म से हैं तो और भी नहीं. सोशल मीडिया पर एस्टैब्लिशमेंट के खिलाफ बोलती हैं, तो और भी नहीं. न सड़कों पर, न इंटरनेट पर. और जब महिलाओं से जुड़ा कोई मसला सुर्ख़ियों तक पहुंचता है तो उसपर क्या होता? कोई फेमिनिस्ट्स को ट्रोल करने के बहाने खोजता है. तो कोई अपनी धार्मिक नफरत से भरी पॉलिटिक्स को रंग देने की. आपकी क्या राय है हमें कमेंट में बताइए.