नहीं, अभी ख़तम नहीं! क्राइम मास्टर गोगो, आया हूं, कुछ तो लेकर जाऊंगा वाले इमोशन को आगे बढ़ाते हैं. तो भाई औरतों के लिए लिया जाने वाला हर स्टेप बढ़िया है लेकिन हर बार ये पिंक कलर क्यों! मॉल जाओ तो आधे कपड़े गुलाबी दिखते हैं. अपनी शादी की शॉपिंग में तो मैंने इतना पिंक देख लिया कि अब वो मेरी आंखों में ऐसे चुभता है जैसे कानों में एक बड़ी फेमस एक्ट्रेस हैं, उनकी आवाज़. ऑफिस जाने के लिए लेडीज को मिलता है पिंक ऑटो. बसों में मिलती है पिंक सीट, या फिर पिंक टैक्सी, पिंक ट्रेन, पिंक स्कूटी, पिंक बाथरूम, पिंक पिंक पिंक पिंक. भाई साब पिंक का इतना ओवरडोज है कि कुछ दिनों में अगर रेस्टोरेंट वगैरह में औरतों को लेडीज स्पेशल पिंक रोटियां सर्व होने लगें, तो चौंकिएगा मत.
पिंक औरतों का रंग है, ये कब डिसाइड हुआ?
एनिवे, तो हमने बैठकर सोचा कि यार ऐसा कब हुआ होगा कि लोगों ने तय किया कि पिंक औरतों का कलर होगा और ब्लू लड़कों का. थोड़ी पढ़ाई करने पर पाया कि ये मामला ज्यादा पुराना नहीं है. बल्कि मीडियम डॉटकॉम पर छपे एक आर्टिकल के मुताबिक़, पिंक कलर पुरुषों के ज्यादा करीब माना जाता था क्योंकि वो लाल बेस से निकला हुआ कलर था. और लाल रंग आज की तरह पहले सेक्सी रंग नहीं माना जाता था बल्कि पुरुषों की यूनिफार्म लाल रंग की बनती थी. बड़ा मैस्कुलिन कलर मानते थे क्योंकि ये लाउड, ब्राइट, स्ट्रॉन्ग और आकर्षक होता है और आप तो जानते हो, how men have loved being the centre of attraction always! :pखैर, रंगों पर वापस आते हैं. कोरा पर मौजूद एक आर्टिकल के मुताबिक़, ये शिफ्ट दूसरे विश्व युद्ध के आस-पास आया. उस समय पुराने परसेप्शन बदल रहे थे, पुराने बिलीफ बदल रहे थे. पढ़ने में आता है कि उस वक़्त टॉयलेट्स पर जो साइन्स बन रहे थे, उसमें फीमेल के लिए पिंक और मेल के लिए ब्लू यूज़ हो रहा था.
लेकिन हर एक चीज, हर बिलीफ के इतिहास में एक ऐसा पल होता है जिसे मार्केट पकड़ लेता है. और पिंक के इतिहास में भी ऐसे मोमेंट थे. आपने मैरिलिन मोनरो का नाम सुना होगा. नहीं सुना होगा तो कम से कम उनकी ये तस्वीर ज़रूर देखी होगी.

"द सेवन ईयर इच" की फिल्मिंग के समय मेर्लिन मुनरो की तस्वीर.
अब ये ड्रेस सफ़ेद है लेकिन इन्होंने 1953 में पहनी थी एक गुलाबी ड्रेस, फिल्म 'जेंटलमेन प्रिफर ब्लॉन्ड्स' में, जो लोगों के मन में बस गई. मोनरो उस वक़्त से लेकर आने वाले समय में - यहां तक आज भी - सेक्सीनेस, फीमेल सेक्शुअल एक्सप्रेशन और स्त्रीत्व का दूसरा नाम मानी जाती हैं. लेकिन ऐसा स्त्रीत्व नहीं जो लाचार, बेचारा या किसी पर निर्भर हो. बल्कि एक मॉडर्न लड़की जिसको सेक्सी दिखने से, अपने मन के कपड़े ओढ़ने-पहनने से ताकतवर महसूस होता है.
तो लाल और उससे निकले हुए कलर जो पहले पुरुषों के रंग माने जाते थे, उसे महिलाओं ने पहना और ये ज़ाहिर किया कि वे भी आकर्षण का केंद्र हो सकती हैं. लेकिन समय के साथ पिंक के लाइट शेड्स पर भी फोकस गया. जो आंखों के लिए आकर्षक से ज्यादा उन्हें सुकून देने वाला होता है. ऐसा ही सॉफ्ट पिंक सूट जॉन ऍफ़ केनेडी की पत्नी जैकी केनेडी ने पहना था. उस दिन, जिस दिन केनेडी की हत्या की गई. कुछ ही समय में उनका ये पिंक सूट अपने पति के खून से सना हुआ था. लोगों के ज़हन में ये एक बुरी याद की तरह दर्ज है लेकिन उन्हें ये भी याद है कि ये पिंक सूट जैकी को बेहद पसंद था और इसे वे कई बार पहन चुकी थीं.
पिंक के सुकून भरे शेड्स औरतों का पर्याय बन गए. क्यों? क्योंकि मार्केट को स्त्रीत्व की परिभाषा तय करने का बड़ा फायदा मिलता है. परिभाषाएं तय होने के बाद औरतों को स्पेसिफिकली टारगेट करते हुए शेड्स बेचे जा सकते हैं.
आज मार्केट किस जगह है, आप देख ही सकते हैं. लड़कियों के जुड़ी हर चीज गुलाबी है. क्योंकि कलेक्टिव मेमोरी में लड़कियों की कल्पना भी गुलाबी है. वे हंसेंगी तो फूल झड़ेंगे, वो जुल्फें खोलेंगी तो रात हो जाएगी. लड़की घर में खुशियां भर देगी, आपके आंसू पोंछ लेगी, बहके हुए पुरुष को संभाल लेगी, मां बनकर त्याग करेगी, सबके दुख हर लेगी, वगैरह-वगैरह. पिंक एक हैपी कलर है. मगर हमारे देश में, हमारे कल्चर में क्या लड़कियों के हाल उतने ही गुलाबी हैं जितने फिल्मों में उनके गाल गुलाबी हैं. आप सोचियेगा. लेकिन मुझे पर्सनली, एक लड़की के तौर पर, सिर्फ एक रंग से जोड़े जाने से प्रॉब्लम होती है.
पिंक से प्रॉब्लम क्या है?
तो क्या पिंक कलर बुरा है? बिलकुल नहीं. यही गुलाबी रंग जब ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस का रंग बनता है, तो कितना खूबसूरत लगता है. आप क्रिकेट फॉलो करते हैं तो आपको ऑस्ट्रेलिया के वेटेरन खिलाड़ी ग्लेन मेकग्रॉ उनकी पत्नी जेन के बारे में ज़रूर पता होगा. जेन ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थीं. 2008 में वे दुनिया से चली गईं लेकिन उसके पहले दुनिया को दे गईं एक उम्दा ब्रेस्ट कैंसर केयर सिस्टम. आज मेकग्रॉ फाउंडेशन उन नर्सेज़ को फंड करता है जो ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों का खयाल रखती हैं. गुलाबी रंग इनकी पहचान है. पिंट टेस्ट इनकी पहचान है.सिंबल और प्रतीक हमेशा ख़राब हों ये ज़रूरी नहीं. लेकिन जब ये प्रतीक हमें बांटने लगें तब ये खतरनाक हो जाते हैं. बच्चे के पहले होने के पहले ही उसे गुलाबी और नीले में बांटना, फिर उनके कपड़े बांटना, फिर उनके खिलौने बांटना. जब हम बच्चों को उनके रंग असाइन कर देते हैं तो वो आपस में समानताओं से ज्यादा भेद पहचानते लगते हैं.
तो भाई. मैं लड़की हूं, मुझे स्ट्रॉबेरी का खेत मत बनाइए. हर जगह खुद के लिए गुलाबी रंग देखकर लगता है कि हमें बाकी सबसे अलग कर दिया गया है. आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में बताइएगा.














