The Lallantop

बच्चे से कहा, 'हम तुम्हारा खाना नहीं खाएंगे, क्योंकि तुम हमारी बिरादरी के नहीं हो'

खबर अपने ही देश की है, पड़ोसी मुल्क की नहीं.

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop

एक और गणतंत्र दिवस धूम-धाम के साथ बीत चुका है. दावे हैं कि देश के मुद्दे बदल रहे हैं. देश बदल रहा है. लेकिन जिस तरह की घटनाएं आसपास घट रही हैं, लगता नहीं कि कुछ बदल रहा है. बदलने की चाह रखना भी बदलाव ही है लेकिन ये चाह भी नदारद दिखती है.

Advertisement
जाति इस समाज में नासूर बन चुकी है. इस पर चाहे जितना चिल्लाओ. चाहे जितना लिखो. चाहे जितना पढ़ो, पढ़ाओ. इसका इलाज नहीं हो पा रहा है. राजनीतिक समीकरणों से लेकर सामाजिक नियमों तक, सब जाति पर आकर ख़त्म हो जाते हैं.
एक मामला मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में सामने आया है. यहां 'ऊंची' जाति के छात्रों ने दलितों के घर में बना हुआ मिड डे मील खाने से मना कर दिया है.
MP 1
यहां खाना बनाने वाली एक दलित महिला है. इस महिला के बच्चे ने कहा, ''केवल 12 बच्चे खाना खाते हैं. बाकी बोलते हैं, हमें खाना नहीं खाना क्योंकि तुम हमारी बिरादरी के नहीं हो.''MP 2

इस बारे में हेड मास्टर से पूछा गया तो बोले, ''खाना स्कूल के किचन में बनना चाहिए. किसी के घर में नहीं. क्योंकि खाना किसी के घर में बना है, इसलिए बच्चे इसे खाने में हिचकिचा रहे हैं.''
MP 3

हेड मास्टर का तर्क समझ से बाहर है. खाना घर में बने या स्कूल में इससे क्या फर्क पड़ता है. जो असली 'फर्क' है वो हेड मास्टर साहब अपने मुंह से बोल नहीं रहे.
मिड डे मील से जुड़ी इस तरह की खबरें पहले भी आईं हैं. कोई किसी महिला के दलित होने की वजह से खाना नहीं खाता तो कोई उसके विधवा होने से. बिहार के गोपालगंज में एक डीएम तो इसीलिए चर्चा में आए थे, क्योंकि इस मिथ को तोड़ने के लिए उन्होंने एक विधवा के हाथ का मिड डे मील खाया था. इसकी सोशल मीडिया पर तारीफ भी हुई. लेकिन तारीफ सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित रह जाती है.
गोपालगंज में डीएम राहुल कुमार
गोपालगंज में डीएम राहुल कुमार

मध्य प्रदेश में बच्चे इस तरह मिड डे मील खाने से मना कर रहे हैं. इसके पीछे बच्चे नहीं उनकी 'सोशल कंडीशनिंग' जिम्मेदार है. ऐसी कंडीशनिंग जो बचपन से दिमाग में भरी जाती है कि नहीं तुम औरों से अलग हो. यही कंडीशनिंग आगे चलकर नफरत में बदल जाती है फिर चाहे किसी जाति के लिए हो या धर्म के लिए. और फिर संजय लीला भंसाली के साथ हुई घटना सामने आती है.
दो दिन पहले संजय लीला भंसाली के साथ इतिहास का रोना रोकर जातीय दंभ के चलते ही मारपीट की गई. कोर्ट कचहरी की कोई जरूरत अब बची नहीं. तर्कों की भी नहीं. सब उबले पड़े हैं. जैसे अभी अपनी-अपनी फेसबुक वॉल से निकलकर भाला घोंप देंगे. कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता. मारो-मारो का शोर हर तरफ है. ऐसे में जो मर रहे हैं उनकी आवाजें सुनाई नहीं दे रही हैं.

ये स्टोरी निशांत ने की है.




ये भी पढ़ें-

फिल्मकार को पीटकर कौन सा इतिहास बना रहे हैं इतिहासप्रेमी?

Advertisement
Advertisement