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'कोर्ट चुपचाप दर्शक बनकर नहीं देखेगा', तेलंगाना के दल-बदल मामले में SC ने स्पीकर को क्यों लताड़ा?

BRS नेता के.टी. रामा राव और पडी कौशिक रेड्डी ने कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए 10 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई को लेकर हो रही कथित देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.

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सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी के बयान पर नाराजगी जताई. (तस्वीर:इंडिया टुडे)

तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति ( BRS) के 10 विधायकों का कांग्रेस में शामिल होने का मुद्दा गर्मा गया है. कोर्ट ने इसको लेकर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष से सवाल किया कि उन्होंने विधायकों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर नोटिस जारी करने में लगभग 10 महीने का समय क्यों लगाया? इसके अलावा कोर्ट ने सीएम रेवंत रेड्डी के उपचुनाव संबंधित बयान पर भी हैरानी जताई है.

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‘अयोग्य विधायकों पर जल्दी कार्रवाई हो’

BRS नेता के.टी. रामा राव और पडी कौशिक रेड्डी ने कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए 10 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई को लेकर हो रही कथित देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में तेलंगाना स्पीकर जी. प्रसाद कुमार से विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई जल्द करने की मांग की गई है.

एक याचिका में तीन विधायकों को अयोग्य करार देने संबंधी तेलंगाना हाई कोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई है, जबकि एक अन्य याचिका, दल-बदल करने वाले बाकी के सात विधायकों को लेकर दायर की गई है. लेकिन इस पूरे मामले में अहम ये बात हो गई है कि क्या कोर्ट स्पीकर को अयोग्यता याचिकाओं को तय समय में निपटाने का निर्देश भी जारी करेगी.

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जस्टिस बी.आर. गवई की बेंच ने कहा कि विधानसभा स्पीकर विधायक के अयोग्यता की अर्जियों को तब तक लटकाए रखते हैं जब तक विधानसभा का टर्म खत्म होने को न आए और फिर उन्हें कूड़े में फेंक देते हैं. कोर्ट ने साफ कहा कि ये बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि विधानसभा स्पीकर दल-बदल की शिकायतों को दबाकर बैठे रहें. बेंच ने कहा कि 

"सुप्रीम कोर्ट चुपचाप दर्शक बनकर नहीं देखेगा कि स्पीकर विधानसभा के कार्यकाल के खत्म होने से छह महीने पहले तक इंतजार करें और फिर कहें कि अब समय नहीं बचा."

जस्टिस गवई ने साफ कहा कि कोर्ट संविधान की दसवीं अनुसूची को मजाक नहीं बनने देगा. दसवीं अनुसूची को 'दलबदल विरोधी कानून' यानी (Anti-Defection Law) के नाम से जाना जाता है. यह एक पार्टी से दूसरे पार्टी में जाने वाले संसद और विधायकों की अयोग्यता से संबंधित है. जस्टिस गवई ने कहा कि कोर्ट ने इस मामले की शुरुआत में पूछा था कि क्या स्पीकर बता सकते हैं कि वे कब तक याचिकाओं पर फैसला करेंगे.

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द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पर तेलंगाना सरकार की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि उनके पास कोई निर्देश नहीं हैं. बेंच ने कहा कि तो अब कोर्ट समय सीमा तय करेंगे.

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सीएम रेड्डी के बयान पर नराजगी जताई

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर एडवोकेट सी.ए. सुंदरम पेश हुए. उन्होंने सुनवाई के दौरान कोर्ट को तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी के विधानसभा में दिए एक बयान की तरफ ध्यान दिलाया. दरअसल, रिपोर्ट के मुताबिक, सीएम रेड्डी ने विधानसभा में कहा था कि वे स्पीकर की तरफ से बोल रहे हैं और BRS विधायकों के कांग्रेस में जाने के बाद भी कोई उपचुनाव नहीं होगा.

एडवोकेट सुंदरम ने कहा, 

“जब सीएम कहते हैं कि वे स्पीकर की तरफ से बोल रहे हैं और इस पर स्पीकर उन्हें नहीं टोकते हैं. ऐसे में स्पीकर से निष्पक्ष और समय पर अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने की उम्मीद कैसे की जाए?"

बेंच ने रेवंत रेड्डी के बयान पर नाराजगी जताई. जस्टिस गवई ने कहा,

“यदि यह बात सदन में कही गई है, तो आपके मुख्यमंत्री दसवीं अनुसूची का मजाक उड़ा रहे हैं.”

रेवंत रेड्डी ने सितंबर 2024 में दिल्ली शराब नीति मामले में BRS नेता के. कविता को जमानत देने के कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी की थी. इस टिप्पणी पर कोर्ट ने नाराजगी जताई थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने रेवंत रेड्डी को माफी मांगने पर छोड़ दिया था. जस्टिस गवई ने सुनवाई के दौरान इस घटना का भी जिक्र किया.

उन्होंने कहा,

“क्या हमने उन्हें अवमानना मामले में छोड़कर गलती की? हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि नेता हमारे बारे में क्या कहते हैं. हम संयम रखते हैं. उम्मीद है कि मुख्यमंत्री भी संयम बरतेंगे.”

कोर्ट ने इस मामले को फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया. 

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