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जब कुवैत में तेल के कुएं जले और कश्मीर में गिरी थी काली बर्फ, तेहरान का धुंआ फिर वही मंजर दिखाएगा?

सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराक ने कुवैत पर हमला किया था. 1991 के उस हमले के दौरान करीब 750 तेल के कुओं में आग लग गई. नतीजा, वहां से करीब 2700 किलोमीटर दूर भारत के कश्मीर और हिमाचल में काली बर्फबारी हुई थी. और अब लगातार ईरान के तेल के कुओं के आसपास हो रहे हमलों ने वापस उसी खतरे का टाइम बम चालू कर दिया है.

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कुवैत में तेल के कुओं के ऊपर उड़ते अमेरिकी फाइटर जेट्स (PHOTO-India Today/Getty)

अमेरिका-ईरान की जंग में 7 मार्च की रात तेहरान स्थित एक तेल के डिपो पर हमला हुआ. इस हमले के बाद तेल डिपो में भयंकर आग लग गई. इसके बाद पूरे तेहरान का आसमान काला हो गया. लोगों ने इस भयावह नजारे को 'कयामत' की संज्ञा दी. लेकिन मिडिल ईस्ट में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले 1991 में सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराक ने कुवैत पर हमला किया था. इस हमले के दौरान करीब 750 तेल के कुओं में आग लग गई. नतीजा, वहां से करीब 2700 किलोमीटर दूर भारत के कश्मीर और हिमाचल में काली बर्फबारी हुई थी. और अब लगातार तेल के कुओं के आसपास हो रहे हमलों ने वापस उसी खतरे का टाइम बम चालू कर दिया है.

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कुवैत का काला आसमान

ये बात 1991 की है. इराक पर सद्दाम हुसैन का शासन था. सद्दाम के नेतृत्व में Project 17 के तहत इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया. 17 जुलाई को सद्दाम ने टेलीविजन के जरिए कुवैत और UAE पर जुबानी हमला शुरू किया. उनका आरोप था कि इन देशों ने OPEC द्वारा तय किए गए तेल निर्यात कोटे का उल्लंघन किया है. Britannica के मुताबिक इसके अगले दिन ही इराक ने कुवैत पर अल-रुमैला ऑयल फील्ड से तेल चुराने का आरोप. यह ऑयल फील्ड इराक और कुवैत की सीमा पर स्थित है. जैसे-जैसे तनाव बढ़ता गया, सऊदी अरब के जेद्दा में दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत भी 1 अगस्त को टूट गई. 

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सद्दाम हुसैन (PHOTO-Britannica)

इसके बाद सद्दाम हुसैन ने बिना देरी किए 2 अगस्त की सुबह ही कुवैत पर हमला बोल दिया. यह हमला तब हुआ, जब सद्दाम ने मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को व्यक्तिगत रूप से एक आश्वासन दिया था. उन्होंने मुबारक से कहा था कि इराक, कुवैत के खिलाफ अपने दावों को मनवाने के लिए किसी भी तरह की जोर-जबरदस्ती का इस्तेमाल नहीं करेगा. इसके बाद जंग शुरू हुई और 3 अगस्त को इराक ने कुवैत सिटी पर कब्जा कर लिया. कुवैत के अमीर 'शेख जाबिर अल अहमद अल-जबार अल-सबाह' जाते-जाते कुवैत रेडियो पर इतना कह पाए,

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‘अरब के लोगों, भाइयों, प्यारे भाइयों, मुसलमानों; जल्द से जल्द हमारी (कुवैत की) मदद कीजिए.’ 

इस दौरान UNSC ने इराक के इस कदम की निंदा की. UNSC ने कहा कि कुवैत से इराक अपनी सेना हटाए. लेकिन इराक झुकने को तैयार नहीं था. आखिरकार UN ने एक मल्टीनेशनल फोर्स बनाई. अमेरिका के नेतृत्व में बनी इस फोर्स ने Operation Desert Shield शुरू किया. अमेरिका ने कुवैत में 2 लाख से अधिक की फौज भेजी थी. आखिरकार सद्दाम हुसैन की सेना के पांव उखड़ने लगे और उन्हें पीछे हटना पड़ा.

File:US Navy F-14A Tomcat flying over burning Kuwaiti oil wells during Operation Desert Storm.JPEG
कुवैत में जलते हुए तेल के कुओं के ऊपर उड़ता US एयर फोर्स का विमान (PHOTO-Wikimedia Commons)

लेकिन जब सद्दाम हुसैन की हारी हुई इराकी सेना पीछे हटी, तो उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसका असर भारत तक दिखाई दिया. उन्होंने पूरे कुवैत में 750 से अधिक तेल के कुओं में आग लगा दी. इराकियों ने कई तेल की झीलों में भी आग लगा दी. तेल की झील वो उथले तालाब होते हैं जो तेल के बेकाबू बहाव से बन जाते हैं. महीनों तक, वहां के आसमान में घना काला धुआं छाया रहा. जलते हुए कुओं से भारी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे खतरनाक कण वातावरण में फैल गए. आग इतनी भयानक थी कि कुवैत के बड़े हिस्सों में दिन में ही अंधेरा छा गया. इस भयंकर आग को बुझाने में लगभग नौ महीने लग गए थे. 

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कुवैत के तेल के कुओं में आग लगाते इराकी सैनिक (PHOTO- Sgt. Dick Moreno/U.S. Department of Defense)

इस आग ने आधुनिक इतिहास की पर्यावरण से जुड़ी सबसे बुरी आपदाओं में से एक को जन्म दिया. टाइम मैग्जीन ने चरनोबिल न्यूक्लियर आपदा (1986) और भोपाल (1984) के बाद इसे तीसरी सबसे बुरी आपदा का दर्जा दिया. इंडिया टुडे के मुताबिक नौ महीनों तक जलते रहे तेल के कुओं ने जो प्रदूषण किया, उसका असर सिर्फ मिडिल-ईस्ट नहीं, बल्कि भारत पर भी पड़ा. अगस्त 1991 में नई दिल्ली में तत्कालीन पर्यावरण और वन राज्य मंत्री कमल नाथ ने कहा, 

‘मार्च 1991 में जम्मू और कश्मीर के गुआंड सोनमर्ग इलाकों और हिमाचल प्रदेश के मनाली क्षेत्र में काले बर्फ के कुछ अलग-थलग टुकड़े देखे गए थे.’

हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में से कुछ से इकट्ठा किए गए नमूनों के विश्लेषण से, इस घटना का कोई विशिष्ट कारण पता नहीं चल सका. दूरदर्शन के कश्मीर केंद्र ने तो इस घटना पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई, जिसका टाइटल था, ‘कश्मीर में काली बर्फ’. यह डॉक्यूमेंट्री बहुत लोकप्रिय हुई और इसके निर्माता, रशीद जावेद को इस काम के लिए खूब सराहना मिली.

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कुवैत में जलते हुए तेल के कुओं के ऊपर उड़ता US एयर फोर्स का विमान (PHOTO-Britannica)

इसी वजह से जब पिछले दिनों तेहरान पर काला धुंआ छाया, तो वापस से कुवैत की वो भयावह यादें ताजा हो गईं. क्योंकि तेहरान की आग पर तो काबू पा लिया गया. लेकिन इस जंग में लगातार तेल और गैस के ठिकानों पर हमले हो रहे हैं, ऐसे में अगर किसी ऑयल फील्ड में आग लग गई तो वापस से काली बर्फ और दम घोंटने वाली हवा के लिए दुनिया शायद तैयार नहीं है.

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