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रेलवे का वेटिंग लिस्ट का खेल, क्यों WL 10 अटकता है और WL 100 कंफर्म हो जाता है?

समर वेकेशन में ट्रेन टिकट की मारामारी क्यों बढ़ जाती है. जानिए रेलवे के रैंडम एलोकेशन सिस्टम, वेटिंग लिस्ट के गणित, चार्ट बनने की असली प्रक्रिया, RAC का खेल, स्पेशल ट्रेनों का लॉजिक और तत्काल टिकट बुकिंग के स्मार्ट हैक्स.

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RAC से कन्फर्म तक: टिकट सिस्टम का असली मैकेनिज्म

मार्च खत्म होते ही देश का मूड बदल जाता है. स्कूलों में आखिरी पेपर, दफ्तरों में छुट्टियों की फाइलें और घरों में एक ही चर्चा. इस बार समर वेकेशन कहां. लेकिन जैसे ही प्लान बनता है, सामने आ खड़ी होती है भारतीय रेल की सबसे पुरानी और सबसे आधुनिक पहेली. टिकट मिलेगा या नहीं.

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आप IRCTC खोलते हैं, ट्रेन सर्च करते हैं, सीट चुनते हैं और फिर स्क्रीन पर चमकता है WL 47, WL 89 या कभी-कभी WL 156. यहीं से शुरू होता है असली ड्रामा. कोई कहता है 30 तक तो पक्का कन्फर्म हो जाएगा. कोई दावा करता है 100 भी क्लियर हो जाता है. और कुछ लोग बताते हैं कि WL 10 भी नहीं हुआ था कन्फर्म.

तो आखिर ये खेल क्या है. क्या सच में टिकट किस्मत का मामला है या इसके पीछे कोई ठोस गणित है. और वो जो लोग कहते हैं कि रेलवे का सॉफ्टवेयर रैंडम सीट देता है, क्या वो सच है या आधा सच.

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चलिए इस पूरी कहानी को खोलते हैं, परत दर परत.

रेलवे का मुश्किल सिस्टम

पहले एक बेसिक बात समझ लीजिए. ट्रेन में सीटें सीमित हैं. हर कोच में तय संख्या होती है. जैसे स्लीपर में 72, 3AC में 64, 2AC में 46. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

रेलवे सिर्फ सीट नहीं बेचता. वो रूट बेचता है. यानी दिल्ली से मुंबई जाने वाली सीट, बीच के हर स्टेशन के लिए अलग-अलग हिस्सों में बंटी होती है. इसे कहते हैं कोटा सिस्टम.

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‘कोटा’ क्या बला है

मान लीजिए एक ट्रेन दिल्ली से मुंबई जा रही है. लेकिन बीच में आगरा, कोटा, सूरत जैसे स्टेशन भी हैं. अब हर स्टेशन के यात्रियों के लिए सीटों का हिस्सा पहले से तय होता है.

यानी जो सीट दिल्ली से मुंबई के लिए है, वही सीट आगरा से सूरत के लिए भी हो सकती है, लेकिन अलग समय स्लॉट में. इसका मतलब ये हुआ कि आपको दिखने वाली खाली सीटें असल में पूरी तरह खाली नहीं होतीं. वो किसी और स्टेशन के कोटे में हो सकती हैं.

रैंडम एलोकेशन का असली मतलब

अब आते हैं उस शब्द पर जो सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन पैदा करता है. रैंडम एलोकेशन. साधारण भाषा में कहें तो रेलवे का सॉफ्टवेयर सीटें ऐसे ही किसी को भी नहीं दे देता. इसके पीछे एक एल्गोरिदम काम करता है.

एल्गोरिदम क्या देखता है, इस सवाल के एक नहीं 5 जवाब हैं,

  1. आपकी यात्रा का स्टार्ट और एंड स्टेशन
  2. ट्रेन में उस रूट पर उपलब्ध सीटें
  3. दूसरे यात्रियों की बुकिंग
  4. कोटा लिमिट
  5. कैंसिलेशन पैटर्न

जब आप टिकट बुक करते हैं, तो सिस्टम कोशिश करता है कि सीट का इस्तेमाल अधिकतम हो. यानी एक सीट जितने ज्यादा हिस्सों में इस्तेमाल हो सके, उतना बेहतर.

इसी वजह से कभी-कभी आपको अलग-अलग कोच में सीट मिलती है या RAC मिलता है. तो फिर रैंडम कहां है? रैंडम शब्द का इस्तेमाल इसलिए होता है क्योंकि यूजर को यह समझ नहीं आता कि सीट किस लॉजिक से मिली. लेकिन सिस्टम के अंदर सब कुछ नियमों के हिसाब से होता है.

क्यों कभी WL 10 भी नहीं क्लियर होता

ये सवाल हर किसी के मन में आता है. जब लोग कहते हैं कि 100 तक क्लियर हो गया, तो WL 10 क्यों फंसा रह गया. इसका जवाब है पैटर्न. वेटिंग क्लियर होने के तीन पैटर्न देखने को मिलते हैं.

फैक्टर 1: रूट की डिमांड: अगर आप ऐसे रूट पर जा रहे हैं जहां डिमांड बहुत ज्यादा है, जैसे दिल्ली से पटना या मुंबई से वाराणसी, तो कैंसिलेशन कम होता है. कम कैंसिलेशन मतलब वेटिंग क्लियर होने की संभावना कम.

फैक्टर 2: कोटा ब्लॉक: कुछ सीटें VIP कोटा, लेडीज कोटा, डिफेंस कोटा में ब्लॉक होती हैं. ये सीटें आखिरी समय में ही रिलीज होती हैं या कभी-कभी होती ही नहीं. इससे वेटिंग आगे नहीं बढ़ती.

फैक्टर 3: चार्ट बनने से पहले का खेल: चार्ट बनने से पहले अगर ज्यादा कैंसिलेशन नहीं हुआ, तो वेटिंग वहीं अटक जाती है.

और फिर कैसे WL 100 भी कन्फर्म हो जाता है

अब उल्टा केस. कभी-कभी आप देखते हैं WL 120 तक भी क्लियर हो गया. सवाल ये है कि ऐसा कैसे हो जाता है. इसके भी कई जवाब हैं, मिसाल के तौरपर

  1. बहुत ज्यादा कैंसिलेशन
  2. ग्रुप बुकिंग का कैंसिल होना
  3. स्पेशल कोटा सीटों का रिलीज होना
  4. यात्रा की तारीख का कम लोकप्रिय होना

जैसे अगर परीक्षा खत्म होने के बाद की भीड़ कम हो जाए, तो अचानक कैंसिलेशन बढ़ जाता है.

चार्ट बनना, असली क्लाइमेक्स

टिकट की कहानी का सबसे अहम मोड़ है चार्ट प्रिपरेशन. यानी वो लिस्ट जिसमें हम देखते हैं कि हमारा रिजर्वेशन कंफर्म हुआ या नहीं. अगर हुआ तो बोगी नंबर और बर्थ नंबर कितना है. आसान भाषा में कहें तो चार्ट वह फाइनल लिस्ट होती है, जिसमें तय होता है कि किसे सीट मिलेगी और किसे नहीं.

पहला चार्ट आमतौर पर ट्रेन के प्रस्थान से 4 घंटे पहले बनता है.

चार्ट बनते समय क्या होता है

  • सभी कन्फर्म टिकट फाइनल होते हैं
  • RAC को सीट में बदला जाता है
  • वेटिंग को आगे बढ़ाया जाता है

यहीं पर कई बार बड़ा उलटफेर होता है.

आखिरी मिनट का ट्विस्ट

कई यात्री आखिरी समय पर टिकट कैंसिल करते हैं. कुछ लोग ट्रेन ही नहीं पकड़ते. इन सीटों को सिस्टम तुरंत वेटिंग लिस्ट में दे देता है.

RAC का खेल

RAC यानी Reservation Against Cancellation. आसान भाषा में इसका मतलब है आधी सीट. यानी आप ट्रेन में चढ़ सकते हैं, लेकिन सीट शेयर करनी होगी. अब सवाल ये है कि आखिर क्यों जरूरी है RAC? 

रेलवे चाहता है कि कोई सीट खाली न जाए. इसलिए RAC सिस्टम बनाया गया. अगर बाद में सीट खाली होती है, तो RAC को पूरा सीट मिल जाता है.

स्पेशल ट्रेनों का गणित

समर वेकेशन में रेलवे स्पेशल ट्रेन चलाता है. लोग सोचते हैं कि इससे टिकट मिलना आसान हो जाएगा. लेकिन कहानी थोड़ी अलग है.

स्पेशल ट्रेन क्यों फुल हो जाती है, इसकी भी कई वजहें होती हैं.

  1. डिमांड बहुत ज्यादा
  2. सीमित संख्या में स्पेशल ट्रेन
  3. एक ही रूट पर ज्यादा दबाव

यानी स्पेशल ट्रेन राहत देती है, लेकिन पूरी समस्या हल नहीं करती.

तत्काल टिकट, सुबह का युद्ध

तत्काल टिकट बुकिंग अपने आप में एक एडवेंचर है. एडवेंचर क्या ये तो रेस अगेंस्ट टाइम है. क्योंकि तत्काल टिकट मिलेगा या नहीं ये पूरी तरह से आपकी टाइमिंग पर निर्भर करता है. AC क्लास के लिए सुबह 10 बजे तत्काल टिकटों की बुकिंग शुरू होती है. जबकि स्लीपर के लिए ये समय सुबह 11 बजे का है.

ऐसे में सवाल ये है कि तत्काल टिकटों की बुकिंग इतनी मुश्किल क्यों है? इसकी तीन मुख्य वजहें हैं, 

  1. लाखों लोग एक साथ लॉगिन करते हैं
  2. सीटें सीमित
  3. एजेंट्स की तेज बुकिंग
तत्काल बुकिंग की निंजा टेक्निक

अब आते हैं उस हिस्से पर जिसका इंतजार सबसे ज्यादा होता है. वो सुपरहिट फॉर्मूला, जिसे लगाते ही टिकट तुरंत कंफर्म हो जाए.

1. पहले से लॉगिन करें: टाइम से 5 मिनट पहले लॉगिन कर लें. आखिरी समय पर लॉगिन करने में समय जाता है.

2. मास्टर लिस्ट बनाएं: IRCTC में पैसेंजर डिटेल सेव कर लें. इससे टाइम बचेगा.

3. तेज इंटरनेट: मोबाइल डेटा से बेहतर ब्रॉडबैंड या फाइबर कनेक्शन.

4. पेमेंट ऑप्शन तैयार रखें: UPI या वॉलेट सबसे तेज होता है.

5. ऑटो फिल टूल: कुछ लोग ब्राउज़र एक्सटेंशन का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि ये हमेशा सुरक्षित नहीं होते.

क्या वेटिंग टिकट पर भरोसा करें

अब सबसे बड़ा सवाल. अगर वेटिंग मिल जाए, तो क्या उम्मीद रखें. कहने का मतलब कि वेटिंग कंफर्म होगा या नहीं, इस पर कब भरोसा करें? जवाब है,

  • वेटिंग नंबर कम हो
  • यात्रा की तारीख पीक सीजन में न हो
  • रूट पर कैंसिलेशन ज्यादा होता हो
कब सावधान रहें

लेकिन हमेशा वेटिंग के भरोसे बैठे रहना भी ठीक नहीं है. कुछ मौके ऐसे हैं, जब आपको वेटिंग के कंफर्म होने की उम्मीद कम ही रखनी चाहिए.

  • त्योहार या छुट्टियों का पीक टाइम
  • लंबी दूरी की ट्रेन
  • हाई डिमांड रूट
किस्मत बनाम गणित

आखिर में यही सवाल बचता है. क्या टिकट किस्मत से मिलता है या गणित से. सच ये है कि दोनों का कॉम्बिनेशन है. सिस्टम पूरी तरह गणित पर चलता है. लेकिन कैंसिलेशन, डिमांड और टाइमिंग ऐसे फैक्टर हैं जो इसे अनप्रेडिक्टेबल बना देते हैं.

यही वजह है कि दो लोगों का एक जैसा वेटिंग नंबर होने के बावजूद रिजल्ट अलग हो सकता है.

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आखिरी बात

रेलवे का टिकट सिस्टम एक बड़े शहर की ट्रैफिक की तरह है. ऊपर से देखने पर अराजक लगता है, लेकिन अंदर से नियमों पर चलता है. आपकी वेटिंग टिकट की किस्मत सिर्फ नंबर पर नहीं, पूरे सिस्टम की चाल पर निर्भर करती है.

इसलिए अगली बार जब स्क्रीन पर WL दिखे, तो घबराइए मत. समझिए कि ये सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि एक चलती हुई गणितीय कहानी है, जिसका अंत चार्ट बनने के समय होता है.

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